Religion, Philosophy and the Heart

2- सूरह बक़रह

उर्दू अनुवाद: जावेद अहमद गामिदी
हिन्दी रूपान्तरण: मुश्फ़िक़ सुल्तान

परमेश्वर के नाम से जो सर्वथा दया है, जिसकी कृपा शाश्वत है। 

यह सूरह ‘अलिफ़, लाम, मीम’ है। यह ईश्वरीय ग्रंथ है, इसके ईश्वरीय ग्रंथ होने में कोई संदेह नहीं। मार्गदर्शन है इन परमेश्वर से डरने वालों के लिए जो बिन देखे मान रहे हैं और नमाज़ की स्थापना कर रहे हैं और जो कुछ हमने इन्हें दिया है, उसमें से (हमारे मार्ग में) दान कर रहे हैं। और जो उसे भी मान रहे हैं जो तुम्हारी ओर उतारा गया और उसे भी जो तुम से पूर्व उतारा गया और वे परलोक पर विश्वास रखते हैं। यही अपने प्रभु के मार्ग पर हैं और यही हैं जो सफलता पाने वाले हैं। (1-5)

(इसके विपरीत) जिन लोगों ने इस ग्रंथ को अस्वीकार करने का निर्णय कर लिया है, उनके लिए समान है, तुम उन्हें सचेत करो या न करो, वे नहीं मानेंगे। उनके दिलों और कानों पर अब परमेश्वर ने (अपने नियम अनुसार) ठप्पा लगा दिया है और उनकी आंखों पर पर्दा है, और क़यामत के दिन एक भीषण यातना है, जो उनकी प्रतीक्षा में है। (6-7)

और इन्हीं लोगों में वे (कपटी) भी हैं जो यह कहते हैं कि हमने परमेश्वर को माना है और परलोक को माना है, यद्यपि वे इनमें से किसी चीज़ को भी नहीं मानते। वे परमेश्वर और मानने वालों, दोनों को धोखा देना चाहते हैं, और वस्तुतः अपने आप ही को धोखा दे रहे हैं, परंतु इन्हें इसका बोध नहीं होता। इनके मन में (ईर्ष्या का) रोग था तो परमेश्वर ने अब इनके इस रोग को और बढ़ा दिया है, और इनके इस अपराध के कारण कि यह झूठ बोलते रहे हैं, इनके लिए बड़ी कष्टदायक यातना है। और जब इनसे कहा जाता है कि (अपने इस आचरण से) तुम इस भूभाग में बिगाड़ पैदा न करो, तो जवाब में कहते हैं कि हम ही तो सुधार करने वाले हैं। सावधान रहो, यही बिगाड़ पैदा करने वाले हैं, परंतु इसकी समझ नहीं रखते। और जब इनसे कहा जाता है कि तुम भी उसी प्रकार मान लो, जिस प्रकार (तुम्हारे सामने) यह लोग मान गए हैं तो (बड़े अहंकार से) कहते हैं कि क्या हम इन मूर्खों की तरह मान लें? सुन लो, यही मूर्ख हैं, लेकिन नहीं जानते। और जब मुसलमानों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हमने मान लिया और जब अलग से अपने शैतानों के पास पहुंचते हैं तो कहते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो मज़ाक कर रहे थे। (यह क्या मज़ाक करेंगे? सच यह है कि) परमेश्वर इनके साथ मज़ाक कर रहा है और इनके अहंकार में इनकी रस्सी (अपने नियम अनुसार) लंबी किए जाता है, इस प्रकार कि भटकते फिर रहे हैं। यही हैं जिन्होंने सन्मार्ग पर मार्ग से भटकने को प्राथमिकता दी तो इनका यह सौदा (इनके लिए) कुछ भी लाभदायक न हुआ और न यह उचित मार्ग पा सके हैं। (8-16)

इनका उदाहरण ठीक ऐसा है, जैसे (अंधेरी रात में) किसी व्यक्ति ने आग जलायी, फिर जब आग ने उसके आस-पास को प्रकाशित कर दिया तो जिनके लिए आग जलायी गई थी, परमेश्वर ने उनका प्रकाश छीन लिया और उन्हें इस प्रकार अँधेरों में छोड़ दिया कि वे कुछ देख नहीं सकते; बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं, इसलिए अब वे नहीं लौटेंगे। या ऐसी है जैसे आकाश से बारिश हो रही है, उसमें अंधेरी घटाएँ भी हैं और गरज-चमक भी, वे मृत्यु के भय से गरज के मारे अपनी उँगलियाँ अपने कानों में ठूंस रहे हैं, यद्यपि इस प्रकार के नकारने वालों को परमेश्वर हर दिशा से घेरे हुए है। बिजली की चमक इनकी आँखें चकित कर रही है; जब इनपर चमकती है, यह उसमें कुछ चल लेते हैं और जब इनपर अंधेरा छा जाता है तो खड़े रह जाते हैं। यदि परमेश्वर चाहता तो इनके कान और आँखें भी छीन लेता। निःसंदेह, परमेश्वर हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है। (17-20)

(इनके पीछे लगकर तुम अपने आप को बर्बाद क्यों करते हो)? तुम अपने उस प्रभु की भक्ति करो, लोगो, जिसने तुम्हें पैदा किया है और तुमसे पहले लोगों को भी, इसलिए कि तुम (उसके दंड से) बचे रहो। (वही) जिसने तुम्हारे लिए धरती को बिछौना और आकाश को छत बनाया है और आकाश से पानी उतारा है, फिर उससे तुम्हारे पालन-पोषण के लिए अनेक प्रकार के फल पैदा कर दिए हैं। इसलिए तुम परमेश्वर के सहभागी न बनाओ, यद्यपि तुम इन सब बातों को जानते हो। (21-22)

(यही इस ग्रन्थ का आह्वान है, इसे स्वीकार करो), और जो कुछ हमने अपने बन्दे पर उतारा है, उसके बारे में यदि तुम्हें संदेह है तो (जाओ और) इसके जैसी एक सूरह ही बना लाओ और (इसके लिए) परमेश्वर को छोड़ तुम्हारे जो समर्थक हैं, उन्हें भी बुला लो, यदि तुम (अपनी इस कल्पना में) सच्चे हो। फिर यदि न कर सको और कदापि न कर सकोगे तो उस अग्नि से डरो जिसका ईंधन वे लोग भी होंगे जो नहीं मानते और उनके वे पत्थर भी जिन्हें वे पूजते हैं। वह इन्हीं नकारने वालों के लिए तैयार की गई है। और उनको जिन्होंने (इस ग्रन्थ को) स्वीकार किया और अच्छे कर्म किए, इस बात की शुभ-सूचना दो, (हे पैगंबर) कि उनके लिए ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे झरने बहते होंगे। उनका कोई फल उन्हें जब भी खाने के लिए दिया जाएगा तो कहेंगे: यह तो वही है जो इससे पहले हमें दिया गया, यद्यपि उनको यह उससे मिलता जुलता दिया जाएगा, और उनके लिए वहां निर्मल पत्नियाँ होंगी और वे उनमें सदा रहेंगे। (23-25)

(यह स्वर्ग का दृष्टांत है, और) परमेश्वर इस बात से नहीं शर्माता कि (किसी वास्तविकता की व्याख्या के लिए) वह मच्छर या इससे भी छोटी किसी वस्तु का उदाहरण दे। फिर जो मानने वाले हैं, वे जानते हैं कि यह उनके प्रभु की ओर से सत्य आया है, और जो नहीं मानते, वे कहते हैं कि इस उदाहरण से परमेश्वर का उद्देश्य क्या है? (इस प्रकार) परमेश्वर अनेक लोगों को इससे भटकाता है और अनेक लोगों को इसके द्वारा सन्मार्ग दिखाता है, और सत्य यह है कि वह इससे भटकाता तो अवज्ञाकारियों ही को है जो परमेश्वर से किए हुए अपने वचन को तत्पश्चात तोड़ देते हैं और परमेश्वर ने जिसको जोड़ने का आदेश दिया है, उसे काटते हैं, और इस प्रकार धरती में बिगाड़ पैदा करते हैं। यही हैं जो (इस लोक और परलोक, दोनों में) असफल हैं। (26-27)

(लोगो), तुम परमेश्वर को किस प्रकार नकारते हो, यद्यपि तुम मृत थे तो उसने तुम्हें जीवन प्रदान किया? फिर वही तुमको मारता है, फिर वही जीवित करेगा, फिर तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे। वही जिसने तुम्हारे लिए धरती के  सब पदार्थ उत्पन्न किए, फिर आकाश की ओर ध्यान किया और सात आकाश बराबर संतुलित कर दिए, और वह प्रत्येक विषय का ज्ञान रखने वाला है। (28-29)

(इनसे पूछो, हे पैगंबर कि यह किस प्रकार नकारने वाले हो सकते हैं)? और (इस दुनिया के बारे में हमारी योजना को समझने के लिए) वह घटना इन्हें सुनाओ, जब तुम्हारे प्रभु ने फ़रिश्तों से कहा: मैं पृथ्वी में एक ऐसे प्राणी की रचना करने वाला हूं जिसे (उसकी) सत्ता दी जाएगी। उन्होंने निवेदन किया: क्या आप उसमें ऐसा प्राणी बनाएंगे जो वहां बिगाड़ करेगा और खून बहाएगा, और इधर हमारा मामला यह है कि आप की स्तुति एवं प्रशंसा के साथ हम आपकी पवित्रता का जाप कर रहे हैं? कहा: मैं जानता हूं जो तुम नहीं जानते, और (उन्हें समझाने के लिए) आदम को सब नाम सिखा दिए। फिर (जिनके नाम सिखाए), उन व्यक्तियों को फ़रिश्तों के सामने प्रस्तुत किया। फिर कहा: मुझे इन लोगों के नाम बताओ, यदि तुम (अपने इस विचार में) सच्चे हो। उन्होंने निवेदन किया: आपका व्यक्तित्व दोष-रहित है, हम तो इतना ही जानते हैं, जितना आपने हमें बताया है, सर्वज्ञ एवं तत्वदर्शी तो वास्तव में आप ही हैं। कहा: आदम, तुम इन लोगों के नाम इन्हें बताओ। फिर जब उसने उनका परिचय उन्हें करा दिया तो कहा: मैंने तुमसे कहा न था कि मैं आकाशों तथा पृथ्वी के भेद जानता हूं और मैं जानता हूं जो तुम व्यक्त कर रहे हो और जो तुम छिपा रहे थे। (30-33)

और (हमारी इस योजना में मनुष्य की परीक्षा को समझने के लिए) वह घटना भी इन्हें सुनाओ, जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम के आगे माथा टेक दो तो इब्लीस को छोड़ वे सब उसके सामने नतमस्तक हो गए। उसने नहीं माना और अकड़ बैठा और इस प्रकार अवज्ञाकारियों में सम्मिलित हुआ। और हमने कहा: हे आदम, तुम और तुम्हारी पत्नी, दोनों इस बाग़ में रहो और इसमें से जहां से चाहो, निःसंकोच होकर खाओ। हां, किंतु तुम दोनों इस वृक्ष के पास न जाना, अन्यथा अत्याचारी बन जाओगे। फिर शैतान ने उनको वहां से फुसला दिया और जिस अवस्था में वे थे, उससे उन्हें निकलवा कर छोड़ा। और हमने कहा: (यहां से) उतर जाओ, अब तुम एक दूसरे के शत्रु हो और तुम्हें एक निश्चित अवधि तक पृथ्वी पर ठहरना है और वहीं जीवन बिताना है। फिर आदम ने अपने प्रभु से (पछतावे) के कुछ शब्द सीख लिए (और उनके माध्यम से क्षमा मांगी) तो उसपर उसने कृपा की और उसे क्षमा कर दिया।  निःसंदेह, वही बड़ा क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। हमने कहा: तुम सब यहां से उतर जाओ, फिर मेरी ओर से यदि कोई मार्गदर्शन तुम्हें प्राप्त हो, तो उसी पर चलना, इसलिए कि जो लोग मेरे इस मार्गदर्शन का अनुसरण करेंगे, उनका बदला स्वर्ग है, अतः उनके लिए न वहां कोई भय है और न वे कभी उदासीन होंगे। और जिन्होंने (इसको) नकारा और हमारी आयतों को झूठा बताया, वे नरक वासी हैं, वे सदा उसी में रहेंगे। (34-39)

(क़ुरआन तुम्हारे लिए यही मार्गदर्शन लेकर आया है, इसलिए) हे इस्राईल पुत्रो , मेरे उस वरदान को याद करो जो मैंने तुम पर किया था और मेरी प्रतिज्ञा को पूरा करो, मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा को पूरा करूंगा और मुझी से डरते रहो, और इस (क़ुरआन) को स्वीकार करो जो मैंने उस चीज़ की पुष्टि में उतारा है जो तुम्हारे पास है, और सबसे पहले तुम ही इसके ठुकराने वाले न बन जाओ, और थोड़ी धनराशि के बदले मेरी आयतें न बेचो, और मेरे ही क्रोध से बचो; और सत्य को असत्य के साथ न मिलाओ, (यह सत्य को छिपाने का प्रयत्न है) और जानते बूझते सत्य को छिपाने का प्रयत्न न करो; और नमाज़ का प्रबंध करो और ज़कात देते रहो; और इन झुकने वालों के साथ तुम भी (परमेश्वर के सामने) झुक जाओ। क्या तुम लोगों को भलाई का उपदेश करते हो और अपने आप को भूल जाते हो, यद्यपि तुम ईश्वरीय ग्रंथ का पाठ करते हो? फिर क्या तुम समझते नहीं हो? और (इस मार्ग पर चलने के लिए) धैर्य और नमाज़ के द्वारा सहायता चाहो, और इसमें संदेह नहीं कि यह सब अत्यंत भारी है, किंतु उनके लिए भारी नहीं जो परमेश्वर से डरने वाले हैं, जिन्हें याद है कि उन्हें अपने प्रभु से मिलना है और उनको (एक दिन) उसी की ओर पलट कर जाना भी है। (40-46)

हे इस्राईल पुत्रो , मेरे उस वरदान को याद करो जो मैंने तुम पर किया था और इस बात को कि मैंने तुम्हें समस्त मानवता पर श्रेष्ठता प्रदान की थी, और उस दिन से डरो, जब कोई किसी के कुछ भी काम न आएगा और न उससे कोई अनुशंसा स्वीकार की जाएगी और न उससे कोई हर्जाना लिया जाएगा और न लोगों को कोई सहायता ही मिलेगी। (47-48)

और याद करो, जब हमने तुमको फ़िर्औन के लोगों से छुड़ाया। वे तुम्हें भीषण यातनाएं चखाते थे, तुम्हारे बेटों को ढूंढ-ढूंढ कर मौत के घाट उतार देते थे और तुम्हारी स्त्रियां जीवित रखते थे और (तुम्हें) इस (यातना से छुड़ाने) में तुम्हारे प्रभु की ओर से (तुम्हारे लिए) बड़ी कृपा थी। (49)

और याद करो, जब हमने तुम्हें साथ लेकर सागर को चीर दिया और इस प्रकार तुम्हें बचा लिया और फ़िर्औन के लोगों को तुम्हारे देखते-देखते हमने उसी सागर में डुबो दिया। (50)

