सूरह क़ाफ़

तफ़सीर अल-बयान
जावेद अहमद गामिदी
(अनुवाद: मुश्फ़िक़ सुल्तान)

क़ाफ़-ज़ारियात

यह दोनों सूरतें अपने विषय के अनुसार एक जोड़ा हैं। दोनों का विषय क़यामत को साबित करना और उस के माध्यम से लोगों को सावधान करना और उन्हें ख़ुशख़बरी देना है। दूसरी सूरह (ज़ारियात) में क़यामत को साबित करने के ऐतिहासिक प्रमाण, पहली सूरह के मुकाबले में ज़्यादा विस्तार से उल्लिखित हैं। इसके साथ कुरआन की उस चेतावनी को भी साबित किया गया है जिस के अनुसार पापियों को दंडित किया जाएगा। दोनों सूरतों में संबोधन क़ुरैश से हुआ है और इन दोनों सूरतों के विषय से स्पष्ट होता है कि यह ‘उम्मुल क़ुरा’ मक्का में अल्लाह के रसूल (स) की दावत के उस चरण में नाज़िल (अवतरित) हुई हैं जब वे सब को सामान्य रूप से बात सुना रहे थे।

दोनों सूरतों का अंत अल्लाह के रसूल (स) के लिए तसल्ली के विषय पर हुआ है।  


सूरह क़ाफ़

अल्लाह के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है

{1} यह सूरह क़ाफ़ है[1]। क़ुरआन मजीद (स्वयं अपनी) गवाही है[2]। {2} (इनके नकारने का कारण वह नहीं है जो यह व्यक्त कर रहे हैं), बल्कि इन्हें आश्चर्य इस बात पर हुआ है कि (पुनः जीवित होने के दिन के लिए) एक ख़बरदार करने वाला ख़ुद इन्ही के अन्दर से इनके पास आ गया है। इसलिए इन अस्वीकार करने वालों ने कहा कि यह अजीब बात है। {3} क्या जब हम मर जाएंगे और मिट्टी हो जाएंगे (तो पुनः उठाए जाएंगे)? यह वापसी तो असंभव प्रतीत होती है[3]। (1-3)

{4} (हमारे ज्ञान को भी यह अपने अनुसार देखते हैं, यद्यपि) इन के अन्दर से ज़मीन जो कुछ खाती है, वह सब हम ने जान रखा है और हमारे पास वह किताब भी है जो हर चीज़ को सुरक्षित रखती है[4]। {5} (नहीं वह बात नहीं जो यह कह रहे हैं), बल्कि इन्होंने सत्य को झुठलाया है, जबकि वह इन के पास आ गया है[5]। इसलिए अब यह उलझन में पड़े हुए हैं[6]। (4-5)

{6} (यह नहीं मानते) तो क्या इन्होंने अपने ऊपर आसमान को नहीं देखा? हम ने किस तरह उसको बनाया और उसको संवारा है और उसमें कहीं कोई दरार नहीं है। {7} और धरती को हमने बिछाया और उसमें पहाड़ जमाए और हर तरह की सुन्दर चीज़ें उगा दीं, {8} हर उस बन्दे के देखने अथवा स्मरण के लिए जो ध्यान करने वाला हो[7]। {9} और आसमान से हम ने आशीषमय पानी बरसाया[8], फिर उस से बाग़ और फसलें उगाईं जो काट ली जाती हैं[9] {10} और खजूरों के ऊंचे ऊंचे पेड़ उगा दिए जिन में अनेक परतों में गुच्छे लगते हैं[10], {11} बन्दों की रोज़ी के लिए[11]। और मुर्दा धरती को हम ने इसी पानी से जीवित कर दिया। (मरने वालों का धरती से) निकलना भी इसी तरह होगा। (6-11)

{12} इन से पहले ‘नूह’ की कौम और ‘अर्- रस’[12] के लोगों ने, और ‘समूद’ ने, और ‘आद’ और फ़िरऔन[13] और लूत के भाइयों {13} और ‘ऐका’ वालों ने और ‘तुब्बअ’ की कौम ने भी (इसी तरह) झुठलाया था। हर एक ने मेरे रसूलों को झुटलाया, तो (देख लो) मेरी चेतावनी उन पर घटित हो कर रही[14]। {15} (इन से पूछो), क्या हम इन्हें पहली बार बनाने में असमर्थ रहे? (इन में से कौन यह कहने का दुस्साहस कर सकता है)? बल्कि दुबारा पैदा किए जाने के बारे में यह लोग शक में पड़े हुए हैं[15]। (12-15)

{16} हम ने इंसान को पैदा किया है और उस के दिल में जो विचार आते हैं, उन्हें भी हम जानते हैं और हम तो उस की ग्रीवा शिरा से भी अधिक उसके समीप हैं[16]। {17} इन्हें याद रखना चाहिए, जब दो ग्रहण करने वाले दाएं और बाएं बैठे हुए ग्रहण कर रहे होते हैं[17], {18} इंसान की ज़बान से कोई शब्द नहीं निकलता, मगर एक चौकस निरीक्षक उनके पास उपस्थित होता है[18]। (17-18)