और याद करो, जब हमने मूसा से चालीस रातों का वादा किया। फिर उसकी अनुपस्थिति में तुमने वह बछड़ा बना लिया, और उस समय तुम अपने आप पर अत्याचार कर रहे थे। फिर इसके पश्चात भी हमने तुम्हें क्षमा कर दिया, इसलिए कि तुम आभार करने वाले बन जाओ। (51-52)

और याद करो, जब हमने मूसा को ग्रंथ, अर्थात (सत्य-असत्य में भेद करने के लिए) कसौटी प्रदान की, इसलिए कि (इसके माध्यम से) तुम मार्गदर्शन प्राप्त करो। (53)

और याद करो, जब मूसा ने अपने लोगों से कहा: मेरे वंश के लोगो, तुमने यह बछड़ा बनाकर अपने ऊपर अत्याचार किया है, इसलिए अब अपने रचयिता की ओर लौटो, और (इसके लिए) अपने इन लोगों का (अपने हाथों से) वध करो। यह तुम्हारे लिए तुम्हारे रचयिता के निकट उत्तम है। इसलिए तुमने यह किया तो उसने तुम पर कृपा की और तुमको क्षमा कर दिया। निःसंदेह वही बड़ा क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। (54)

और याद करो, जब तुमने कहा कि हे मूसा, हम तुम्हारी बात पर कदापि विश्वास नहीं करेंगे, जब तक हम परमेश्वर को साक्षात न देख लें। इस पर तुमको कड़क ने आ पकड़ा और तुम देखते रह गए। फिर तुम्हारी इस मृत्यु के पश्चात हमने तुम्हें पुनः जीवित किया, इसलिए कि तुम आभारी बन कर रहो। और तुम पर बादलों का साया किया और तुम पर मन्न-ओ-सल्वा उतारे, खाओ यह निर्मल भोजन पदार्थ जो हमने तुम्हें प्रदान किए हैं। (खेदजनक है कि जिन पर यह कृपा हुई, उन्होंने इसका अनादर किया) और (इस प्रकार) उन्होंने हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा, अपितु अपने ही ऊपर अत्याचार करते रहे। (55-57)

और याद करो, जब हमने कहा कि इस बस्ती में प्रवेश करो, फिर इसमें से जहां से चाहो, आनंदपूर्वक खाओ और (याद रखो कि) इसके द्वार में (विनम्रता के साथ) सर झुकाए हुए प्रवेश करना और प्रार्थना करना कि (प्रभु), हमारे पाप क्षमा कर दे, हम तुम्हारे पापों को क्षमा कर देंगे और (तुममें से) वे लोग जो भला आचरण अपनाएंगे उन पर शीघ्र ही हम और भी कृपा करेंगे।  फिर जो बात उनसे कही गई थी, अत्याचारियों ने उसे एक दूसरी बात से बदल दिया। इसलिए इन अत्याचारियों पर हमने आकाश से दंड उतारा, अवज्ञा के उन कार्यों के फलस्वरूप जो वे कर रहे थे। (58-59)

और याद करो, जब मूसा ने अपने लोगों के लिए पानी की प्रार्थना की तो हमने कहा: अपनी लाठी इस पत्थर पर मारो। (उसने मारी) तो उससे बारह धाराएं बह निकलीं, इस प्रकार कि प्रत्येक कुटुंब ने अपने लिए पानी लेने का स्थान निर्धारित कर लिया। परमेश्वर की इस जीविका से खाओ और पियो, (हे इस्राईल पुत्रो ), और पृथ्वी में बिगाड़ न फैलाते फिरो। (60)

और याद करो, जब तुमने कहा: हे मूसा, हम एक ही खाने पर कदापि धैर्य न करेंगे। अतः हमारे लिए अपने प्रभु से प्रार्थना करो कि यह सब्ज़ी, ककड़ी, लहसुन, मसूर और प्याज़ जो धरती उगाती है, वह इन पदार्थों में से हमारे लिए निकाल कर लाए। उसने कहा: तुम एक उत्तम पदार्थ को तुच्छ वस्तुओं से बदलना चाहते हो? अच्छा तो जाओ, किसी मिस्र ही में जा रहो। इसलिए कि यह जो कुछ तुम मांगते हो, वहां तुमको मिल जाएगा। (वे यही करते रहे) और उनपर अपमान तथा दरिद्रता थोप दी गई और उन्हें परमेश्वर का प्रकोप प्राप्त हुआ। यह इस कारण हुआ कि वे परमेश्वर की आयतों को नहीं मानते थे और उसके नबियों की अन्याय पूर्वक हत्या करते थे। यह इस कारण हुआ कि उन्होंने अवज्ञा की और वे (परमेश्वर की बनाई किसी मर्यादा) का पालन नहीं करते थे। (61)

(अतः कर्म-फल का नियम पूर्णतः निष्पक्ष है, इसलिए) वे लोग जो (श्री मुहम्मद को) मान चुके हैं और जो (इनसे पहले) यहूदी हुए और जो ईसाई तथा साबी कहलाते हैं, उनमें से जिन लोगों ने भी परमेश्वर को माना और क़यामत के दिन को माना और भले कर्म किए हैं, उनके लिए उनका अच्छा फल उनके प्रभु के पास है और (उसके यहाँ) उनके लिए न आशंका और न वे कभी उदासीन होंगे। (62)

और याद करो, जब हमने तुमसे वचन लिया था और (इसके लिए) तूर पर्वत को तुम पर उठाया था और कहा था कि उस चीज़ को दृढ़ता पूर्वक पकड़ो जो हमने तुम्हें दी है, और जो कुछ उसमें (लिखा) है उसे याद रखो ताकि तुम (परमेश्वर के प्रकोप से) बचे रहो। फिर इसके बाद भी तुम उससे फिर गए। अतः सत्य यह है कि यदि परमेश्वर की कृपा और उसकी दया तुम पर न होती तो (अपने इस आचरण के कारण) तुम बड़े दुर्भाग्यशाली होते, और तुम उन्हें भी जानते ही हो जिन्होंने तुम्हारे लोगों में से सब्त के दिन का अनादर किया तो हमने उनसे कहा: जाओ तिरस्कृत बंदर बन जाओ। इस प्रकार उनकी उस बस्ती को, (जिसमें उन्होंने सब्त का अनादर किया था), हमने उसके आसपास के लिए एक उदाहरण और परमेश्वर से डरने वालों के लिए शिक्षा का एक माध्यम बना दिया। (63-66)

और याद करो, जब मूसा ने अपने लोगों से कहा: परमेश्वर तुम्हें आदेश देता है कि (ख़ून पर शपथ लेने के लिए) तुम एक गाय का वध करो। वे कहने लगे: क्या तुम हमसे मज़ाक करते हो? उसने कहा: मैं परमेश्वर की शरण मांगता हूं कि इस प्रकार का अशिष्ट बन जाऊं। उन्होंने कहा: अच्छा, अपने प्रभु को हमारे लिए पुकारो कि वह हमें बताए कि गाय कैसी होनी चाहिए। उसने कहा: वह कहता है कि गाय न बूढ़ी हो न बछिया, उनके बीच के आयु की हो। अब जाओ और वह करो जिसका तुम्हें आदेश दिया जा रहा है। बोले: अपने प्रभु को हमारे लिए पुकारो कि वह हम पर यह भी स्पष्ट करे कि उसका रंग कैसा हो। उसने कहा: वह कहता है कि वह गाय सुनहरी हो, गहरे रंग वाली, ऐसी कि देखने वालों को प्रसन्न करे। बोले: (एक बार और) अपने प्रभु को हमारे लिए पुकारो कि हमको अच्छी तरह स्पष्टता के साथ बताए कि वह कैसी हो, हमें गाय के विषय में कुछ दुविधा हो रही है, और प्रभु ने चाहा तो अब हम अवश्य उसका पता लगा लेंगे। उसने कहा: वह कहता है कि वह गाय काम-काज वाली न हो कि भूमि जोतती और खेती को पानी देती हो। वह एक ही रंग की हो उसमें किसी दूसरे रंग की मिलावट न हो। बोले: अब तुम स्पष्ट बात लाए हो। इस प्रकार उन्होंने उसका वध किया और लगता न था कि वे ऐसा करेंगे। (67-71)

और वह घटना भी याद करो, जब तुम ने एक व्यक्ति की हत्या कर दी। फिर (झूठे शपथ खाए और) इसका आरोप एक दूसरे पर धरने लगे, और परमेश्वर ने निर्णय कर लिया कि जो कुछ तुम छिपा रहे थे, वह उसे प्रकट कर देगा। अतः हमने कहा: इस (मुर्दे) को उसी (गाय) का एक टुकड़ा मारो (जो शपथ लेने के लिए मारी गई है तो वह जीवित हो गया)। परमेश्वर इसी प्रकार मृतकों को जीवित करेगा और वह तुम्हें अपनी निशानियां दिखाता है ताकि तुम समझ से काम लो। (72-73)

(तुम यही करते रहे, यहां तक कि) इसके बाद फिर तुम्हारे मन कठोर हो गए, इस प्रकार कि जैसे वे पत्थर हैं या उनसे भी अधिक कठोर। और पत्थरों में तो ऐसे भी हैं जिनसे दरिया फूटते हैं और उनमें ऐसे भी हैं जो फट जाते हैं और उनसे पानी बह निकलता है और उनमें ऐसे भी हैं कि परमेश्वर के भय से गिर पड़ते हैं। (यह वास्तविकता है कि तुम यही करते रहे हो), और जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे अंजान नहीं है। (74)

इतना होते हुए भी, (मुसलमानो), क्या तुम (इनसे) यह आशा रखते हो कि यह तुम्हारी बात मान लेंगे? और (यह वह लोग हैं) कि इनमें से एक समूह परमेश्वर के वचन सुनता रहा है और उसे अच्छी तरह समझ लेने के बाद जानबूझकर कर उसमें परिवर्तन करता रहा है। और (यह वह लोग हैं कि) जब मुसलमानों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हमने मान लिया और जब आपस में अकेले होते हैं तो कहते हैं: क्या तुम इनको वह बताते हो जो परमेश्वर ने तुम पर व्यक्त किया है कि वह इसके आधार पर तुम्हारे प्रभु के पास तुमसे वाद विवाद करें। फिर क्या तुम समझते नहीं हो? क्या यह नहीं जानते कि जो कुछ यह छिपाते हैं और जो कुछ व्यक्त करते हैं, परमेश्वर उन सब बातों से अवगत है? और (यह वह लोग हैं कि) इनमें अनपढ़ जनमानस भी हैं जो परमेश्वर के ग्रंथ को केवल (अपनी) इच्छाओं का एक संग्रह समझते हैं और अपनी अटकलों ही पर चलते हैं- अतः विनाश ही है उनके लिए जो अपने हाथों से धर्म-विधि लिखते हैं, फिर कहते हैं: यह परमेश्वर की ओर से है ताकि इसके माध्यम से थोड़ी सी धनराशि प्राप्त कर लें। अतः विनाश है उनके लिए उस चीज़ के कारण जो उनके हाथों ने लिखी और विनाश है उनके लिए उस चीज़ के कारण जो (उसके माध्यम से) वह कमाते हैं- और (यह वह लोग हैं कि) इन्होंने दावा किया है कि नरक की आग हमें कदापि न छूएगी। हां, मात्र कुछ दिनों का कष्ट, अपितु हो सकता है। इनसे पूछो, क्या परमेश्वर से तुमने कोई वचन लिया है? इसलिए कि यदि वचन लिया है तो परमेश्वर किसी परिस्थिति में अपने वचन का उल्लंघन नहीं करेगा या तुम परमेश्वर पर ऐसा लांछन लगाते रहे हो जिसके बारे में तुम कुछ नहीं जानते। हाँ, क्यों नहीं, जिन लोगों ने कोई बुराई कमाई है और उनके पाप ने उन्हें सर्वत्र घेर लिया है, वही नरक वासी हैं, वे उसमें सदा रहेंगे। और जिन्होंने मान लिया और भले कर्म किए, वही स्वर्ग के निवासी हैं। वे उसमें सदा रहेंगे। (75-82)

और याद करो, जब हमने इस्राईलियों से वचन लिया कि तुम परमेश्वर को छोड़ किसी की उपासना नहीं करोगे और माता-पिता के साथ तथा रिश्तेदारों और अनाथ और असहाय लोगों के साथ भला व्यवहार करोगे। और वचन लिया कि लोगों से भली बात कहो और नमाज़ का प्रबंध करो और ज़कात दिया करो। फिर तुममें से कुछ लोगों को छोड़ तुम सब (उससे) फिर गए और वास्तव में तुम फिर जाने वाले लोग ही हो। (83)

और याद करो, जब हमने तुमसे वचन लिया कि आपस में रक्त नहीं बहाओगे और अपने लोगों को अपनी बस्तियों से नहीं निकालोगे। फिर तुमने स्वीकार किया और तुम इसके साक्षी हो। फिर यह तुम्ही हो कि अपनों की हत्या करते हो और अपने ही एक समूह को उनकी बस्तियों से निकालते हो, इस प्रकार कि अत्याचार तथा अधिकार हनन के साथ उनके विरुद्ध एक दूसरे की सहायता करते हो, यदि वे तुम्हारे पास बन्दी बनकर आएँ तो अर्थदण्ड देकर उन्हें छुड़ाते हो, यद्यपि उनका निकालना ही तुम्हारे लिए अनुचित था। फिर क्या तुम ईश्वरीय ग्रंथ के एक भाग को मानते और दूसरे भाग को नकारते हो? अतः तुममें से जो यह करते हैं, उनका दंड दुनिया के जीवन में अपमान के अतिरिक्त कुछ नहीं और क़यामत के दिन वह भीषण से भीषण यातना में पहुंचा दिए जाएंगे। (तुम यही करते हो) और जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे अंजान नहीं है—- यही वे लोग हैं जिन्होंने परलोक को देकर दुनिया के जीवन को ख़रीद लिया, इसलिए अब न इनकी यातना ही हल्की होगी और न कोई सहायता इन्हें मिलेगी। (84-86)

और हमने मूसा को ग्रंथ दिया था और उसके बाद निरंतर अपने पैगंबर भेजे थे, और मर्यम के पुत्र ईसा को (उन सब के बाद) स्पष्ट निशानियाँ दी, और रूह-उल-कुदुस द्वारा उसकी सहायता की (तो जानते हो कि उनके साथ तुम्हारा व्यवहार कैसा रहा)? फिर क्या यही होगा कि जब भी (हमारा) कोई पैगंबर वह बातें लेकर तुम्हारे पास आएगा जो तुम्हारी इच्छाओं के विपरीत होंगी, तो तुम (उसके सामने) घमंड ही करोगे? फिर एक समूह को झुठला दोगे और एक समूह की हत्या करोगे—- और (यह वह लोग हैं कि) इन्होंने कहा: हमारे दिलों पर पट्टियाँ हैं। नहीं, अपितु इनके इस नकारने के कारण परमेश्वर ने इन्हें अभिशापित किया है, इसलिए (अब) यह कम ही मानेंगे। (87-88)

और (यह वह लोग हैं कि) जब परमेश्वर की ओर से एक ग्रंथ इनके पास आया, उन भविष्यवाणियों की पुष्टि में जो इनके पास हैं, और इससे पहले यह (उसी के नाम पर) अपने धर्म को नकारने वालों के विरुद्ध विजय की प्रार्थनाएँ कर रहे थे, फिर जब वह चीज़ इनके पास आई जिससे अच्छी तरह परिचित थे तो यह उसको नकारने वाले बन गए। अतः परमेश्वर का अभिशाप है इन नकारने वालों पर। कैसी बुरी है वह चीज़ जिसके बदले में इन्होंने अपने आप को बेच दिया कि केवल इस हठ के कारण कि परमेश्वर अपने दास जनों में से जिसपर चाहे अपनी कृपा उतारे, यह उस चीज़ को नकार दें जो परमेश्वर ने उतारी है। अतः यह प्रकोप पर प्रकोप कमा लाए और (इस लोक तथा परलोक में) इन नकारने वालों के लिए (अब) अत्यंत अपमानजनक यातना है। (89-90)

और (यह वह लोग हैं) जब इनसे बार-बार कहा जाता है कि उस चीज़ को मान लो जो परमेश्वर ने उतारी है तो उत्तर देते हैं कि हम तो उसे ही मानते हैं जो हम पर उतरा है और इस प्रकार जो कुछ उसके अतिरिक्त है, उसको स्पष्टतः नकार देते हैं, यद्यपि वही सत्य है, पूर्णतः उन भविष्यवाणियों के अनुरूप जो उनके पास हैं। इनसे पूछो, (वह मार्गदर्शन जो तुम पर उतरा है), यदि तुम (उसके) मानने वाले हो तो इससे पहले फिर परमेश्वर के (उन) नबियों की हत्या क्यों करते रहे हो (जो तुम्हारी ओर आए)? और वस्तुतः मूसा तुम्हारे पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आया, फिर उसकी पीठ पीछे तुमने बछड़े को पूज्य प्रभु बना लिया और उस समय तुम बड़ा अन्याय कर रहे थे। (91-92)

और याद करो, जब हमने तुमसे वचन लिया और (इसके लिए) तूर पर्वत को तुम पर उठा दिया और आदेश दिया कि यह जो कुछ हमने तुम्हें दिया है, इसे दृढ़ रूप से पकड़ो, और सुनो (और मानो) तो (तुम्हारे पूर्वजों ने जो चाल-चलन उसके साथ अपनाया, उसने बता दिया कि) उन्होंने (मानो उस समय यही) कहा कि हमने सुना और नहीं माना। और उनके इस कुफ़्र के कारण वह बछड़ा उनके दिलों में बसा दिया गया। इनसे पूछो, यदि तुम मानने वाले हो तो कैसी बुरी हैं यह बातें जो तुम्हारी यह मान्यता तुम्हें सिखाती है! (93)

इनसे कहो, यदि परलोक का घर परमेश्वर के पास, सब लोगों को छोड़ कर केवल तुम्हारे लिए आरक्षित है तो मृत्यु की कामना करो, यदि तुम (अपने इस दावे में) सच्चे हो, और (तुम देखोगे कि) अपने हाथों की जो कमाई यह आगे भेज चुके हैं, उसके कारण यह कभी इस की कामना नहीं करेंगे और वस्तुतः परमेश्वर इन अत्याचारियों को भली-भांति जानता है। (94-95)

और इन्हें तुम सबसे बढ़कर जीने का लोभी पाओगे, और (इतना अधिक कि) उन लोगों से भी बढ़कर जिन्होंने शिर्क को अपना धर्म बनाया है। इनमें से हर एक यह चाहता है कि काश, वह हज़ार वर्ष जीता रहे, यद्यपि यदि यह आयु भी उसे मिल जाए तो (इससे) वह अपने आप को परमेश्वर के प्रकोप से बचा नहीं सकेगा। और (इसमें संदेह नहीं कि) जो कुछ यह करते हैं, परमेश्वर उसे देख रहा है। 96

(क़ुरआन की शत्रुता में अब यह जिबरील के भी शत्रु हो गए हैं), इनसे कह दो, जो लोग जिबरील के शत्रु हैं, वे वास्तव में परमेश्वर के शत्रु हैं, इसलिए कि उसने तो (हे पैगंबर), इसे परमेश्वर की अनुमति ही से तुम्हारे हृदय पर उतारा है, उन भविष्यवाणियों की पुष्टि में जो इससे पूर्व की गई हैं और उन लोगों के लिए मार्गदर्शन और शुभ-सूचना के तौर पर जो मानने वाले हैं। (इन्हें जानना चाहिए कि) जो परमेश्वर और उसके फ़रिश्तों और उसके रसूलों तथा जिबरील और मीकाईल के शत्रु हैं तो परमेश्वर भी ऐसे काफ़िरों का शत्रु है। 97-98

और, (इस क़ुरआन के रूप में, हे पैगंबर), हमने तुम्हारी ओर अत्यंत स्पष्ट प्रमाण उतार दिए हैं, और सत्य यह है कि उन्हें केवल इस प्रकार के अवज्ञाकारी ही नहीं मानते। क्या यही होता रहेगा कि जब यह कोई वचन बांधेंगे, इनमें से एक समूह उसे उठाकर फेंक देगा? अपितु (सत्य यह है कि) इनमें से अधिकतर तो ईमान नहीं रखते। 99-100

और (अब भी यही हुआ है कि) जब परमेश्वर की ओर से एक पैगंबर उन भविष्यवाणियों के अनुरूप इनकी ओर आ गया है जो इनके पास हैं तो यह लोग जिन्हें धर्मग्रंथ दिया गया, इनमें से एक समूह ने परमेश्वर के इस ग्रंथ को इस प्रकार अपनी पीठ के पीछे फेंक दिया, मानो कि वह इसे जानते ही नहीं, और (पैगंबर को नुकसान पहुंचाने के लिए) उस चीज़ के पीछे लग गए जो सुलैमान के राज्य के नाम पर दुष्ट जन पढ़ते पढ़ाते हैं। (यह उसे सुलैमान से जोड़ते हैं) यद्यपि सुलैमान ने कभी कुफ़्र नहीं किया अपितु इसी प्रकार के दुष्टों ने कुफ़्र किया। वे लोगों को जादू सिखाते थे। और उस विद्या के पीछे लग गए जो बाबिल में दो फ़रिश्तों, हारूत और मारुत, पर उतारी गई थी, यद्यपि वे दोनों उस समय तक किसी को कुछ नहीं सिखाते थे, जब तक उसे बता नहीं देते कि हम तो केवल एक परीक्षा हैं, इसलिए तुम इस कुफ़्र में मत पड़ो। फिर भी यह उनसे वह विद्या सीखते थे जिससे पति-पत्नी में फूट डाल दें, और वास्तव में परमेश्वर की अनुमति के बिना यह उससे किसी का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते थे। (यह इस बात से परिचित थे) और फिर भी वह चीजें सीखते थे जो इन्हें कोई लाभ नहीं देती थीं, अपितु हानि पहुंचाती थीं, यद्यपि यह जानते थे कि जो इन चीजों का व्यापारी है, उसके लिए फिर परलोक में कोई हिस्सा नहीं है। कैसी बुरी है वह चीज़ जिसके बदले में इन्होंने अपने प्राण भेच दिए। काश, यह जानते। 101-102

और यदि यह ईमान एवं पुण्यशीलता अपनाते तो परमेश्वर के पास जो बदला इन्हें मिलता, वह (इनके लिए) कहीं अच्छा था। काश, यह समझते। 103

(इनके षड्यंत्रों से बचने के लिए), हे मानने वालो, (तुम परमेश्वर के पैगंबर के चरणों में बैठो) तो ‘राइना’ न कहा करो, ‘उन्ज़ुर्ना’ कहा करो और जो कुछ कहा जाए, उसे ध्यान से सुनो, और इस बात को याद रखो कि इन काफ़िरों के लिए भीषण यातना है। अहल-ए-किताब हों या मुश्रिक, इनमें से जिन लोगों ने कुफ़्र किया है, वे नहीं चाहते कि तुम्हारे प्रभु की ओर से कोई भलाई तुम पर उतारी जाए। (यह मूर्ख नहीं जानते कि) परमेश्वर जिसको चाहता है, अपनी कृपा के लिए चुन लेता है, और (नहीं जानते कि) परमेश्वर बड़ी कृपा करने वाला है। 104-105

(इन्हें आपत्ति है कि तौरात के विधान में हम कोई परिवर्तन क्यों करते हैं? इन्हें बता दो कि) हम (इस ग्रंथ की) जो आयत भी निरस्त करते हैं या उसे भुला देते हैं, (क़ुरआन में) उसकी जगह उससे उत्तम या उस जैसी कोई दूसरी ले आते हैं। क्या तुम नहीं जानते, (लोगो) कि परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है? क्या तुम नहीं जानते कि धरती और समस्त आकाशों का राज्य परमेश्वर ही के लिए है? (वह जिसको चाहेगा, अपना विधान सौंप देगा), और (तुम यदि उसका यह निर्णय स्वीकार नहीं करते तो) परमेश्वर के अतिरिक्त तुम्हारे लिए (इस जीवन में फिर) न कोई मित्र है और न कोई सहायक। 106-107

(हे मानने वालो, इनके अनुसरण में), क्या तुम भी अपने रसूल से उसी प्रकार की बातें पूछना चाहते हो, जिस प्रकार की बातें इससे पहले मूसा से पूछी गई थीं? (तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि यह मानने का ढंग नहीं है) और (ज्ञात होना चाहिए कि) जिसने ईमान के बदले में कुफ़्र को ले लिया, वह फिर सन्मार्ग से भटक गया। 108

बहुत से अहल-ए-किताब केवल अपने मन के द्वेष के कारण यह चाहते हैं कि तुम्हारे मान लेने के बाद वह फिर तुम्हें कुफ़्र की ओर पलटा दें, यद्यपि सत्य उन पर अच्छी तरह स्पष्ट हो चुका है। अतः उन्हें क्षमा करो और अनदेखा करो, यहां तक कि परमेश्वर अपना निर्णय घोषित कर दे। निःसंदेह, परमेश्वर प्रत्येक कार्य का सामर्थ्य रखता है। और (इनके षड्यंत्रों का सामना करने के लिए) नमाज़ को स्थापित रखो और ज़कात देते रहो, और (याद रखो कि) जो भलाई भी तुम अपने लिए आगे भेजोगे, उसे तुम परमेश्वर के पास पा लोगे।  इसमें संदेह नहीं कि जो कुछ तुम कर रहे हो, परमेश्वर उसे देख रहा है। 109-110

यह कहते हैं कि कोई व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकेगा, जब तक वह यहूदी या ईसाई न हो। यह इन्होंने केवल कल्पनाएँ बांध ली हैं। इनसे कहो, तुम सच्चे हो तो (इसके लिए) अपना कोई प्रमाण प्रस्तुत करो। (इनकी इस बात में कोई वास्तविकता नहीं)। हां, यह अवश्य है कि अपना अस्तित्व जिन लोगों ने परमेश्वर को सौंप दिया, और वह अच्छे प्रकार से कर्म करने वाले हैं, उनके लिए उनका फल उनके प्रभु के पास सुरक्षित है, और उनके लिए न वहां कोई आशंका है और न वे कभी दुखी होंगे। (अपने संप्रदाय से बाहर यह किसी सत्य को नहीं मानते, इसलिए) यहूदी कहते हैं कि ईसाई आधारहीन हैं और ईसाई कहते हैं कि यहूदियों का कोई आधार नहीं, यद्यपि दोनों ईश्वरीय ग्रंथ का पाठ करते हैं। इसी प्रकार ठीक इनके जैसी बात उन लोगों ने भी कही जो (ईश्वरीय ग्रंथ का कोई) ज्ञान नहीं रखते। अतः अब परमेश्वर इनके बीच क़यामत के दिन ही इस बात का निर्णय करेगा जिसमें यह झगड़ रहे हैं। 111-113

(अपने इन्हीं मतभेदों के कारण यह एक दूसरे के पूजा स्थलों को वीरान करते रहे हैं)। और उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन है जो परमेश्वर के पूजा स्थलों में इस बात से रोके कि वहां उसका नाम लिया जाए और उन्हें वीरान करने का प्रयत्न करे। इनके लिए इसके अतिरिक्त कुछ उचित न था कि इन (पूजा स्थलों) में जाएं तो परमेश्वर से डरते हुए जाएं। (लेकिन इन्होंने उद्दंडता को अपनाया तो अब) इनके लिए दुनिया में भी रुसवाई है और क़यामत में भी एक भीषण यातना इनकी प्रतीक्षा में है। (यह इस कारण हुआ कि इनमें से किसी ने पूरब को क़िबला बना लिया और किसी ने पश्चिम को), और वास्तव में पूरब और पश्चिम सब परमेश्वर ही के लिए हैं। अतः (परमेश्वर के आदेश अनुसार) तुम जिधर मुंह करोगे, वहीं परमेश्वर का मुख है। निःसंदेह परमेश्वर बड़ा व्यापक है, सर्वज्ञ है। 114-115

(फिर यही नहीं, अपनी मुक्ति के यह दावेदार इतने पतित हो चुके हैं कि) उन्होंने कहा है कि परमेश्वर की संतान है। (निःसंदेह) वह पवित्र है इन बातों से, अपितु धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, उसी का है, सब उसके आज्ञाकारी हैं। धरती और आकाशों को वही अभाव से अस्तित्व में लाने वाला है और जब किसी बात का संकल्प कर लेता है तो उसके लिए इतना ही कहता हे कि हो जा तो वह हो जाती है। 116-117

और इसी तरह उन लोगों ने भी कहा है जो (ईश्वरीय ग्रंथ का) ज्ञान  नहीं रखते कि परमेश्वर हमसे (प्रत्यक्ष रूप से) क्यों बात नहीं करता या हमारे पास कोई स्पष्ट निशानी क्यों नहीं आती? ठीक इसी प्रकार जो लोग इनसे पहले हुए हैं, उन्होंने भी इन्हीं के जैसी बात कही थी। इन सब के मन एक से है। हमने अपनी निशानियाँ उन लोगों के लिए सब प्रकार से स्पष्ट कर दी हैं जो मानना चाहें, (इसलिए तुम्हारा कोई दायित्व नहीं कि इनकी इच्छाओं के अनुसार इन्हें चमत्कार और निशानियाँ दिखाओ)। हमने तुम्हें सत्य के साथ भेजा है, (हे पैगंबर), शुभ सूचना देने वाला और सावधान करने वाला बनाकर, और तुम से इन नर्क-वासियों के बारे में कोई भी पूछताछ नहीं होगी। 118-119

 यह यहूदी तथा ईसाई तुमसे कभी संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक तुम इनका धर्म स्वीकार न कर लो। (इसलिए) कह दो कि परमेश्वर का मार्गदर्शन ही वास्तविक मार्गदर्शन है, और (जान लो कि) यदि तुम उस ज्ञान के पश्चात जो तुम्हारे पास आ चुका है, इनकी इच्छाओं पर चले तो परमेश्वर के सम्मुख तुम्हारा कोई मित्र और कोई सहायक न होगा। 120