{19} (अफ़सोस, तुम लोग इनकार ही करते रहे) और मौत की व्यथा उस सत्य के साथ आ पहुंची[19] (जिस पर दुनिया के जीवन में पर्दा पड़ा हुआ था)[20]। यह वही चीज है जिससे तुम कतराते रहे। {20} और (वह देखो) शंख फूंका गया। यह वही दिन है जिस की चेतावनी हमने तुम्हें सुनाई थी। {21} हर एक व्यक्ति हाज़िर हो गया है। इस तरह कि उसके साथ एक हांक कर ले जाने वाला है और एक गवाही देने वाला। {22} तुम इस चीज़ से बेपरवाह रहे तो अब वह पर्दा हमने तुमसे हटा दिया जो तुम्हारे आगे पड़ा हुआ था। सो आज तुम्हारी नज़र बहुत तेज़ है[21]। {23} (हमारी अदालत लग गई) और उस अपराधी के साथी (हांकने वाले फ़रिश्ते) ने कहा:[22] यह जो मेरी हिरासत में था, उपस्थित है। {24} आदेश दिया गया: तुम दोनों नरक में झोंक दो[23] हर अकृतज्ञ, विद्वेषी, {25} भलाई से रोकने वाले[24], हद से बढ़ने वाले, संदेह में पड़े हुए को[25], {26} जिस ने परमेश्वर के साथ किसी दूसरे को पूज्य-प्रभु ठहराया है[26]। सो डाल दो उसे कठोर यातना में[27]। (19-26)

{27} उस[28] के साथी (शैतान) ने कहा:[29] प्रभु, इस को मैं ने अवज्ञाकारी नहीं बनाया, अपितु यह स्वयं ही अत्यंत दुराचार में पड़ा हुआ था[30]। {28} कहा, अब मेरे सामने झगड़ा नहीं करो, मैं ने पहले ही तुम्हें अपने प्रकोप से सचेत कर दिया था[31]। {29} मेरे समक्ष बात कभी बदली नहीं जाती और मैं अपने बन्दों के साथ ज़रा भी अन्याय करने वाला नहीं हूं[32]। (27-29)

{30} उस दिन को याद रखो, जब हम नरक से पूछेंगे: “क्या तू भर गया है?” और वह उत्तर देगा: “क्या कुछ और भी है?[33]” {31} और स्वर्ग को उन लोगों के क़रीब लाया जाए गा, जो ईश्वर से डरने वाले हैं और वह कुछ भी दूर नहीं होगा[34]। {32} यही वह चीज़ है जिसका तुमसे वादा किया जाता था, हर उस व्यक्ति के लिए जो (अपने प्रभु की ओर) अत्यधिक लौटने वाला और उसकी नियमित सीमाओं के प्रति सतर्क रहने वाला था[35]। {33} जो बिन देखे रहमान (कृपालु प्रभु) से डरता था[36] और एक ऐसा दिल लेकर उपस्थित हुआ है जो (प्रभु) के प्रति समर्पित रहता था[37]। {34} जाओ, हमारे स्वर्ग में शांति के साथ प्रवेश हो जाओ। यह अनंत कालीन निवास का दिन है। {35} और उन्हें वहाँ जो चाहेंगे, मिलेगा और हमारे पास इससे अधिक भी है।  (30-35)

{36} (यह सावधान हो जाएं)[38], इनसे पहले कितने ही समूह हमने नष्ट किए हैं जो इनसे भी कहीं अधिक शक्तिशाली थे। फिर (हमारा प्रकोप आया तो) जिधर सींग समाया, उनके लोग शहरों में उधर ही चल खड़े हुए कि है कोई शरण की जगह?[39] {37} इस में उन लोगों के स्मरण के लिए बहुत सामग्री है जो (सीने में) दिल रखते हों या कान लगाकर ध्यान से सुनें।[40] (36-37)

{38} (इन्हें आश्चर्य है कि मरने के बाद यह किस तरह उठाए जाएंगे)। सच्चाई यह है कि ज़मीन और आसमानों और उनके मध्य की चीज़ों को हमने छः दिन[41] में पैदा कर दिया और हमें कोई थकान नहीं हुई[42]। {39} सो जो कुछ यह कहते हैं, उसपर धैर्य रखो, (हे पैगंबर) और अपने प्रभु की कृतज्ञता के साथ उसकी स्तुति करते रहो[43], सूरज के निकलने और उसके डूबने से पहले[44] {40} और रात में भी उसकी स्तुति करो और (सूरज के) माथा टेकने के बाद भी[45]। (38-40)

{41} और सुनो, जिस दिन पुकारने वाला अत्यंत निकट के स्थान ही से पुकारेगा[46], {42} जिस दिन यह (नरसिंघा की) भयंकर आवाज़ उस (दिन की पुकार) के साथ सुनेंगे जिसका आना निश्चित है। वह (धरती से मुर्दों के) निकलने का दिन होगा। {43} यह सत्य है कि हम ही जीवन देते और हम ही मृत्यु देते हैं और (एक दिन सब को) पलटना भी हमारी ही ओर है[47], {44} उस दिन, जब धरती इनके ऊपर से खुल जाएगी, यह तेज़ी से निकल कर भाग रहे होंगे। (इनका) यह इकट्ठा करना हमारे लिए अत्यंत सरल है। (41-44)