(तुम्हें संतुष्ट रहना चाहिए कि) वे लोग जिन्हें हमने धर्मग्रंथ सौंपा और उनका आचरण यह रहा कि वे उसको यथायोग्य पढ़ते रहे, वही इस (मार्गदर्शन) को स्वीकार करेंगे और जो इसको नकारने वाले होंगे तो वही वास्तव में घाटा उठाने वाले हैं। 121

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हे इस्राईल पुत्रो , मेरे उस उपकार को याद करो जो मैंने तुम पर किया था और इस बात को कि मैंने तुम्हें जगत वासियों पर श्रेष्ठता प्रदान की थी और उस दिन से डरो, जब कोई किसी के कुछ भी काम नहीं आएगा और न उससे कोई बदला स्वीकार किया जाएगा, न उसे कोई सिफ़ारिश लाभ देगी और न लोगों को कोई सहायता ही मिलेगी। 122-123

और याद करो, जब इब्राहीम को उसके प्रभु ने कुछ बातों में परखा तो उसने वे पूरी कर दीं, कहा: मैंने निर्णय किया है कि तुम्हें लोगों का अधिनायक बनाऊँगा। उसने निवेदन किया: और मेरी संतान में से? कहा: मेरा यह वचन उनमें से अत्याचारियों के लिए नहीं है। 124

और याद करो, जब हमने (अरब की धरती में) इस पवित्र घर को लोगों का केन्द्रीय-स्थल और उनके लिए आश्रय-स्थान निर्धारित किया और आदेश दिया कि इब्राहीम के इस निवास स्थान में नमाज़ की एक जगह बनाओ और इब्राहीम तथा इस्माईल को इस बात पर बाध्य किया कि मेरे इस घर को उन लोगों के लिए पवित्र रखो जो (इसमें) परिक्रमा करने, एतिकाफ़ करने और रुकू तथा सजदा करने के लिए आएँ। 125

और याद करो, जब इब्राहीम ने प्रार्थना की कि हे प्रभु, इस नगर को शांति का नगर बना दे और इसके लोगों में से जो परमेश्वर तथा क़यामत को मानने वाले हों, उन्हें कृषि-उत्पादन की आजीविका प्रदान कर। (परमेश्वर ने) कहा: और जो अविश्वासी हैं, (इन पदार्थों से) कुछ दिनों के लिए लाभ उठाने की अनुमति तो मैं उन्हें भी दूँ गा, फिर उनको नरक की यातना में पकड़ के लाऊँगा और वह अत्यंत बुरा स्थान है।  126

और याद करो, जब इब्राहीम तथा इस्माईल (मेरे) इस घर की नींव डाल रहे थे। (उस समय उनके होंठों पर प्रार्थना थी कि) प्रभु, तू हमारी ओर से यह प्रार्थना स्वीकार कर। इसमें संदेह नहीं कि तू ही सुनने वाला, जानने वाला है। 127

प्रभु, और हम दोनों को तू अपना आज्ञाकारी बना और हमारी संतान से भी अपना एक आज्ञाकारी  समुदाय उठा और हमें हमारी उपासना की विधि बता और हम पर कृपा दृष्टि कर। इसमें संदेह नहीं कि तू ही बड़ी कृपा करने वाला (और अपने दास जनों पर) दया करने वाला है। प्रभु, और उन्हीं में से तू उनके भीतर एक रसूल उठा जो तेरे वचन उन्हें सुनाए और उन्हें क़ानून तथा हिकमत सिखाए और इस प्रकार उन्हें पावन बनाए। इस में संदेह नहीं कि तू ही बड़ा प्रबल है, बड़ा तत्वदर्शी है। 128-129

और कौन है जो इब्राहीम के धर्म से विमुख हो जाए?  हाँ, वही जो अपने आप को मूर्खता में डाले दे। हमने उसे दुनिया में भी अपने लिए चुन लिया था, और क़यामत में भी वह सदाचारियों में से होगा। (वही इब्राहीम कि) जब उसके प्रभु ने उसे आदेश दिया कि अपने आप को सौंप दो, उसने तुरंत कहा: मैंने अपने आप को जगत-प्रभु को सौंप दिया। 130-131

और इसी धर्म का उपदेश इब्राहीम ने अपने बेटों को किया था और इसी का उपदेश याक़ूब ने किया था। (उसने कहा था कि) मेरे बच्चो, परमेश्वर ने यही धर्म तुम्हारे लिए चुन लिया है, इसलिए अब मृत्यु के समय तक तुम्हें हर हाल में मुसलमान ही रहना है। 132

फिर क्या तुम लोग उस समय उपस्थित थे, जब याक़ूब इस दुनिया से प्रस्थान कर रहा था, उस समय जब उसने अपने बेटों से पूछा: तुम मेरे बाद किसकी उपासना करोगे? उन्होंने उत्तर दिया: हम उसी एक देवता की उपासना करेंगे जो तेरा देवता है और तेरे पूर्वजों- इब्राहीम, इस्माईल और इस्हाक़- का देवता है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं। 133

यह एक समूह था जो चल बसा, उनका है जो उन्होंने किया और तुम्हारा है जो तुमने किया, तुमसे यह नहीं पूछा जाएगा कि वे क्या करते थे। 134

(इन के पूर्वजों की परंपरा तो यह है) और इधर इनकी ज़िद है कि यहूदी या ईसाई बनो तो सन्मार्ग पाओगे। इनसे कह दो, अच्छा है कि इब्राहीम का धर्म स्वीकार करो जो (अपने प्रभु के लिए) पूर्णतः एकाग्र था और अनेक देवताओं की उपासना करने वालों में से नहीं था। (आस्तिक जानो), इनसे कह दो कि हमने परमेश्वर को माना है और उस चीज़ को माना है जो हमारी ओर उतारी गई है और जो इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़ और याक़ूब और उनके वंश की ओर उतारी गई और जो मूसा तथा ईसा और अन्य सब नबियों को उनके प्रभु की ओर से दी गई। हम इनमें से किसी के बीच कोई भेद नहीं करते। (यह सब परमेश्वर के पैगंबर हैं) और हम उसी के आज्ञाकारी हैं। 135-136

फिर यदि वे इस प्रकार मान लें, जिस प्रकार तुमने माना है तो उचित मार्ग पा गए और यदि विमुख हो जाएँ तो वही ज़िद पर हैं। अतः इनके विरोध में, (हे पैगंबर), परमेश्वर तुम्हारे लिए पर्याप्त है, और वह सुनने वाला है, हर बात से अवगत है। 137

(इनसे कह दो, तुम) परमेश्वर का यह रंग ग्रहण कर लो और परमेश्वर के रंग से किसका रंग उत्तम है और (कह दो कि) हम तो (हर हाल में) उसी की भक्ति करते हैं। कह दो, क्या तुम परमेश्वर के बारे में हमसे झगड़ा करते हो, यद्यपि वही हमारा प्रभु है और तुम्हारा भी? और (यदि ऐसा नहीं, तो फिर) हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म और हम तो केवल उसी के हैं। 138-139

क्या तुम कहते हो कि इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़, याक़ूब और उनके वंश के लोग यहूदी या ईसाई थे? इनसे पूछो, तुम अधिक जानते हो या परमेश्वर? (हाय), उन लोगों से अधिक अत्याचारी कौन हो सकता है जिनके पास परमेश्वर की ओर से कोई गवाही हो और वे उसे छिपा लें। और वस्तुतः परमेश्वर उन चीजों से अंजान नहीं है जो तुम कर रहे हो। 140

यह एक समूह था जो चल बसा, उनका है जो उन्होंने किया और तुम्हारा है जो तुमने किया, तुमसे यह नहीं पूछा जाएगा कि वे क्या करते थे। 141

(इब्राहीम की बनाई हुई मस्जिद को, हे पैगंबर, हमने तुम्हारे लिए क़िब्ला बनाने का निर्णय किया है तो) अब इन लोगों में से जो मूर्ख हैं, वे कहेंगे: इन्हें किस बात ने इनके उस क़िब्ले से फेर दिया जिस पर यह पहले थे? इनसे कह दो, पूर्व और पश्चिम, सब परमेश्वर ही के हैं, वह जिसे चाहता है, (इस पक्षपात से निकाल कर) सीधा मार्ग दिखा देता है। (हमने यही किया है) और (जिस प्रकार मस्जिद-ए-हराम को तुम्हारा क़िब्ला बनाया है), उसी प्रकार हमने तुम्हें भी एक मध्यवर्ती समुदाय बना दिया है ताकि तुम दुनिया के सब लोगों पर (सत्य के) साक्षी बनो और परमेश्वर का दूत तुम पर यह गवाही दे। और इससे पहले, (हे पैगंबर), जिस क़िब्ले पर तुम थे, उसे तो हमने केवल यह देखने के लिए निर्धारित किया था कि कौन रसूल का आज्ञा-पालन करता है और कौन उलटे पांव फिर जाता है। इसमें संदेह नहीं कि यह एक भारी बात थी, किन्तु उनके लिए नहीं, जिनका मार्गदर्शन परमेश्वर करे। और परमेश्वर ऐसा नहीं है कि (इस प्रकार की परीक्षा से वह) तुम लोगों के विश्वास को निरर्थक करना चाहे। परमेश्वर तो लोगों के लिए अत्यंत करुणामय है, सर्वथा दया है। 142-143

तुम्हारे चेहरे का बार-बार आकाश की ओर उठना हम देखते रहे हैं, (हे पैगंबर), सो हमने निर्णय कर लिया है कि तुम्हें उस क़िब्ले के ओर फेर दें जो तुमको पसंद है। अतः अब अपना मुख मस्जिद-ए-हराम की ओर फेर दो और तुम लोग जहां कहीं भी हो, (नमाज़ में) अपना मुख उसी ओर करो। यह लोग जिन्हें धर्माग्रंथ दिया गया था, जानते हैं कि उनके प्रभु की ओर से यही सत्य है, (लेकिन तब भी नकार रहे हैं), और जो कुछ यह कर रहे हैं, परमेश्वर उससे अंजान नहीं है। और इन अहल-ए-किताब के सामने, (हे पैगंबर), तुम यदि सब प्रकार की निशानियाँ भी प्रस्तुत कर दो तो यह तुम्हारे क़िब्ले का अनुपालन नहीं करेंगे। और (इसके साथ यह भी सच है कि जो ज्ञान तुम्हारे पास आ चुका है, इसके आधार पर) तुम भी इनका क़िब्ला नहीं मान सकते और (इनकी यह हठ केवल तुम्हारे साथ नहीं है, सत्य यह है कि) इनमें से कोई समुदाय भी दूसरे का क़िब्ला मानने के लिए तैयार नहीं है। (इसलिए इनको कोई बात यदि संतुष्ट कर सकती है तो यही कि तुम इनका क़िब्ला मान लो), लेकिन उस ज्ञान के बाद जो तुम्हारे पास आ चुका है, तुम यदि इनकी इच्छाओं के पीछे चलते हो तो तुम भी अवश्य इन्हीं अत्याचारियों में से हो जाओगे। (यह सच है कि) जिनको हमने धर्मग्रंथ दिया है, वे इस चीज़ को ऐसा पहचानते हैं, जैसा अपने बेटों को पहचानते हैं। और इनमें यह एक समूह है जो जानते बूझते सत्य को छिपाता है। (तुम पर स्पष्ट हो कि) तुम्हारे प्रभु की ओर से यही सत्य है, इसलिए (इसके विषय में) तुम को कदापि संदेह में नहीं पड़ना चाहिए। 144-147

और इनमें से हर एक ने (अपने लिए क़िब्ले की) एक दिशा निर्धारित कर रखी है, वह उसी ओर अपना मुख करता है। इसलिए (तुम लोग इन्हें छोड़ो और) पुण्य के रास्ते में आगे बढ़ने का प्रयत्न करो। तुम जहां भी होगे, परमेश्वर तुम सब को (निर्णय के लिए) इकट्ठा करेगा। परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है। 148

(इन्हें छोड़ो, हे पैगंबर) और (यात्रा में भी प्रायः) जहां से निकलो, (नमाज़ के लिए) अपना मुख मस्जिद-ए-हराम ही की ओर करो। इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारे प्रभु की ओर से यही सत्य है, और (याद रखो कि) जो कुछ तुम लोग करते हो, परमेश्वर उस से अंजान नहीं है। 149

और (एक बार फिर सुनो कि यात्रा में भी प्रायः) जहां से निकलो, (नमाज़ के लिए) अपना मुख मस्जिद-ए-हराम ही की ओर करो, और (सामान्य परिस्थितियों में भी) तुम लोग जहां कहीं हो, अपने मुख इसी (मस्जिद) की ओर करो, ताकि इन लोगों को तुम्हारे विरुद्ध कोई मुद्दा न मिले – हाँ इनमें से जो अत्याचारी हैं, उनका मुंह तो कोई चीज़ भी बंद नहीं कर सकती, अतः तुम उनसे न डरो, अपितु मुझसे डरो —- और इसलिए कि मैं तुम पर अपना वरदान पूरा करूँ, और इसलिए कि तुम उचित मार्ग पा लो। इसलिए (यही उद्देश्य हैं जिनके लिए) हमने एक रसूल तुममें से तुम्हारे अंदर भेजा है जो हमारी आयतें तुम्हें सुनाता है और तुम्हारा शुद्धिकरण करता है और इसके लिए तुम्हें क़ानून और हिकमत की शिक्षा देता है और इस प्रकार वह चीज़ें तुम्हें सिखाता है जो तुम नहीं जानते थे। इसलिए तुम मेरा स्मरण करो, मैं तुम्हें याद रखूँगा और मेरे आभारी बनकर रहो, मेरी अकृतज्ञता न करो। 150-152

हे मानने वालो, (यह वरदान तुम्हें प्राप्त हुआ है तो अब तुम्हारे विरोधियों की ओर से जो कठिनाइयाँ भी सामने आएँ, उनमें) धैर्य और नमाज़ से सहायता चाहो। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर उनके साथ है जो (कठिनाइयों के विरुद्ध) दृढ़ रहने वाले हों। और जो लोग परमेश्वर के (इस) मार्ग में मारे जाएँ, उन्हें यह न कहो कि मुर्दा हैं। वे मुर्दा नहीं, अपितु जीवित हैं, लेकिन तुम (उस जीवन की वास्तविक स्थिति) नहीं समझते। हम (इस मार्ग में) अवश्य तुम्हें कुछ भय, कुछ भूख और कुछ प्राणों तथा संपत्ति और कुछ फलों की क्षति से जाँचेंगे। और (इसमें) जो लोग दृढ़ निश्चय वाले होंगे, (हे पैगंबर), उन्हें (इस लोक और परलोक, दोनों में सफलता की) शुभ सूचना दो। (वही) जिन पर कोई विपत्ति आए तो कहें कि निःसंदेह, हम परमेश्वर ही के हैं और हमें (एक दिन) उसी की ओर पलटकर जाना है। यही वे लोग हैं जिनपर उनके प्रभु की कृपायें और उसकी दया होगी और यही हैं जो उसके मार्गदर्शन के भागी होने वाले हैं। 153-157

(बैत-उल्-हराम ही की तरह सफ़ा और मर्वा की सच्चाई को भी इन यहूदियों ने सदा से छिपाने का प्रयास किया है। इसलिए क़िब्ला परिवर्तन के इस अवसर पर यह बात भी स्पष्ट होनी चाहिए कि) सफ़ा और मर्वा निःसंदेह परमेश्वर की प्रतीक-मंडली में से हैं। इसलिए वह लोग जो इस भवन का हज अथवा उम्रह करने के लिए आएँ, उनपर कोई दोष नहीं है यदि वे इन दोनों की परिक्रमा भी कर लें, (बल्कि यह एक पुण्य का काम है) और जिसने स्वेच्छा से पुण्य का कोई काम किया तो परमेश्वर उसे स्वीकार करने वाला है, उससे पूरी तरह अवगत है। (इस विषय में) जो तथ्य हमने उतारे और जो मार्गदर्शन भेजा था, उसे जो लोग छिपाते हैं, भले ही हमने इन लोगों के लिए अपने ग्रंथ में उसका स्पष्टता पूर्वक वर्णन कर दिया था, निःसंदेह वही हैं जिन्हें परमेश्वर अभिशाप देता है और अभिशाप देने वाले भी जिन्हें अभिशापित करेंगे। किन्तु, इनमें से जो पश्चाताप करें और (अपने इस आचरण को) सुधारें और (जो कुछ छिपाते थे, उसे) खुलकर बता दें तो मैं अपनी दया से उनका पश्चाताप स्वीकार करूंगा और सत्य यह है कि मैं पश्चाताप को अत्यंत स्वीकार करने वाला हूँ, मेरी कृपा शाश्वत है। 158-160

इसके विपरीत, जो नकारने पर जमे रहे, और उनकी मृत्यु भी इसी नकारने की अवस्था में हुई, निःसंदेह वही हैं जिनपर परमेश्वर और उसके फ़रिश्तों और सब लोगों का अभिशाप है। वे उसमें सदा रहेंगे, न तो उनका दंड ही हल्का किया जाएगा और न उन्हें कोई छूट दी जाएगी। 161-162

__________

(हे मानने वालो, इन्हें निर्णय करने दो) और (इस बात की परवाह किए बिना तुम अब यह तथ्य समझ लो कि) तुम्हारा पूज्य-प्रभु एक ही पूज्य-प्रभु है, उसके अतिरिक्त कोई उपासना योग्य नहीं है, वह सर्वथा दया है, उसकी कृपा शाश्वत है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आकाशों और पृथ्वी के निर्माण में, और रात और दिन के बदल कर आने में, और नदी में लोगों के लिए लाभदायक सामग्री ले कर चलती हुई नौकाओं में,  और उस पानी में जो परमेश्वर ने आकाश से उतारा है, फिर उससे धरती को उसकी मृत्यु के बाद पुनर्जीवित किया है और उसमें सभी प्रकार के प्राणी फैलाये हैं —- और हवाओं के संचलन में, और आकाश और पृथ्वी के मध्य आज्ञा के अधीन बादलों में, (इस तथ्य को समझने के लिए) कई निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं। 163-164

और (आकाशों और धरती की इन निशानियों के होते हुए) कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दूसरों को परमेश्वर के बराबर बनाते हैं। वे उनसे वैसे ही प्रेम करते हैं, जैसे वे परमेश्वर से करते हैं, जबकि मानने वालों को तो सर्वाधिक प्रेम (अपने) परमेश्वर से होता है। और यदि यह अन्यायी लोग उस क्षण को देखें, जब यह यातना को देखेंगे (तो इनपर यह सत्य खुल जाएगा) कि शक्ति तथा अधिकार, सब परमेश्वर ही का है और यह कि (इस प्रकार के लोगों को) परमेश्वर अत्यंत कठोर यातना देने वाला है। 165

उस समय जब वे लोग जिनका अनुसरण किया गया, अपने अनुयायियों से विरक्ति प्रकट करेंगे और दंड भोगेंगे और उनके संबंध अचानक टूट जाएंगे और उनके अनुयायी कहेंगे कि काश, हमें एक बार फिर दुनिया में जाने का अवसर मिले तो हम भी इनसे विरक्ति प्रकट करें, जिस प्रकार उन्होंने हमसे विरक्ति प्रकट की है। इस प्रकार परमेश्वर उनके कर्मों को उनके लिए सर्वथा निराशा बनाकर उन्हें दिखाएगा और नरक से निकलने के लिए वे कोई मार्ग नहीं पा सकेंगे। 166-167

लोगो, (अपने इन प्रधानों के बनाए हुए अंधविश्वासों के अंतर्गत तुमने जो वैध और अवैध की धारणाएँ बनाई हैं, वे सब मिथ्या हैं, इसलिए) धरती की वस्तुओं में से जो वैध तथा पवित्र हैं, उन्हें खाओ और शैतान के साथ-साथ न चलो। वह तुम्हारा खुला शत्रु है। वह तो यही करेगा कि तुम्हें पाप और निर्लज्जता की प्रेरणा दे और इसकी प्रेरणा दे कि तुम वह बातें परमेश्वर के नाम लगाओ जो तुम नहीं जानते। 168-169

और जब इन्हें निमंत्रण दिया जाता है कि (अपनी इन बातों को छोड़कर) उस बात का अनुसरण करो जो परमेश्वर ने उतारी है तो कहते हैं कि नहीं, अपितु हम तो उसी मार्ग पर चलेंगे जिस पर हमने अपने पूर्वजों को चलते पाया। क्या उस स्थिति में भी कि यदि इनके पूर्वजों ने अपनी बुद्धि से कुछ भी काम न लिया हो और न सन्मार्ग पाया हो? 170

और सत्य यह है कि यह लोग जिन्होंने (परमेश्वर के बताए हुए मार्ग पर चलने को इस प्रकार) नकार दिया है, उनकी दशा ऐसी है, जैसे कोई व्यक्ति उन चीजों को पुकारे जो पुकारने और चिल्लाने के अतिरिक्त कुछ नहीं सुनते हों। यह बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं, इसलिए यह कुछ नहीं समझते। 171

हे मानने वालो, (यदि यह अपनी धर्म विरुद्ध नव प्रथाओं को नहीं छोड़ते तो इन्हें इनकी दशा में रहने दो, और) जो स्वच्छ पदार्थ हमने हम ने तुम्हें प्रदान किए हैं, उन्हें (बिना किसी संकोच के) खाओ और परमेश्वर ही के आभारी बनो, यदि तुम केवल उसी की उपासना करने वाले हो। उसने तो तुम्हारे लिए केवल मृत पशु और खून और सूअर का मांस और परमेश्वर को छोड़ अन्य किसी के नाम का ज़बीहा अवैध बनाया है। फिर भी जो विवश हो जाए, इस प्रकार कि न चाहने वाला हो, न सीमा तोड़ने वाला तो उस पर कोई पाप नहीं। परमेश्वर अवश्य क्षमा करने वाला है, वह सर्वथा दया है। 172-173

 (यह अहल-ए-किताब तो जानते थे कि यही सत्य है, परंतु इन्होंने इसे छिपाया)। सत्य यह है कि जो लोग उस विधान को छिपाते हैं जो परमेश्वर ने उतारा है और उसके बदले में (दुनिया के) बहुत थोड़े दाम स्वीकार कर लेते हैं, वे अपने पेट में केवल नरक की आग भरते हैं। क़यामत के दिन परमेश्वर न उनसे बात करेगा, न उनका शुद्धिकरण करेगा और उनके लिए वहाँ एक भीषण यातना निश्चित है। यही लोग हैं जिन्होंने मार्गदर्शन के बदले पथभ्रष्टता और क्षमा के बदले यातना का सौदा किया है। सो यह कितने दुस्साहसी हैं नरक को सहने के विषय में! 174-175

यह इस कारण होगा कि परमेश्वर ने अपना यह ग्रंथ निर्णायक सत्य के साथ उतारा है, परंतु यह लोग जिन्होंने इस ग्रंथ के विषय में मतभेद किया है, यह अपनी हठधर्मी में बहुत दूर निकल गए हैं। 176

(यह समझते हैं कि परमेश्वर के प्रति यथायोग्य निष्ठा धर्म की कुछ प्रथाएँ पूरी करने से पूरी हो जाएगी। इन्हें जानना चाहिए कि) परमेश्वर के प्रति निष्ठा केवल यह नहीं कि तुम ने (नमाज़ में) अपना मुख पूर्व या पश्चिम की ओर कर लिया, अपितु निष्ठा तो उनकी निष्ठा है जो पूरे मन से परमेश्वर को मानें और क़यामत के दिन को मानें और परमेश्वर के फ़रिश्तों को मानें और उसके ग्रन्थों को मानें और उसके नबियों को मानें और धन से प्रेम होते हुए उसे सगे-संबंधियों, अनाथों, निर्धन व्यक्तियों, यात्रियों तथा मांगने वालों पर और गुलामों की मुक्ति के लिए ख़र्च करें, और नमाज़ की स्थापना करें और ज़कात दिया करें। और निष्ठा तो उनकी निष्ठा है कि जब प्रतिज्ञा करें तो अपनी इस प्रतिज्ञा को पूरा करने वाले हों और विशेषतः उनकी जो निर्धनता तथा बीमारी में और युद्ध के अवसर पर दृढ़ रहने वाले हों। यही हैं जो (परमेश्वर के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा में) सच्चे हैं और यही हैं जो वास्तव में आत्मसंयम रखने वाले हैं। 177

हे मानने वालो, (तुममें से) जिन लोगों की हत्या कर दी जाए, उनके मुक़द्दमों में क़िसास तुमपर अनिवार्य किया गया है। इस प्रकार कि हत्यारा आज़ाद हो तो उसके बदले में वही आज़ाद, ग़ुलाम हो तो उसके बदले में वही ग़ुलाम, स्त्री हो तो उसके बदले में वही स्त्री। फिर जिसके लिए उसके भाई की ओर से कुछ छूट दी जाए (तो उसको तुम स्वीकार कर सकते हो, लेकिन यह स्वीकार कर ली जाए) तो सामान्य नियम अनुसार उसका पालन किया जाएगा और जो कुछ भी अर्थदण्ड हो, वह भले तरीके से उसे दे दिया जाएगा। यह तुम्हारे प्रभु की ओर से एक प्रकार की छूट और तुम पर उसकी कृपा है। फिर इसके पश्चात जो अत्याचार करे तो उसके लिए (क़यामत में) कष्टदायक यातना है — और तुम्हारे लिए क़िसास में जीवन है, बुद्धिजीवियो, ताकि तुम परमेश्वर की मर्यादा का पालन करते रहो। 178-179

(इसी प्रकार धन के विवादों से बचने के लिए) तुम पर अनिवार्य किया गया है कि तुममें से जब किसी की मृत्यु का समय आ जाए और वह कुछ संपत्ति छोड़ रहा हो तो माता-पिता और रिश्तेदारों के लिए विधि अनुसार वसीयत करे। परमेश्वर से डरने वाले इसके बाध्य हैं। फिर जो इस वसीयत को इसके सुनने के बाद बदल डाले तो उसका पाप उन बदलने वालों ही पर होगा। (उन्हें याद रखना चाहिए कि) परमेश्वर अवश्य सब कुछ सुनता और जानता है। अपितु, जिसको किसी वसीयत करने वाले की ओर से पक्षपात या अधिकार हनन का डर हो और वह उनके बीच समझौता करा दे तो उसपर कोई पाप नहीं है। निःसंदेह, परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। 180-182

(यह परमेश्वर की मर्यादाएँ हैं और इनका पालन वही कर सकते हैं जो परमेश्वर से डरने वाले हों, इसलिए) हे मानने वालो, उपवास तुम्हारे लिए अनिवार्य किया गया है, जिस प्रकार तुमसे पूर्व के लोगों के लिए अनिवार्य किया गया था ताकि तुम परमेश्वर से डरने वाले बन जाओ। यह गिनती के कुछ दिन हैं। इसपर भी जो तुममें से अस्वस्थ हो या यात्रा में हो तो वह अन्य दिनों में यह गिनती पूरी कर ले। और जो इसका सामर्थ्य रखते हों कि एक निर्धन को भोजन करा दें तो उनपर हर उपवास का बदला एक निर्धन का भोजन है। फिर जो स्वेच्छा से कोई पुण्य करे तो उसके लिए अच्छा है, और उपवास रख लो तो यह तुम्हारे लिए और भी अच्छा है, यदि तुम समझ रखते हो। 183-184

रमज़ान का महीना है जिसमें क़ुरआन उतारा गया, लोगों के लिए सर्वथा मार्गदर्शन बनाकर और अत्यंत स्पष्ट प्रमाणों के रूप में जो (अपने स्वरूप अनुसार) मार्गदर्शन भी हैं और सत्य-असत्य का निर्णय भी। अतः तुममें से जो व्यक्ति इस महीने में उपस्थित हो, उसे चाहिए कि इसका उपवास रखे। और जो अस्वस्थ हो या यात्रा में हो तो वह अन्य दिनों में यह गिनती पूरी कर ले। (यह छूट इसलिए दी गई है कि) परमेश्वर तुम्हारे लिए सुविधा चाहता है और नहीं चाहता कि तुम्हारे साथ कठोरता करे। और (फ़िद्ये[1] की अनुमति) इसलिए (समाप्त कर दी गई है) कि तुम उपवास की संख्या पूरी करो, (और जो शुभ आशीष इसमें छिपा हुआ है, उससे वंचित न रहो)। और (इस उद्देश्य के लिए रमज़ान का महीना) इसलिए (अलग किया गया है) कि (क़ुरआन के रूप में) परमेश्वर ने जो मार्गदर्शन तुम्हें प्रदान किया है, उसपर उसका गुणगान करो और इसलिए कि तुम उसके आभारी बनो। 185

और मेरे (किसी निर्देश के) बारे में, (हे पैगंबर), जब मेरे दास जन तुमसे कोई प्रश्न करें तो (उनसे कह दो कि इस समय) मैं उनके निकट ही हूँ। पुकारने वाला जब मुझे पुकारता है तो मैं उसकी पुकार का उत्तर देता हूँ। इसलिए उन्हें चाहिए कि वे मेरा आदेश मानें और मुझपर विश्वास रखें ताकि वे उचित मार्ग पर रहें। 186

(तुम पूछना चाहते हो तो लो हम बताए देते हैं कि) उपवास की रात में अपनी पत्नियों के पास जाना तुम्हारे लिए वैध किया गया है। वे तुम्हारे लिए वस्त्र समान हैं और तुम उनके लिए वस्त्र समान हो। परमेश्वर ने देखा कि तुम अपने आप से विश्वासघात कर रहे थे तो उसने तुम पर कृपा की और तुम्हें क्षमा किया। अतः अब (निःसंकोच) अपनी पत्नियों के पास जाओ और (इसका) जो (परिणाम) परमेश्वर ने तुम्हारे लिए लिख रखा है, उसकी कामना करो, और खाओ पियो, यहाँ तक कि रात की अश्वेत धारी से फ़ज्र [उषाकाल] की श्वेत धारी तुम्हारे लिए पूर्णतः अलग हो जाए। फिर रात तक अपना उपवास पूरा करो। और हाँ, तुम मस्जिदों में ‘एतिकाफ़’[2] में बैठे हो तो रात को भी पत्नियों के पास न जाना। यह परमेश्वर की निर्धारित सीमाएं हैं, तो इनके पास न जाओ। परमेश्वर इसी प्रकार अपनी आयतें लोगों के लिए स्पष्ट करता है ताकि वे पुण्यशीलता अपनाएँ। 187