{45} (तुम इनकी चिंता न करो, हे पैगंबर), हम जानते हैं जो कुछ यह कह रहे हैं[48] और (याद रखो कि) तुम इनपर कोई दरोगा नियुक्त नहीं किए गए हो। इसलिए कुरआन के माध्यम से उन्हें सचेत करो जो मेरी चेतावनी से डरते हों। (45)



[1] इस नाम का क्या अर्थ है? इसके बारे में हमने अपना दृष्टिकोण सूरह बक़रह (2) की आयत 1 के अंतर्गत विस्तार से बयान कर दिया है।

[2] असल में ‘وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ’ के शब्द आए हैं। इनमें ‘و’ क़सम (शपथ) के लिए है और इस शपथ का पूरक (मुक़्सम अलैह) अनुपस्थित है| इसका कारण यह है कि वह प्रसंग से स्वयं स्पष्ट हो जाता है। क़ुरआन में इस तरह की शपथ गवाही के तौर पर प्रयुक्त होती है| शब्द ‘الْمَجِيدِ’ (अल-मजीद) क़ुरआन में अल्लाह तआला की सिफ़त (गुण) के तौर पर भी आया है और क़ुरआन के गुण के तौर पर भी। इसके अर्थ महान, यशस्वी और भव्य के हैं। उस्ताज़ इमाम लिखते हैं:

“…हर कलाम (प्रवचन) मुतकल्लिम (वाचक) के गुणों का प्रतिबिम्ब होता है। इसलिए जिस तरह अल्लाह महान और भव्य है, उसी तरह उसके वचन भी महान और भव्य हैं और यह महानता अथवा भव्यता क़ुरआन की एक एक आयत से स्पष्ट है। यह संभव नहीं है कि कोई साहिब-ए-ज़ोक़ (भाषा रसज्ञ) क़ुरआन को सुने या पढ़े और उसकी महानता और भव्यता से प्रभावित न हो। अगर कोई उसकी महानता और भव्यता से प्रभावित न हो तो वह या तो बहुत ही मंदबुद्धि है या उसका दिल पूर्णतः काला हो चूका है| आदमी तो दूर अगर यह क़ुरआन पहाड़ों पर भी उतारा जाता तो वो भी, जैसा कि क़ुरआन में कहा गया है, अल्लाह तआला के भय से टुकड़े टुकड़े हो जाते। (अमीन अह्सन इस्लाही, तदब्बुर-ए-क़ुरआन, भाग 7, पृष्ठ 533)

[3] इस वाक्य का आरम्भ शब्द ‘بل’ से हुआ है। यह इस बात का प्रमाण है कि इससे पहले एक नकारात्मक वाक्य सुबोधित है। हमने अनुवाद में उसे खोल दिया है। तात्पर्य यह है क़ुरआन से इनके भागने का कारण यह नहीं है कि यह वास्तव में उसको शायरी (कविता), ज्योतिष, जादूगरी या शैतानी प्रेरणा जैसी कोई चीज़ समझते हैं और इस बात पर दिल से संतुष्ट हो गए हैं कि यह ख़ुदा का कलाम (ईश्वरीय वाणी) नहीं है, बल्कि इसका कारण उनका अहंकार है कि यह अपने ही अन्दर के एक व्यक्ति को ख़ुदा का भेजा हुआ रसूल (ईशदूत) मानने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए इन्होंने क़ुरआन को भी नकार दिया है और क़यामत के बारे में भी कहते हैं कि यह तो बिलकुल ही असंभव और अवास्तविक है। आखिर मरने और मर कर मिट्टी हो जाने के बाद कोई व्यक्ति पुनः जीवित कैसे हो सकता है?

[4] यानी एक तो हमारा व्यक्तिगत ज्ञान है जो हर चीज़ को घेरे हुए है अर्थात सर्वव्यापी है, दूसरे प्रत्येक रचना का रिकार्ड सुरक्षित करने के लिए हमने एक दफ्तर भी स्थापित कर रखा है, जिस में रूह (आत्मा) व जिस्म (शरीर) से सम्बंधित छोटी से छोटी जानकारी दर्ज कर दी गई है। मनुष्यों के बिखरे हिस्सों को इकट्ठा कर के उसे पुनः जीवित कर देने और उसके कार्यों और उसकी बातों की जवाबदेही में हमें कोई कठिनाई आखिर किस तरह हो सकती है?

[5] मतलब यह है कि इनके झुठलाने का कारण वह शंकाएं नहीं हैं जो ये क़यामत के बारे में व्यक्त कर रहे है, बल्कि ज़िद और हठधर्मिता है। इसलिए सच यह है कि इन्होंने जानते बूझते एक स्पष्ट सत्य को झुठलाया है और वह भी उस समय, जब वह क़ुरआन मजीद के रूप में बिलकुल स्पष्ट तरीके से इनके सामने आ गया है।

[6] यानी एक बात को मानते हैं और उसी समय उसके किसी अनिवार्य परिणाम को नहीं मानते हैं। इसलिए ऐसी उलझन में पड़े हुए हैं जिससे निकलने का कोई रास्ता इनको नहीं सूझ रहा है| उस्ताज़ इमाम लिखते हैं:

“… इन्सान के रास्ते से भटक जाने में सबसे बड़ी भूमिका उसके विचारों के इसी अंतर्विरोध की है। या तो वह अपने आलस्य के कारण हर तरह के परस्पर विरोधी विचारों को दिमाग में इकट्ठा कर लेता है या अपनी मन चाही बातों के अनुसरण में सही विचारों और मान्यताओं के साथ दोषपूर्ण विचारों को भी इकट्ठा करने की कोशिश करता है जिसका नतीजा यह निकलता है कि उसका जीवन विरुद्धता का संग्रह बन जाता है। अगर इन्सान अपने विचारों का लगातार विश्लेषण करता रहे, तनक़ीद (समालोचना) की क्षमता को मरने न दे और मन की चाहतों के अनुसरण में सत्य का असत्य के साथ जोड़ मिलाने की कोशिश न करे तो वह शैतान के इस जाल से सुरक्षित रह सकता है। लेकिन ऐसे लोग कम होते हैं। (अमीन अह्सन इस्लाही, तदब्बुर-ए-क़ुरआन, भाग 7, पृष्ठ 538)

[7] यह अल्लाह तआला ने अपनी उस महान शक्ति और प्रज्ञता की ओर ध्यान खींचा है जो धरती और आकाश के हर भाग और हर कोने से प्रकट होती है और जिसे हर वह व्यक्ति खुली आँखों से देख सकता है जो गहरी दृष्टि रखने वाला हो। इसकेलिए दो शब्द प्रयुक्त हुए है: एक ‘تَبْصِرَة’ और दूसरा ‘ذِكْرَىٰ’। उस्ताज़ इमाम ने इन की व्याख्या की है। वे लिखते हैं:

“… ‘تَبْصِرَة’ से तात्पर्य आंखों के अन्दर ऐसी दृष्टि पैदा करना है कि वह बाहरी रूप से आगे बढ़ कर उस वास्तविकता तक पहुँच सकें जो उसके पीछे है और जिस की तरफ वह हमें ले जाता है। और ‘ذِكْرَىٰ’ से तात्पर्य लापरवाही के परदे को दूर करना है। मतलब यह है कि अल्लाह ने आसमान और ज़मीन के चप्पे-चप्पे को ऐसे अद्भुत चमत्कारों और अनोखे दृश्यों से भर दिया है जो आंखों के पर्दे उठाने और हृदय को झंझोड़ने और जगाने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन यह अनोखे दृश्य उन्हीं को प्रभावित करते हैं जिन में प्रभावित होने की क्षमता हो। जो लोग केवल भौतिकता के ग़ुलाम बन कर, अपनी इस सूक्ष्म दृष्टि से वंचित हो गए हों, उनके लिए यह सारा जगत अंधकार ही अंधकार है।

[8] असल में ‘مَآءً مُّبٰرَکًا’ के शब्द प्रयुक्त हुए हैं। इन में ‘مُّبٰرَکًا’ का गुण बारिश के उस फ़ायदे को व्यक्त करने के लिए आया है जो लोगों के लिए उर्वरता और तरो ताज़गी का कारण बनता है।

[9] यह व्यवस्था ‘रबूबिय्यत’ (अर्थात पालन पोषण) के इस पहलू की ओर संकेत है कि यह फ़सलें सिर्फ पकने के समय ही काम नहीं आती, बल्कि काट कर संचित भी की जाती हैं और इसकेबाद बराबर काम आती रहती हैं।

[10] बाग़ों और फसलों के बाद खजूरों का उल्लेख विशेष रूप से किया ह। उस्ताज़ इमाम लिखते हैं:

“…यह आम (सामान्य) के बाद ख़ास (विशेष) का उल्लेख इसलिए हुआ है कि अरब की ख़ास फ़सल यही थी जो उनके लिए बेहतरीन फल भी था और बड़ी हद तक उनके भोजन की ज़रूरत भी पूरी करता था। इस की ऊंचाई और अनेक परतों में इसकेगुच्छों की तरफ़ इशारा श्रोता के अन्दर जगत निरीक्षण की चेतना और कृतज्ञता का भाव पैदा करने के लिए है कि वह क़ुदरत के इन निशानों को देखे और इन से वह असर ले जो एक ग्रहणशील और सचेत दिल को लेना चाहिए।” (तदब्बुर-ए-क़ुरआन 7/541)

[11] शक्ति और प्रज्ञता के बाद ‘रुबूबिय्यत’ अर्थात पालन पोषण के पहलू को प्रमुखता से व्यक्त किया गया है। आशय यह है कि जिस ईश्वर की शक्ति, प्रज्ञता और पालन पोषण की महिमा वे देख रहे हैं, उसके लिए क्या मुश्किल है कि इनकी मौत के बाद इन्हें दोबारा उठा खड़ा करे? और वह क्यों ऐसा ना करे और इन से अपनी नेमतों (वरदानों) का हिसाब क्यों न ले, जबकि इन के पालन पोषण के लिए उस ने असाधारण प्रबंध किया है।

[12] यह प्राचीन अरबों में से किसी कौम का उल्लेख है जिस की ओर अल्लाह ने अपना रसूल (दूत) भेजा और उस को झुठलाने के कारण वे लोग ईश्वरीय प्रकोप के भागी हुए।