और (इसी पुण्यशीलता का परिणाम है कि) तुम अन्यायपूर्ण ढंग से आपस में एक दूसरे का धन न खाओ और उसे अधिकारियों तक पहुँचने का माध्यम न बनाओ, ताकि इस प्रकार लोगों के धन का कोई भाग तुम्हें उनका अधिकार हनन करके खाने का अवसर मिल जाए, यद्यपि तुम (अधिकार के इस हनन को) जानते हो। 188

वे तुमसे हराम [अर्थात प्रतिष्ठित] महीनों के बारे में पूछते हैं। कह दो, यह लोगों की भलाई और हज के अवसर हैं, (इसलिए इनका यह सम्मान इसी प्रकार बनाए रखा जाएगा)। और (तुमने यह प्रश्न किया है तो अब यह भी जान लो कि) यह कदापि कोई पुण्य नहीं है कि (एहराम की अवस्था में और हज से वापसी पर) तुम घरों के पीछे से प्रवेश करते हो, अपितु पुण्य तो वास्तव में उसका है जो पुण्यशीलता अपनाए। इसलिए अब घरों में उनके द्वारों ही से प्रवेश करो, और परमेश्वर से डरते रहो ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो जाए। 189

और परमेश्वर के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो (हज का मार्ग रोकने के लिए) तुमसे लड़ें और (इसमें) कोई अत्याचार न करो। निःसंदेह, परमेश्वर अत्याचार करने वालों से प्रेम नहीं करता। और इन लड़ने वालों को जहां पाओ, उनकी हत्या करो और उन्हें वहाँ से निकालो, जहां से उन्होंने तुम्हें निकाला है और (याद रखो कि) उत्पीड़न हत्या से भी अधिक बुरा कार्य है। और तुम मस्जिद-ए-हराम[3] के पास इनसे युद्ध (प्रारम्भ)) न करो, जब तक यह तुमसे उसमें युद्ध न करें। फिर यदि यह युद्ध छेड़ दें तो (निःसंकोच) इनकी हत्या करो। इस प्रकार के काफिरों का यही दंड है। परंतु यदि वे सुधर जाएँ तो परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। और तुम यह युद्ध उनसे बराबर किए जाओ, जब तक कि उत्पीड़न शेष न रहे और धर्म इस भूभाग में परमेश्वर ही का हो जाए। फिर भी यदि वे सुधर जाएँ तो (जान लो कि) सैन्य कार्यवाही केवल अत्याचारियों के विरुद्ध ही वैध है। 190-193

प्रतिष्ठित महीने का बदला प्रतिष्ठित महीना है और इसी प्रकार अन्य प्रतिष्ठाओं में भी बदले हैं। इसलिए जो तुम पर अत्याचार करें, उनको अपने ऊपर इस अत्याचार के समान ही उत्तर दो,  और परमेश्वर से डरते रहो, और जान लो कि परमेश्वर उनके साथ है जो उसकी मर्यादाओं का पालन करते हैं। 194

और (इस जिहाद के लिए) परमेश्वर के मार्ग में दान करो, और (इससे बच के)  अपने ही हाथों से अपने आप को बरबादी में न डालो, और तुम (यह दान) अच्छे ढंग से करो, इसलिए कि परमेश्वर अच्छे ढंग से काम करने वालों से प्रेम करता है। 195

और हज तथा उमरह (का मार्ग यदि तुम्हारे लिए खोल दिया जाए तो उनके सभी संस्कारों के साथ उन) को परमेश्वर के लिए ही पूरा करो। फिर यदि रास्ते में घिर जाओ तो जो पशु भी बलि के लिए उपलब्ध हो, उसे भेंट कर दो, और अपने सर का मुंडन उस समय तक न करो, जब तक भेंट का जानवर अपने स्थान पर न पहुँच जाए। फिर जो तुममें से अस्वस्थ हो या उसके सर में कोई समस्या हो (और उसे बलिदान से पहले ही सर का मुंडन करवाना पड़ जाए) तो उसे चाहिए कि उपवास या दान या बलिदान के रूप में उसका फ़िद्या दे। फिर जब तुम्हारे लिए शांति की परिस्थिति पैदा हो जाए तो जो कोई इस यात्रा से लाभ उठाकर हज का समय आने तक उमरह भी कर ले तो उसे पशु का बलिदान करना होगा, जैसे भी उपलब्ध हो जाए। और यदि बलिदान उपलब्ध न हो तो उपवास रखना होगा: तीन दिन हज के अंतराल में और सात, जब (हज से) वापस आओ। यह पूरे दस दिन हुए। (इस प्रकार एक ही यात्रा में हज के साथ उम्रे की) यह (छूट) केवल उन लोगों के लिए है जिनके घर बार मस्जिद-ए-हराम के पास न हों। (इसका पालन करो) और परमेश्वर से डरते रहो, और अच्छे से जान लो कि परमेश्वर कठोर दंड देने वाला है। 196

हज के महीने निर्धारित हैं। अतः जो व्यक्ति भी इनमें (एहराम बांध कर) हज का संकल्प कर ले , उसे फिर हज के इस समय में न कोई काम-वासना की बात करनी है, न ईश्वर की अवज्ञा की और न लड़ाई झगड़े की कोई बात उससे निकलनी चाहिए। और (याद रहे कि) जो पुण्य भी तुम करोगे, परमेश्वर उसे जानता है। और (हज की इस यात्रा में पुण्यशीलता का) पाथेय ले कर निकलो, इसलिए कि सर्वोत्तम पाथेय यही पुण्यशीलता का पाथेय है। और (इसके लिए), बुद्धिजीवियो, मुझसे डरते रहो। 197

(इसके साथ, अपितु) तुम पर कोई दोष नहीं कि अपने प्रभु की कृपा की खोज करो, परंतु (ध्यान रहे कि मुज़्दलिफ़ा कोई खेल तमाशे और व्यापार का स्थान नहीं है, इसलिए) जब अरफ़ात से प्रस्थान करो तो मश्आर-ए-हराम[4] के पास परमेश्वर को याद करो और उसको उसी प्रकार याद करो, जिस प्रकार उसने तुम्हारा मार्गदर्शन किया है। और इससे पहले तो, निःसंदेह तुम लोग भटकने वालों में थे। 198

फिर (यह भी आवश्यक है कि) जहां से अन्य सब लोग पलटते हैं, तुम भी, (कुरैश के लोगो), वहीं से पलटो और परमेश्वर की क्षमा चाहो। परमेश्वर अवश्य शमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। 199

(और यह भी कि) इसके बाद जब अपने हज के सब कार्य संपन्न कर लो तो जिस प्रकार पहले अपने पूर्वजों को याद करते रहे हो, उसी प्रकार अब परमेश्वर को याद करो, बल्कि उससे भी अधिक। (यह परमेश्वर से मांगने का अवसर है), परंतु लोगों में ऐसे भी हैं कि वे (इस अवसर पर भी यही कहते हैं कि प्रभु, हमें (जो कुछ देना है, इसी) जीवन में दे दे, और (इसका परिणाम यह निकलता है कि फिर) परलोक में उनका कोई भाग नहीं रहता। और उनमें ऐसे भी हैं कि जिनकी प्रार्थना यह होती है कि प्रभु, हमें दुनिया में भी भलाई प्रदान कर और परलोक में भी, और हमें आग के दंड से बचा ले। यही हैं जो अपनी कमाई का भाग पा लेंगे, और परमेश्वर को हिसाब चुकाते कभी देर नहीं लगती। 200-202

और (मिना के) कुछ निर्धारित दिनों में परमेश्वर का स्मरण करो। फिर जिसने जल्दी की और दो ही दिनों में चल खड़ा हुआ, उस पर भी कोई पाप नहीं और जो देर से चला उस पर भी कोई पाप नहीं। (हां, परंतु) उनके लिए जो परमेश्वर से डरें और तुम भी परमेश्वर से डरते रहो, और अच्छे से जान लो कि (एक दिन) तुम उसी के सामने इकट्ठे किए जाओगे। 203

(यह हज का पूजा कार्य है जिसका मार्ग रोकने वालों से तुमको लड़ना है) और इधर परिस्थिति यह है कि तुम्हारे लोगों में से कुछ ऐसे हैं कि जिनकी बातें तो इस दुनिया के जीवन में तुम्हें भली लगती हैं, और वे अपने मन के विचारों पर परमेश्वर को साक्षी भी बनाते हैं, परंतु वे सबसे बुरे शत्रु हैं। (तुम्हारे सामने वे यही करते हैं) और जब वहां से हट जाते हैं तो उनकी सारी भागदौड़ इसलिए होती है कि धरती में उत्पात फैलाएं और खेतों को बर्बाद करें और पीढ़ियों का विनाश करें, और (तुम जानते हो कि) परमेश्वर उत्पात को प्रिय नहीं रखता। और जब उनसे कहा जाता है कि परमेश्वर से डरो तो पाप पर उद्यत रहने के साथ उनका अभिमान उन्हें जकड़ लेता है। अतः उनके लिए नरक पर्याप्त है और वह अत्यंत बुरा ठिकाना है। 204-206

और इन्हीं लोगों में कुछ ऐसे भी हैं कि परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए अपने प्राण देने के लिए तत्पर हैं। (यही हैं कि जिनसे कोई भूल हो जाए तो परमेश्वर उसे क्षमा कर देता है), और इस प्रकार के भक्तों पर परमेश्वर अत्यंत कृपा करने वाला है। 207

हे मानने वालो, (मानने के साथ यह दो व्यवहार नहीं हो सकते, इसलिए) तुम सब (एक ही ढंग से) परमेश्वर के आज्ञा-पालन में प्रविष्ट हो जाओ और शैतान के पद चिन्हों का अनुसरण न करो। वह तुम्हारा स्पष्ट शत्रु है। इन स्पष्ट चेतावनियों के बाद भी, जो तुम्हारे पास आई हैं, यदि तुम लड़खड़ाते हो तो जान लो कि परमेश्वर प्र्भुत्वशाली है, बड़ा तत्वदर्शी है। 208-209

(इस इत्माम-ए-हुज्जत के होते हुए) क्या यह इसी की प्रतीक्षा में हैं कि परमेश्वर और उसके फ़रिश्ते बादलों के साये में इनके सामने प्रकट हो जाएं और मामले का निपटारा कर दिया जाए? (परंतु यह परमेश्वर की कार्यप्रणाली नहीं है) और इस प्रकार के मामले तो परमेश्वर ही के हाथ में हैं। इस्राईलियों से पूछो, हमने उनको कितनी स्पष्ट निशानियां दी, (परंतु इसका क्या लाभ हुआ)? और वास्तव में जो लोग परमेश्वर के (मार्गदर्शन जैसे) वरदान को पा लेने के बाद उसको (पथभ्रष्टता से) बदलते हैं, वे परमेश्वर की पकड़ से नहीं बच सकते, इसलिए कि परमेश्वर कड़ा प्रतिकार करने वाला है। इन नकारने वालों के लिए दुनिया का जीवन बड़ा लुभावना बना दिया गया है। (इसके परिणाम से इन्हें सचेत किया जाए तो नहीं सुनते) और मानने वालों का मज़ाक उड़ाते हैं, यद्यपि परमेश्वर से डरने वाले कयामत के दिन इनकी तुलना में श्रेष्ठ होंगे। (यह उनके लिए परमेश्वर की कृपा है) और परमेश्वर जिसको चाहेगा, अपनी असीम कृपा प्रदान करेगा। 210-212

(अपने ढोंगी आचरण के लिए यह मतभेदों को बहाना बनाते हैं। इन्हें जानना चाहिए कि) मनुष्य एक ही समूह थे। फिर (उनमें मतभेद पैदा हुआ तो) परमेश्वर ने नबी भेजे, शुभ सूचना देते और सचेत करते हुए और उनके साथ निर्णायक बात के रूप में अपना ग्रंथ उतारा ताकि लोगों के बीच वह उनके मतभेदों का निपटारा कर दे। यह जिन को दिया गया, इसमें मतभेद भी उन्हीं लोगों ने किया, अत्यंत स्पष्ट प्रमाण उनके सामने आ जाने के बाद, केवल आपस के बैर के कारण। फिर यह जो (क़ुरआन के) मानने वाले हैं, परमेश्वर ने अपने अनुग्रह से उस सत्य के विषय में इनका मार्गदर्शन किया जिसमें यह मतभेद कर रहे थे। और परमेश्वर जिसको चाहता है, (अपने नियम अनुसार) सीधा मार्ग दिखा देता है। 213

(यह ढोंगी समझते हैं कि इनपर कोई कार्यभार डाले बिना ही इस मार्ग की सब कठिनाइयां परमेश्वर की सहायता से दूर हो जानीं चाहिए। ईश्वर भक्तो), तुम्हारा विचार है कि तुम स्वर्ग में प्रवेश कर जाओगे, यद्यपि वह परिस्थितियां अभी तुम्हारे सामने ही नहीं आईं (जो रसूलों के भेजने के परिणाम स्वरूप) उन लोगों के सामने आईं थीं जो तुमसे पहले चल बसे हैं? उन पर विपत्तियां आईं, कष्ट आए‌ और वे इतना झंझोड़े गए, कि रसूल और उसके मानने वाले सहयोगी सब पुकार उठे कि परमेश्वर की सहायता कब आएगी? (उस समय शुभ सूचना दी गई कि) सुनो, परमेश्वर की सहायता पास ही है। 214

वे तुम से पूछते हैं कि अच्छा, फिर क्या दान करें? कह दो कि जितना धन भी दान करोगे, वह तुम्हारे माता-पिता, रिश्तेदारों और (तुम्हारे ही समाज के) अनाथ, निर्धन व्यक्तियों और यात्रियों के लिए है, (इसलिए जितनी हिम्मत है, दान करो) और (संतुष्ट रहो कि) जो पुण्य भी तुम करोगे, वह कदापि व्यर्थ न होगा, इसलिए कि परमेश्वर उससे पूर्णतः अवगत है। 215

तुम पर युद्ध अनिवार्य किया गया और (परमेश्वर के मार्ग में दान करने जैसे) वह भी तुम्हें प्रिय नहीं, यद्यपि यह पूर्णतः संभव है कि तुम किसी कार्य को अप्रिय समझो और तुम्हारे लिए वही अच्छा हो और यह पूर्णतः संभव है कि तुम किसी कार्य को अच्छा समझो और वह तुम्हारे लिए बुरा हो। और सत्य यह है कि परमेश्वर जानता है और (इस प्रकार की अनेक बातों को) तुम नहीं जानते। 216