[13] ‘फ़िरऔन की क़ौम’ के बजाए केवल फ़िरऔन का वर्णन इसलिए हुआ कि असल अपराधी वही था।

[14] यह अल्लाह की उस सुन्नत (अटल रीति) का वर्णन है जो रसूलों के माध्यम से इत्माम-ए-हुज्जत(a) के बाद अनिवार्यतः प्रकट होती है।

[15] यह व्यंग्यात्मक वाक्य है। उस्ताज़ इमाम लिखते हैं:

“… मतलब यह है कि जब ये खुली आंखों से देख रहे हैं कि पहली बार पैदा करने में हमारे सामने कोई बाधा नहीं आई तो दोबारा क्यों कोई बाधा सामने आएगी? इन लाल बुझक्कड़ों से कोई पूछे कि किसी चीज़ को पहली बार बनाना मुश्किल होता है या दूसरी बार! अगर एक चित्रकार दूसरा चित्र पहले चित्र से ज़्यादा बेहतर बना सकता है तो हम दुनिया को पुनः आसानी से क्यों नहीं पैदा कर सकते!”  (तदब्बूर-ए-क़र्आन 7/543)

[16] मतलब यह है कि एक व्यक्ति की बातें और उसके कार्य तो एक तरफ़, उसके दिल में जो विचार उत्पन्न होते हैं, हम उनको भी जानते हैं। हमारा ज्ञान और हमारी शक्ति लोगों को हर तरफ़ से घेरे हुए है।‌ उनकी कोई चीज़ हम से छिपी हुई नहीं है, चाहे वह व्यक्त हो या अव्यक्त।

(a) इत्माम-ए-हुज्जत: सत्य को इस दर्जे में स्पष्ट तरीके से संचारित करना कि किसी के पास उसे ठुकराने का कोई संभव प्रामाणिक तर्क बाकी न रहे और व्यक्ति केवल हठधर्मिता के कारण सत्य को ठुकरा दे। (सुल्तान)

[17] असल शब्द हैं: عَنِ الْیَمِیْنِ وَعَنِ الشِّمَالِ قَعِیْدٌ‘ ۔’ इन में ‘الْیَمِیْنِ‘ के बाद ‘قَعِیْدٌ‘ का शब्द अरबी भाषा के आम नियम के अनुसार लघुता के उद्देश्य से लुप्त कर दिया है (अध्याहार)।

[18] अर्थात इत्माम-ए-हुज्जत (देखिए नोट 15) के लिए यह अतिरिक्त व्यवस्था भी हमने  कर रखी है कि दो फ़रिश्ते इंसान के दाएं और बाएं नियुक्त कर दिए हैं ताकि उसके भले और बुरे, सारे वचनों और कार्यों का रिकार्ड वे हमारी अदालत के लिए तैयार रखें।

[19] असल शब्द हैं: وَجَاءَتْ سَكْرَةُ الْمَوْتِ بِالْحَقِّ ۔ अतीत काल का प्रयोग यहां और इससे आगे की आयतों में (इस घटना की) निश्चितता को व्यक्त करने और क़यामत के दृश्य को आंखों के सामने चित्रित कर देने के लिए हुआ है।

[20] अर्थात क़यामत, जिसका आरंभ मृत्यु के साथ ही हो जाता है। इंसान जान जाता है कि उसका अंजाम क्या हुआ और आगे उसके साथ क्या होने वाला है।

[21] यह अपराधियों के निरादर के लिए व्यंग्यात्मक वचन है। मतलब यह है कि जिस चीज़ की संभावना तुम्हें दूर-दूर तक नज़र नहीं आती थी, आज देख लो, वह किस प्रकार बेनक़ाब हो गई है।

[22] यह बात हांकने वाला फ़रिश्ता भी कह सकता है और गवाही देने वाला भी। पीछे दोनों का वर्णन है, लेकिन हमने इससे हांकने वाला फ़रिश्ता अभिप्राय लिया है क्योंकि अपराधी वास्तव में उसी की निगरानी में होगा और उसी की ज़िम्मेदारी होगी कि वह उसे अदालत में पेश करे।

[23] यह केवल आदेश का वर्णन है। यह आवश्यक नहीं कि वही दोनों उसे नरक में डालेंगे। वे अगर उसे नरक में झोंकने वाले फ़रिश्तों के हवाले कर देते हैं तो आदेश का आशय अवश्य पूरा हो जाएगा।

[24] शब्द ‘خیر‘ (ख़ैर) यूं तो भलाई के सभी कामों के लिए सामान्य रूप से प्रयुक्त होता है, लेकिन लक्षण उपस्थित हो तो यह सामान्यतः अल्लाह की राह में दान करने की भलाई के अर्थ में आता है।

[25] असल में शब्द ‘مریب‘ (मुरीब) प्रयुक्त हुआ है। इसका अर्थ है: वह व्यक्ति जो संदेह में पड़ा हो। उस्ताज़ इमाम लिखते हैं:

“… यूं तो यह शब्द सामान्य है। तौहीद (एकेश्वरवाद) या आख़िरत (परलोक) जिसमें भी शक हो, वह इसके अर्थ के अंदर आता है, लेकिन क़ुरआन में मुख्यतः इसका प्रयोग उस संदेह के लिए हुआ है जो क़यामत के बारे में हो, जो इस सूरह का विषय है। यहां इस अवगुण का उल्लेख उन सारे अवगुणों की जड़ की हैसियत से हुआ है जिन का वर्णन इससे पहले हुआ है।

क़यामत के विषय में संदेह ही वह चीज़ है जो आदमी को अकृतज्ञ, विद्वेषी, कंजूस अथवा अतिचारी बनाता है। अतः इन सारी बीमारियों के वर्णन के बाद उस असल बीमारी का पता भी दे दिया जिससे यह सारी बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं। (तदब्बुर-ए- क़ुरआन 7/552)

[26] यहां शैली बदल दी है। इसका कारण यह है कि शिर्क (बहुदेववाद) का वर्णन विशेष रूप से करना उद्देश्य है। अरबी भाषा की जितनी शैलियां इन आयतों मैं प्रयुक्त की गई हैं, उस्ताज़ इमाम ने उन की व्याख्या कर दी है। वे लिखते हैं:

“… जब गुणों का वर्णन समुच्चयबोधक अव्यय रहित हो तो इसका अर्थ यह हुआ करता है कि यह सारे गुण कर्ता में एक साथ मौजूद होते हैं। इसके अतिरिक्त यह बिंदु भी सामने रहे कि यहां गुणों के वर्णन में क्रम परिणाम से कारण की ओर है। कृतज्ञता और कंजूसी से शुरू किया है,  क़यामत के इनकार और शिर्क (बहुदेववाद) पर खतम किया है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि आदमी अगर क़यामत के बारे में संदेह में पड़ा हो तो उसका आचरण वह बनता है जिसका वर्णन इन आयतों में हुआ है।

[27] नरक में झोंक दो का जो आदेश ऊपर दिया गया है, उस पर पुनः ज़ोर दिया गया है। अपराधी के अवगुणों का वर्णन करने के बाद अधिक ज़ोर से कहा है कि इस को नरक की कठोर यातना में डाल दो।

[28] इससे आगे अब नरक में प्रवेश होने के बाद के दृश्य का वर्णन हो रहा है।

[29] यह वही शैतान है जिस के बारे में सूरह ज़ुख़्रुफ़ (43) की आयत 36 में कहा है कि सुन्नत-ए-इलाही (अल्लाह के अटल नियम) के अनुसार उन लोगों पर प्रभावी हो जाता है जो अल्लाह का स्मरण करने से बेपरवाह हो जाते हैं।

[30] शैतान ने यह इस बात के प्रमाण के लिए कहा है कि यह व्यक्ति अगर उसके प्रभाव में आया तो इसलिए कि बुरे रास्ते से अपने प्रेम के कारण यह सुन्नत-ए-इलाही के अनुसार इसका पात्र बन चुका था।

[31] यह उस धमकी की तरफ इशारा है जिसका वर्णन सूरह आराफ़ (7) की आयत 16-18 में हुआ है।

[32] असल में مَا أَنَا بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ के शब्द आए हैं। इन में अत्युक्ति के निषेध का उद्देश्य नकारने में अत्युक्ति पैदा करना है। हमने अनुवाद इसी के अनुसार किया है। यह वही बात है जो क़ुरआन के अन्य स्थानों में إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ  (अल्लाह एक कण के बराबर भी किसी के साथ अन्याय नहीं करता)* और إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ النَّاسَ شَيْئًا  (अल्लाह लोगों के साथ ज़रा भी अन्याय नहीं करता)** के शब्दों में कही गई है। इस शैली के उदाहरण क़ुरआन और कलाम-ए-अरब (अरब साहित्य), दोनों में मिलते हैं।

* सूरह निसा (4): आयात 40

** सूरह यूनुस (10): आयात 4

[33] यह प्रश्नोत्तर वास्तविक भी हो सकता है या एक परिस्थिति का शाब्दिक वर्णन। तात्पर्य यह है कि प्रकोप की जिस तीव्रता से अल्लाह सवाल करेगा, उसी उत्सुकता से नरक भी उत्तर देगा कि और भी हों तो ले आइए, मेरे अंदर असीम फैलाओ है। उस्ताज़ इमाम लिखते हैं:

“यह प्रश्नोत्तर अल्लाह के निस्पृह होने और उसके असीम प्रकोप का एक चित्र है कि नरक वासियों को नरक में भरते हुए उसे ज़रा भी संकोच नहीं होगा, बल्कि वह किसी की परवाह किए बिना सब को नरक में फुँकवा देगा और फिर नरक से पूछेगा कि क्यों तेरा पेट अच्छी तरह भर गया या नहीं? मतलब यह है कि कोई इस ग़लतफ़हमी में न रहे कि इतने अनगिनत लोगों को नरक में झोंक देने के बाद परमेश्वर को कुछ दुख होगा कि अपनी पैदा की हुई इतनी रचनाओं को मैं ने आग में झोंक दिया, अपितु उसके क्रोध की तीव्रता का यह हाल होगा कि और भी हों तो उनको भी वह नरक का ईंधन बना दे। (तदब्बुर-ए-क़ुरआन 7/557)