वे तुम से पूछते हैं कि प्रतिष्ठित महीने में युद्ध का क्या आदेश है? कह दो के इस में युद्ध बड़ी ही गंभीर बात है, परंतु परमेश्वर के मार्ग से रोकना और उसको न मानना और बैत-उल-हराम[5] का मार्ग लोगों पर बंद करना और उसके रहने वालों को वहाँ से निकालना परमेश्वर के निकट इससे भी अधिक गंभीर है। और अत्याचार तथा दबाव के माध्यम से लोगों को धर्म से फेरना तो हत्या से भी बड़ा पाप है। (तुम्हें जानना चाहिए कि जिन लोगों से युद्ध का आदेश तुम्हें दिया गया है, उन्होंने निश्चय कर लिया है कि) वे तुमसे निरंतर लड़ेंगे यहां तक कि यदि उनके लिए संभव हो तो तुम्हें तुम्हारे धर्म से वापस ले जाएं। और तुम में से जो कोई अपना धर्म त्याग देगा और फिर इसी कुफ़्र की दशा में मर जाएगा तो इसी प्रकार के लोग हैं जिनके कर्म इस लोक और परलोक दोनों में विफल हुए और यही नरक में पड़ने वाले हैं, यह उसमें सदा रहेंगे। इसके विपरीत जो लोग ईमान पर जमे रहे हैं और जिन्होंने पलायन किया और परमेश्वर के मार्ग में जिहाद किया है, वही परमेश्वर की दया के पात्र हैं और परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। 217-218

वे तुमसे जुए और शराब के बारे में पूछते हैं, (इसलिए कि यह भी इनके यहां निर्धन व्यक्तियों की सहायता का एक माध्यम है)। कह दो कि इन दोनों में पाप बहुत बड़ा है और (इसमें संदेह नहीं कि) लोगों के लिए इनमें कुछ लाभ भी हैं, परंतु इनका पाप इनके इस लाभ से कहीं बढ़कर है। और पूछते हैं कि (अच्छा, यह तो स्पष्ट कीजिए कि) क्या दान करें? कह दो कि वही जो आवश्यकता से अधिक है। परमेश्वर इसी प्रकार तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है ताकि तुम इस लोक और परलोक, दोनों के विषय में चिंतन करते रहो। और वे तुमसे पूछते हैं कि (युद्ध हुआ और लोग मारे गए तो उनके) अनाथ बच्चों के साथ क्या मामला किया जाए? कह दो: जिसमें उनकी भलाई हो, वही अच्छा है। और यदि तुम (उनकी माताओं से विवाह करके) उन्हें अपने साथ मिला लो तो वे तुम्हारे भाई हैं, और परमेश्वर जानता है कि कौन बिगाड़ने वाला है और कौन सुधार करने वाला है। और यदि परमेश्वर चाहता तो (इसकी अनुमति न देकर) तुम्हें कठिनाई में डाल देता। निःसंदेह, परमेश्वर बड़ा प्रभुत्वशाली है, वह बड़ा तत्वदर्शी है। 219-220

और (अनाथों की भलाई के उद्देश्य से भी) मुश्रिक स्त्रियों से विवाह न करो, जब तक वे ईमान न लाएँ। और (याद रखो कि) एक मुसलमान दासी बड़े परिवार की किसी मुश्रिक स्त्री से अच्छी है, यद्यपि वह तुम्हें भाती हो। और अपनी स्त्रियों को भी मुश्रिकों के विवाह में न दो, जब तक वे ईमान न लाएँ। और (याद रखो कि) एक मुसलमान दास बड़े परिवार के किसी मुश्रिक पुरुष से अच्छा है, यद्यपि वह तुम्हें भाता हो। यह (मुश्रिक लोग तुम्हें) नरक की ओर बुलाते हैं और परमेश्वर अपने अनुग्रह से स्वर्ग और क्षमा की ओर बुलाता है, और लोगों के लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है ताकि वे ध्यान दें। 221

और (विवाह का वर्णन हुआ है तो) वे तुमसे पूछते हैं कि (स्त्रियों के) मासिक-धर्म का क्या निर्देश है? कह दो, यह एक प्रकार की अपवित्रता है। अतः मासिक-धर्म की अवस्था में स्त्रियों से अलग रहो और जब तक वे रक्त से शुद्ध न हो जायें, उनके पास मत जाओ। फिर जब वे नहा कर शुद्धता प्राप्त कर लें तो उनसे मिलाप करो, जहां से परमेश्वर ने तुम्हें (उसका) आदेश दिया है। परमेश्वर अवश्य उनको प्रिय रखता है जो प्रायश्चित करने वाले हों और उनको जो विशुद्धता को अपनाने वाले हों। तुम्हारी यह स्त्रियाँ तुम्हारे लिए खेती समान हैं, इसलिए तुम अपनी इस खेती में जिस प्रकार चाहो, आओ और (इसके माध्यम से इस लोक और परलोक, दोनों में) अपने लिए आगे का प्रबंध करो और परमेश्वर से डरते रहो और अच्छे से जान लो कि तुम्हें (एक दिन) अवश्य उससे मिलना है। और मानने वालों को, (हे पैगंबर, इस भेंट के अवसर पर सफलता तथा कल्याण की) शुभ सूचना सुनाओ। 222-223

(स्त्रियों से संबन्धित कुछ अन्य मामले भी हैं, इन्हें भी समझ लो) और अपनी शपथों के लिए परमेश्वर के नाम को दूसरों से अच्छा व्यवहार करने और ईश्वर की मर्यादा का पालन करने और लोगों के बीच समझौता कराने में अड़चन न बनाओ और (सावधान रहो कि) परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है। परमेश्वर तुम्हारी उस शपथ पर तो तुम्हें नहीं पकड़ेगा जो तुम अनिच्छित रूप से ग्रहण करते हो, परंतु वह शपथ जो अपने मन के संकल्प से ग्रहण करते हो, उस पर अवश्य तुम्हें पूछेगा और सत्य यह है कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है, वह धैर्यवान है। (इसलिए) जो लोग अपनी पत्नियों से सहवास न करने की शपथ खा बैठें, उनके लिए चार महीने की ढील है। फिर वे वापस संपर्क कर लें तो निःसंदेह परमेश्वर क्षमा करने वाला है, उसकी कृपा शाश्वत है। और यदि तलाक़ का निर्णय कर लें तो  परमेश्वर से डरते हुए करें, इसलिए कि परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है। 224-227

और (यह दूसरी परिस्थिति पैदा हो जाए तो) जिन स्त्रियों को तलाक़ दी गई हो, वे अपने आपको तीन मासिक धर्म तक प्रतीक्षा में रखें। और यदि वे परमेश्वर पर और क़यामत के दिन पर विश्वास रखती हैं तो उनके लिए वैध नहीं है कि जो कुछ परमेश्वर ने उनके पेट में पैदा किया है, उसे छिपाएं। और उनके पति यदि सम्बन्धों को सुधारना चाहें तो इस (इद्दत की) अवधि में प्रचुर अधिकार रखते हैं कि उन्हें वापस लें और (यह इसलिए है कि इसमें तो संदेह नहीं कि) इन स्त्रियों के लिए भी उसी प्रकार अधिकार हैं, जिस प्रकार विधि अनुसार उनके ऊपर (पतियों के) अधिकार हैं, परंतु पुरुषों के लिए (पति होने के नाते) पत्नियों पर एक पद वरीयता का है। (यह परमेश्वर का निर्देश है) और परमेश्वर प्रभुत्वशाली है, वह बड़ा तत्वदर्शी है। 228

यह तलाक़ (एक विवाह बंधन में) दो बार (दिया जा सकता) है। इसके बाद फिर भले ढंग से रोक लेना है या सज्जनता के साथ विदा कर देना है। और विदा कर देने का निर्णय हो तो तुम्हारे लिए वैध नहीं है कि जो कुछ तुमने इन स्त्रियों को दिया है, उसमें से कुछ भी इस अवसर पर वापस लो। अपितु, उस समय अवैध नहीं जब दोनों को डर हो कि वे ईश्वर की मर्यादा पर जमे नहीं रह सकेंगे। फिर, (लोगो), यदि तुम्हें भी डर हो कि वे ईश्वर की मर्यादा पर जमे नहीं रह सकते तो (पती की दी हुई) उन वस्तुओं के विषय में उन दोनों पर कोई पाप नहीं है जो स्त्री फ़िद्ये में देकर तलाक़ प्राप्त कर ले। यह परमेश्वर की निर्धारित सीमाएं हैं, इसलिए इन से आगे न बढ़ो और (जान लो कि) जो परमेश्वर की सीमाओं से आगे बढ़ते हैं, वही अत्याचारी हैं। 229

फिर यदि (दो बार तलाक़ से फिर जाने के बाद) पति ने (इस विवाह बंधन में) पत्नी को (तीसरी बार) तलाक़ दे दी तो अब वह उसके लिए वैध नहीं होगी, जब तक उसे छोड़ किसी अन्य पति से विवाह न करे। परंतु यदि उस (दूसरे पति) ने भी उसे तलाक दे दी तो पहले पति-पत्नी के लिए एक दूसरे की ओर पलटने में कोई आपत्ति नहीं है, यदि यह आशा करते हों कि अब वे ईश्वर की मर्यादा पर जमे रह सकेंगे। यह परमेश्वर की निर्धारित सीमाएं हैं जिन्हें वह उन लोगों के लिए स्पष्ट कर रहा है जो ज्ञान प्राप्त करना चाहते हों। 230

और जब तुम स्त्रियों को तलाक दो और उनकी इद्दत पूरी होने को आ जाए तो उन्हें भले प्रकार से रोक लो या भले प्रकार से विदा कर दो और उन्हें हानि पहुंचाने की इच्छा से कभी भी न रोको कि इस प्रकार उन पर अतिक्रमण करो। और (जान लो कि) जो ऐसा करेगा, वह स्वयं अपने आप पर अत्याचार ढाएगा। और परमेश्वर की आयतों को उपहास न बनाओ, और अपने ऊपर परमेश्वर के उपकार को याद रखो, और उस क़ानून और हिकमत को याद रखो जो उसने तुम पर उतारी है, जिसका वह तुम्हें सदुपदेश करता है, और परमेश्वर से डरते रहो और अच्छे से जान रखो के परमेश्वर हर बात से अवगत है। 231

और जब तुम स्त्रियों को तलाक दो और वे अपनी इद्दत पूरी कर लें तो अब इसमें बाधा न डालो कि वे अपने होने वाले पतियों से विवाह कर लें, जब वे विधि अनुसार आपस में विवाह करने के लिए मान जाएं। यह सदुपदेश तुम में से उन लोगों को किया जाता है जो परमेश्वर पर और क़यामत के दिन पर विश्वास रखते हैं। यही तुम्हारे लिए अधिक शालीन और अधिक पवित्र मार्ग है। और सत्य यह है कि परमेश्वर जानता है और तुम नहीं जानते। 232

और (तलाक के बाद भी) माताएं उन लोगों के लिए जो दूध पिलाने की अवधि पूरी करना चाहते हों, अपने बच्चों को पूरे दो वर्ष दूध पिलाएंगी और बच्चे के पिता को (इस परिस्थिति में) विधि अनुसार उनका खाना कपड़ा देना होगा। किसी पर उसके सामर्थ्य से अधिक भार नहीं डाला जाए। न किसी मां को उसके बच्चे के कारण हानि पहुंचाई जाए और न किसी पिता को उसके बच्चे के कारण — और इसी प्रकार का दायित्व उसके वारिस पर भी है — फिर यदि दोनों आपसी सहमति और आपसी परामर्श से दूध छुड़ाना चाहें तो दोनों पर कोई पाप नहीं है। और यदि तुम अपने बच्चों को किसी और से दूध पिलवाना चाहो तो इसमें भी तुम्हारे लिए कोई आपत्ति नहीं, इस शर्त के साथ कि (बच्चे की माता से) जो कुछ तुमने देने का वादा किया है, वह नियम अनुसार उसे दे दो। और परमेश्वर से डरते रहो, और ध्यान रखो कि जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे देख रहा है। 233

और तुममें से जिन लोगों की मृत्यु हो जाए और अपने पीछे पत्नियां छोड़ें तो वे भी अपने आप को चार महीने दस दिन प्रतीक्षा में रखें। फिर जब उनकी इद्दत पूरी हो जाए तो अपने लिए विधि अनुसार जो कुछ वह करें, उसका तुम पर कोई पाप नहीं है। और जो कुछ तुम करते हो परमेश्वर उसे अच्छे से जानता है। और तुम्हारे लिए इसमें भी कोई पाप नहीं जो तुम सांकेतिक रूप में विवाह का संदेश स्त्रियों को दो या उसको अपने मन में छिपाए रखो। परमेश्वर जानता है कि तुम उनसे यह बात तो करोगे ही। अतः करो, परंतु (इसमें) कोई वादा उन से छिपकर न करना। अपितु, विधि अनुसार कोई बात कह सकते हो। और विवाह की गांठ उस समय तक न बांधो, जब तक क़ानून अपनी अवधि पूरी न कर ले। और जान रखो कि परमेश्वर जानता है जो कुछ तुम्हारे मन में है, इसलिए उससे डरो और जान रखो कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है वह बड़ा धैर्यवान है। 234-235

और यदि तुम स्त्रियों को इस रूप में तलाक़ दो कि तुमने उन्हें हाथ नहीं लगाया या उनका महर निर्धारित नहीं किया तो महर के विषय में तुम पर कोई पाप नहीं है, परंतु यह तो अवश्य होना चाहिए कि विधि अनुसार उन्हें जीवन व्यतीत करने की कुछ सामग्री दे कर विदा करो, उत्तम सामाजिक स्थिति वाले अपनी स्थिति के अनुसार और निर्धन अपनी स्थिति के अनुसार। यह दायित्व है उन पर जो भला आचरण अपनाने वाले हों। परंतु तुमने यदि तलाक़ तो उन्हें हाथ लगाने से पहले दी, किंतु उनका महर निर्धारित कर चुके हो तो निर्धारित महर का आधा उन्हें देना होगा, पर उस स्थिति में नहीं कि वे अपना अधिकार छोड़ें या वह छोड़ दे जिसके हाथ में विवाह की गांठ है। और यह पुण्यशीलता के अधिक निकट है कि तुम पुरुष अपना अधिकार छोड़ दो और अपने बीच की श्रेष्ठता मत भूलो। निःसन्देह परमेश्वर उसको देख रहा है जो तुम कर रहे हो। 236-237

(यह परमेश्वर की शरीअत है। इस पर जमे रहना चाहते हो तो) अपनी नमाज़ों की रक्षा करो, विशेषतः उस नमाज़ की जो (दिन और रात की नमाज़ों के) मध्य में आती है, (जब तुम्हारे लिए अपने काम-काज से निकलना सहज नहीं होता), और (सब कुछ छोड़कर) परमेश्वर के सामने अत्यंत आदर के साथ खड़े हो जाओ। फिर यदि खतरे का अवसर हो तो पैदल या सवारी पर, जिस प्रकार चाहे पढ़ लो। परंतु जब शांति हो जाए तो परमेश्वर को उसी रूप में याद करो, जो उसने तुम्हें सिखाया है, जिसे तुम नहीं जानते थे। 238-239