[34] अर्थात स्वर्ग को एक भेंट की तरह उनके सामने लाया जाएगा, यद्यपि वह कुछ भी दूर नहीं होगा, पर उनके सम्मान के लिए अधिक निकट ला कर उनके सामने रख दी जाएगी।

[35] असल शब्द हैं: هَـٰذَا مَا تُوعَدُونَ لِكُلِّ أَوَّابٍ حَفِيظٍ । इनमें هَـٰذَا का संकेत उसी स्वर्ग की ओर है जिसका वर्णन ऊपर हुआ है, लेकिन यह पुंलिंग संज्ञा में इसलिए आया है कि अपने अर्थ में यहाँ इससे अभिप्राय बदला और इनाम है। مَا تُوعَدُونَ में अरबी नियम के अनुसार एक पूर्व कालिक क्रिया छिपी है (अध्याहार)। अर्थात مَا کنتم تُوعَدُونَ। मतलब यह है कि इस आचरण के लोग होंगे जो नरक वासियों के मुक़ाबले में स्वर्ग में ठहरेंगे। उस्ताज़ इमाम लिखते हैं:

“… इन दोनों गुणों पर ध्यान दीजिए तो मालूम होगा कि इन में से एक का संबंध दिल से है और दूसरे का संबंध व्यवहार से है। अगर आदमी का दिल जागरूक और जीवित हो तो जीवन के सारे हंगामों के अंदर उसका दिल निरंतर अपने प्रभु की तरफ़ झुका हुआ रहता है। किसी समय में उसपर ऐसी लापरवाही और अहंकार की स्थिति हावी नहीं होती कि उसे ईश्वर की सीमाओं अथवा वर्जित कार्यों का भी कुछ होश न रहे और वह उनको तोड़ कर रख दे। मन की इसी उकसाहट के कारण अगर उससे कभी सीमा का उल्लंघन हो जाता है त उसका दिल तुरंत सतर्क होता है और वह तौबा (पश्चाताप) और इस्तिग्फ़ार (क्षमा) के माध्यम से फिर अपने आचरण का सुधार कर लेता है। (तदब्बुर-ए-क़ुरआन 7/559)

[36] क़यामत परमेश्वर की कृपा का परिणाम है। यहाँ ‘रहमान’ के गुण का वर्णन इसी वास्तविकता की ओर संकेत के लिए आया है। इसलिए सूरह अनआम (6) की आयत 12 में उल्लेख है कि परमेश्वर ने अपने ऊपर कृपा बाध्य कर रखी है कि वह तुम्हें अवश्य क़यामत के दिन इकट्ठा कर के रहेगा।

[37] अर्थात दुख सुख और आशा निराशा कि कोई हालत भी उसे अपने प्रभु से विमुख होने पर उभार नहीं सकती है। वह हर परिस्थिति में उसपर ध्यान केन्द्रित किए रहता है।

[38] इससे आगे अब सूरह के अंत की आयतें हैं। क़ुरआन की आम शैली है कि इंज़ार (सचेत करने वाली) सूरतों के अंत में नबी (स) के लिए तसल्ली का विषय होता है। यह उसकी भूमिका है।

[39] यह उस अफ़रा-तफ़री, परेशानी और भय की तस्वीर है जो अज़ाब (प्रकोप) देखने के बाद लोगों में पैदा हुई। इसका यह अर्थ नहीं है कि उनमें से कुछ मारे गए और कुछ शरण की जगह तलाश कर लेने में सफल रहे।

[40] अर्थात अगर दिल जागरूक नहीं है तो कम से कम इतनी बात तो हो कि कान लगाकर और ध्यान के साथ सुनने के लिए तैयार हो जाएं। उस्ताद इमाम अमीन अहसन इस्लाही ने इसकी व्याख्या की है। वे लिखते हैं:
“… यह ध्यान भी इंसान के लिए बड़े आशीष का कारण है। इससे भी कभी दिल की ग़फ़्लत (लापरवाही) दूर और सीखने की क्षमता जीवित हो जाती है, लेकिन जो व्यक्ति ऐसा दुर्भाग्यशाली हो कि न उसका दिल ही जागरूक हो और न वह किसी विवेकशील व्यक्ति की बात सुनने के लिए अपने कान खोलने पर अग्रसर हो तो ऐसे आदमी के अंदर कोई विवेकशील बात किधर से रास्ता पाएगी?” (तदब्बुर-ए-क़ुरआन 7/565)

[41] असल में शब्द ايَّام (अय्याम) आया है। यह परमेश्वर के अय्याम (दिन) हैं जिन की अवधि वही जानता है। इन्हें धरती के दिन नहीं समझना चाहिए।

[42] यह वाक्य व्यंग्यपूर्ण है। मतलब यह है कि एक बार पैदा करने के बाद हम थक नहीं गए कि दोबारा पैदा करने में असमर्थ हो जाएंगे। हमारा दम खम उसी तरह क़ायम है, जिस तरह पहले था। इसलिए जब चाहेंगे, पूरे जगत को पुनः उठा खड़ा करेंगे। इस में उपलक्षित बाइबल के उस अनुवाद पर भी सूक्ष्म कटाक्ष है जिस में कहा गया है कि परमेश्वर ने छः दिन में आकाश और धरती बनाए और सातवें दिन आराम किया।

[43] यह परमेश्वर के स्मरण के पहलू से नमाज़ की परिभाषा है। उस्ताज़ इमाम लिखते हैं:
“… (परमेश्वर का) यह ज़िक्र (स्मरण) दो हिस्सों से मिल कर बना है: एक ‘तस्बीह’ (स्तुति) और दूसरा ‘हम्द’ (कृतज्ञता)। ‘स्तुति’ में तंज़ीह (पवित्रता) का पहलू प्रबल है, अर्थात परमेश्वर को उन सब अवगुणों से पवित्र और पावन बताना जो उस की शान (वैभव) के विरुद्ध है। ‘कृतज्ञता’ में पुष्टीकरण का पहलू अधिक है, अर्थात परमेश्वर को उन सद्गुणों से जोड़ना जो उसके वैभव के अनुकूल हैं। यह नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलू मिलकर परमेश्वर की यथार्थ अवधारणा को दिल में दृढ़ करते हैं और इसी दृढ़ता से परमेश्वर के साथ बंदे का सच्चा संबंध स्थापित होता है जो सारे सब्र (धैर्य) और तवक्कुल (विश्वास) का आधार है। यदि इनके अंदर किसी पहलू से कोई कमज़ोरी या असंतुलन पैदा हो जाए तो परमेश्वर के बारे में मनुष्य की अवधारणा अनुचित अथवा दोषपूर्ण हो जाती है और यह दोष उसकी सारी चिंतन और कार्यप्रणाली को अस्त-व्यस्त कर के रख देता है।” (तदब्बुर-ए-क़ुरआन 7/567)

[44] यानी फज्र (सूर्योदय से पहले) और अस्र (सूर्यास्त से पहले) के समय

[45] असल शब्द हैं: وَمِنَ اللَّيْلِ فَسَبِّحْهُ وَأَدْبَارَ السُّجُودِ। इन में مِنَ اللَّيْلِ فَسَبِّحْهُ के शब्द पहले लाए गए हैं। इसका उद्देश्य यह है कि दीन (धर्म) में महत्व और महिमा के दृष्टिकोण से नमाज़ों का क्रम स्पष्ट रहे। सूरह ताहा (20) की आयत 130 में भी इसी प्रकार कहा गया है। इन शब्दों को अंत में रख दीजिए तो ‘السُّجُودِ’ के बारे में स्पष्ट हो जाता है कि इसका निश्चयवाचक उपपद ‘अलिफ़ लाम’ पीछे आए हुए सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के स्वत्वबोधक संज्ञा का लक्षण है, अर्थात أَدْبَارَ السُّجُودِ الشَّمْس। इससे अभिप्राय ज़ुहर (दोपहर) और मग़रिब (सूर्यास्त के तुरंत बाद) की नमाज़ें हैं। इसलिए कि सूर्य के सजदे (माथा टेकने) का एक प्रारंभ और एक अंत है। वह जब शीर्षबिंदु से झुकता है तो उसके सजदे का प्रारंभ होता है और सूर्यास्त हो जाता है तो अपने सजदे के चरम को पहुंच जाता है।
नमाज़ का यह निर्देश सब्र हासिल करने के एक उपाय के तौर पर हुआ है, इसलिए कि सब्र की तौफी़क़ (सामर्थ्य) जिसको भी होती है, परमेश्वर की सहायता से होती है और परमेश्वर की सहायता पाने का एकमात्र माध्यम नमाज़ है। इसकी जिन निश्चित समय सीमाओं का वर्णन हुआ है, अगर ध्यान दीजिए तो परमेश्वर की उपासना और प्रार्थनाओं की स्वीकृति के लिए वह बहुत उचित हैं। उस्ताज़ इमाम लिखते हैं:
“… रात दिन के 24 घंटों के अंदर जो समय इस जगत में किसी बड़े परिवर्तन के प्रतीक हैं, जो परमेश्वर की महिमा और शक्ति का स्मरण कराने वाले हैं और जिनमें इस जगत की दूसरी प्रमुख चीज़ें भी परमेश्वर के आगे झुक जाती हैं, वही समय हमारी नमाजो़ के लिए निर्धारित किए गए हैं।” (तदब्बुर-ए-क़ुरआन 7/567)

[46] यह इस वास्तविकता की ओर संकेत है कि आज तो ये लापरवाह लोग इसे बहुत दूर की बात समझते हैं, लेकिन उस दिन यही अनुभव करेंगे कि पुकारने वाला मानो इनके कानों में पुकार रहा है। क़यामत के बारे में एक समझदार व्यक्ति को जिस तरह होशियार और चौकन्ना रहना चाहिए, यह उसकी सही तस्वीर है।

[47] यानी जब यह सच है की जीवन और मृत्यु हम ही देते हैं तो पुनः जीवित कर देने को असंभव क्यों समझा जाए? हम न केवल यह कि पुनः जीवित करेंगे, बल्कि इसके बाद पलटना भी हमारी ही ओर होगा। इनके कथित देवताओं अथवा मध्यस्थतीओं मैं से कोई भी वहां इनका सहायक न बन सकेगा।

[48] मतलब यह है कि जानते हैं तो इनसे निपटेंगे भी और जो कुछ यह कह रहे हैं, उसका परिणाम भी इन्हें अवश्य भुगतना पड़ेगा। 

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