और हां, (विधवा और तलाक़ पाई हुई स्त्री के विषय में जो निर्देश तुम्हें दिए गए हैं, उनसे संबंधित यह स्पष्टीकरण आवश्यक है कि) तुममें से जो लोग मर जाएं और अपने पीछे पत्नियां छोड़ रहे हों, वे अपनी उन पत्नियों के लिए साल भर की जीवन सामग्री वसीयत कर जाएं और यह भी कि (इस अवधि में) उन्हें घर से न निकाला जाए। परंतु वे स्वयं घर छोड़ दें तो जो कुछ नियम की बात वे अपने विषय में करें, उसका तुम पर कोई पाप नहीं है। (यह परमेश्वर का नियम है) और परमेश्वर प्रभुत्वशाली है, वह बड़ा तत्वदर्शी है। 240

और (इसी प्रकार यह स्पष्टीकरण भी आवश्यक है कि) तलाक़ पाई हुई स्त्रियों को हर स्थिति में विधि अनुसार कुछ जीवन सामग्री देकर विदा करना चाहिए। यह हक़ है उन पर जो परमेश्वर से डरने वाले हों। 241

परमेश्वर इसी प्रकार तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है ताकि तुम समझने वाले बनो। 242

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(यह विषय जिहाद और दान के बारे में तुम्हारे प्रश्नों से पैदा हुए थे। हे मानने वालो, इनके बारे में दिशा-निर्देश तुम्हें बुरे नहीं लगने चाहिए)। क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो हज़ारों की संख्या में थे और मृत्यु के भय से अपने घर छोड़कर उनसे निकल भागे? इस पर परमेश्वर ने उनसे कहा कि मृत हो कर जियो। (वे बरसों इसी स्थिति में रहे), फिर परमेश्वर ने उन्हें पुनः जीवन प्रदान किया। इसमें संदेह नहीं कि परमेश्वर लोगों पर अत्यंत कृपा करने वाला है, परंतु लोगों में अधिकांश ऐसे हैं जो (उसके) आभारी नहीं होते। 243

(हे मानने वालो, इससे सीख लो) और परमेश्वर के मार्ग में युद्ध करो और अच्छे से जान रखो कि परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है। कौन है जो (इस युद्ध के लिए) परमेश्वर को उधार देगा, भला उधार कि परमेश्वर उसके लिए उसे कई गुना बढ़ा दे। और (जो मुंह फेरे तो उसे जानना चाहिए कि) परमेश्वर ही है जो दरिद्रता भी देता है और समृद्धि भी, और तुमको (एक दिन) उसी की ओर लौटना भी है। 244-245

तुमने मूसा के बाद इस्राईलियों के सरदारों को नहीं देखा, जब उन्होंने अपने एक नबी से कहा: आप हमारे लिए एक राजा नियुक्त कर दें ताकि हम (उसके आदेश पर) परमेश्वर के मार्ग में युद्ध करें? इसपर नबी ने कहा: ऐसा न हो कि तुम पर जिहाद अनिवार्य किया जाए और फिर तुम जिहाद न करो? वे बोले: हम क्यों परमेश्वर के मार्ग में जिहाद नहीं करेंगे, जब कि हमें हमारे घरों और हमारे बच्चों से दूर निकाल दिया गया है? परंतु (हुआ यही) कि जब उन पर जिहाद अनिवार्य किया गया तो उनमें से थोड़े से लोगों को छोड़ कर बचे हुए सब लोग विमुख हो गए, और सत्य यह है कि परमेश्वर इन अत्याचारियों से भली-भांति परिचित था। 246

और (उनकी इस मांग पर) उनके नबी ने उन्हें बताया कि परमेश्वर ने तालूत को तुम्हारे लिए राजा नियुक्त कर दिया है। बोले: उसका शासन हम पर किस प्रकार हो सकता है, जबकि हम उससे बढ़कर इस राज्य के अधिकारी हैं और वह कोई धनवान व्यक्ति भी नहीं है? नबी ने उत्तर दिया: परमेश्वर ने उसी को (तुम पर शासन के लिए) चुन लिया है और इस उद्देश्य के लिए उसे ज्ञान और शरीर, दोनों में व्यापक क्षमता प्रदान की है। (यह सत्ता परमेश्वर की है) और परमेश्वर अपनी यह सत्ता, (अपने ज्ञान के अनुसार), जिसको चाहे, प्रदान करता है। (तुम मामलों को अपनी सीमित दृष्टि से देखते हो) और परमेश्वर व्यापक क्षमता रखने वाला है, वह हर बात से परिचित है। और उनके नबी ने उनके लिए और स्पष्ट किया कि (परमेश्वर की ओर से) उसके राजा नियुक्त किए जाने की निशानी यह है कि (तुम्हारा) वह संदूक (तुम्हारे शत्रुओं के हाथ से निकल कर) तुम्हारे पास आ जाएगा जिसमें तुम्हारे प्रभु की ओर से (तुम्हारे लिए) सदैव बड़ी प्रशांति रही है और जिसमें वह विशेष स्मृतियाँ भी हैं जो मूसा और हारून के वंशजों ने (तुम्हारे लिए) छोड़े हैं। उसे फ़रिश्ते उठाए हुए होंगे। इसमें, अवश्य तुम्हारे लिए एक बड़ी निशानी है, यदि तुम मानने वाले हो। 247-248

(इस्राईलियों के सत्ता संभालने के बाद) फिर जब तालूत सेना लेकर निकले तो उन्होंने लोगों को बताया कि परमेश्वर ने निर्णय किया है कि वह एक नदी के माध्यम से तुम्हारी परीक्षा करेगा। यह इस प्रकार होगा कि जो इसका पानी पिएगा, वह मेरा साथी नहीं है और जिसने इस नदी से कुछ नहीं चखा, वह मेरा साथी है। हाँ, परंतु अपने हाथ से एक चुल्लू कोई पी ले तो पी ले। तथापि हुआ यह कि उनमें से थोड़े लोगों को छोड़ शेष सब ने उस नदी का पानी पी लिया। फिर जब तालूत उसके पार उतरे तो उनके वे साथी भी जो अपने ईमान पर जमे रहे, (और सेनाएँ देखी) तो (जो लोग परीक्षा में पूरे नहीं उतरे थे), उन्होंने कह दिया कि हम तो आज जालूत और उसकी सेनाओं का सामना नहीं कर सकते। इसपर वे लोग जिन्हें ध्यान था कि उनको परमेश्वर से मिलना है, बोल उठे कि (साहस करो, इसलिए कि) अनेक बार ऐसा हुआ है कि परमेश्वर की आज्ञा से छोटे समूहों ने बड़े समूहों पर विजय पाई है, और परमेश्वर तो दृढ़ संकल्प वालों के साथ होता है। और (यही सच्चे मुसलमान थे कि) जब जालूत और उसकी सेनाओं का सामना हुआ तो उन्होंने प्रार्थना की कि प्रभु, हम पर धैर्य की कृपा कर और हमारे पाँव जमा दे और इन नकारने वाले लोगों पर हमें विजय प्रदान करदे। अतः (उनकी प्रार्थना स्वीकार हुई और) परमेश्वर के आदेश से उन्होंने अपने शत्रु को पराजित कर दिया और दाऊद ने जालूत का संहार कर दिया और परमेश्वर ने उसे राजसत्ता दी और प्रज्ञा प्रदान की और उसे उस ज्ञान में से सिखाया जो परमेश्वर चाहता है कि अपने इस प्रकार के भक्तों को सिखाए — और सत्य यह है कि यदि परमेश्वर एक को दूसरे से नहीं हटाता तो धरती बिगाड़ से भर जाती, परंतु (उसने इसी प्रकार हटाया है, इसलिए कि) परमेश्वर दुनिया वालों पर बड़ी कृपा करने वाला है। 249-251

यह परमेश्वर की आयतें हैं जो हम तुम्हें सत्य के साथ सुना रहे हैं, और इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम परमेश्वर के रसूलों में से हो। (इस्राईली भी इस बात को जानते हैं, परंतु मानते इसलिए नहीं हैं कि) यह जो रसूल हैं, हमने इनमें से एक को दूसरे पर श्रेष्ठता दी, (इस प्रकार कि) इनमें से किसी से परमेश्वर ने स्वयं वार्ता की और किसी का स्तर उसने (कुछ अन्य प्रकार से) ऊंचा किया और (अंत में) मर्यम के पुत्र ईसा को हमने अत्यंत स्पष्ट निशानियाँ दीं और रूह-उल-क़ुदुस[6] से उसका समर्थन किया। (अतः यही बात इन रसूलों के मानने वालों में एक दूसरे को झूठा बताने का कारण बन गई)। और यदि परमेश्वर चाहता तो अत्यंत स्पष्ट प्रमाण उनके सामने आ गए थे, उनके बाद यह रसूलों के उत्तराधिकारी एक दूसरे से न लड़ते, परंतु (परमेश्वर ने यह नहीं चाहा कि लोगों पर कुछ जबरन थोपे, इसलिए) उन्होंने मतभेद किया। अतः उनमें से कोई (इन रसूलों पर) ईमान लाया और किसी ने मानने से नकार दिया। (तुमको न मानने का कारण भी यही है, हे पैगंबर), और यदि परमेश्वर चाहता तो वह कभी भी आपस में न लड़ते, परंतु परमेश्वर (अपनी सूक्ष्म दृष्टि के अनुसार) जो चाहता है करता है। 252-253

हे मानने वालो, (तुम इन्हें इनकी दशा में छोड़ो और) जो कुछ हमने तुम्हें दिया है, उसमें से (परमेश्वर के मार्ग में) उस दिन के आने से पहले दान कर लो, जिसमें न ख़रीदना-बेचना होगा, न (किसी की) मित्रता काम आए गी और न कोई अनुशंसा लाभ देगी। और सत्य यह है कि उस दिन को नकारने वाले ही अपने आप पर अत्याचार करने वाले हैं। 254

(उस दिन मामला केवल परमेश्वर से होगा)। परमेश्वर, जिसके अतिरिक्त कोई उपासना योग्य नहीं, जीवंत-सत्ता और सब को धारण रखने वाला। न उसको ऊंघ आती है न नींद। धरती और समस्त आकशों में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है जो बिना उसकी अनुमति के उसके समक्ष किसी की अनुशंसा करे। लोगों के आगे और पीछे की हर बात जानता है और वे उसके ज्ञान में से कुछ भी अपनी पकड़ में नहीं ले सकते, परंतु जितना वह चाहे। उसका शासन धरती और समस्त आकाशों पर छाया हुआ है और उनकी रक्षा उसके लिए कुछ भी भारी नहीं होती, और वह सर्वोच्च है, बड़ी महिमा वाला है। 255

(यह जो आचरण चाहें, अपनाएं), धर्म के विषय में (परमेश्वर की ओर से) कोई जबर नहीं है। सत्य यह है कि सीधा मार्ग (इस क़ुरआन के बाद अब) दूषित मार्ग से पूर्णतः अलग हो चुका है। इसलिए जिसने शैतान को नकारा और परमेश्वर को माना तो मानो उसने अत्यंत दृढ़ रस्सी पकड़ ली जो कभी टूट नहीं सकती। और (यह इसलिए कि) परमेश्वर सुनने वाला और जानने वाला है। 256

(यह मार्गदर्शन पाना चाहें तो) परमेश्वर मानने वालों का सहायक है। वह उन्हें अँधेरों से प्रकाश की ओर निकाल ले जाता है। इसके विपरीत न मानने वालों के सहायक उनके शैतान हैं, वे उन्हें प्रकाश से अँधेरों की ओर निकाल ले जाते हैं। यही नरकवासी हैं, यह उसमें सदा रहेंगे। 257

(इस बात को समझना चाहते हो तो उसके कई उदाहरण हैं)। क्या तुमने उस व्यक्ति को नहीं देखा जिसने इब्राहीम से उसके प्रभु के बारे में वाद-विवाद करना चाहा, इसलिए कि परमेश्वर ने उसे सत्ता प्रदान की थी? उस समय, जब इब्राहीम ने उससे कहा कि मेरा प्रभु तो वह है जो मृत्यु देता और जीवित करता है। उसने उत्तर दिया कि मैं भी मारता हूँ और जीवित करता हूँ। इब्राहीम ने उसी क्षण कहा: अच्छा तो ऐसा है कि परमेश्वर सूर्य को पूरब से निकालता है, तुम उसे पश्चिम से निकाल लाओ। अतः (यह सुन कर) वह सत्य को नकारने वाला पूर्णतः अचंभित रह गया। और सत्य यह है कि इस प्रकार के अत्याचारी लोगों का परमेश्वर कभी मार्गदर्शन नहीं करता। 258

या उस व्यक्ति का उदाहरण है जो एक ऐसी बस्ती के पास से निकला जो अपनी छतों पर गिरी पड़ी थी। उसने आश्चर्य से कहा: इसके इस प्रकार नष्ट हो जाने के पश्चात परमेश्वर इसे कैसे पुनः जीवित करेगा? इसपर परमेश्वर ने उसे सौ वर्ष के लिए मृत्यु दी, फिर उसको उठाया (और) पूछा: कितने समय तक पड़े रहे? उसने उत्तर दिया: एक दिन या उससे भी कुछ कम रहा हूँ गा। कहा: नहीं, अपितु सौ वर्ष इसी अवस्था में तुम पर निकल गए। अब ज़रा अपने खाने और पीने की वस्तुओं को देखो, इनमें से कोई सड़ी नहीं। दूसरी ओर ज़रा अपने गधे को देखो कि हम उसको किस प्रकार जीवित करते हैं, इसलिए कि तुम्हें इस बस्ती के उठाए जाने पर विश्वास हो और इसलिए कि हम लोगों के लिए तुम्हें (आशा की) एक निशानी बना दें, और हड्डियों की ओर देखो, हम कैसे उनको उठाते और फिर उनपर मांस चढ़ाते हैं। इस प्रकार जब सत्य उसपर स्पष्ट हो गया तो वह पुकार उठा कि (अब कोई संदेह नहीं रहा), मैं जानता हूँ कि परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है। 259

और (इस विषय में) वह घटना भी सामने रहे, जब इब्राहीम ने कहा था कि प्रभु, मुझे दर्शन करा दें कि आप मृतकों को किस प्रकार जीवित करेंगे? कहा: क्या तुम विश्वास नहीं रखते? निवेदन किया: विश्वास तो रखता हूँ, परंतु इच्छा है कि मेरा मन भी पूर्णतः संतुष्ट हो जाए। कहा: अच्छा, तो चार पक्षी लो, फिर उनको अपने साथ हिला-मिला लो, फिर (उनको काट कर के) हर पहाड़ी पर उनमें से एक-एक को रख दो, फिर उन्हें पुकारो, वे (जीवित होकर) दौड़ते हुए तुम्हारे पास आ जाएंगे, और (भविष्य के लिए) अच्छे से समझ लो कि परमेश्वर प्रभावी है, वह बड़ा तत्वदर्शी है। 260

(मार्गदर्शन और मार्गभ्रष्टता के विषय में परमेशर की कार्यप्रणाली यही है। इसलिए यह नहीं मानते तो उन्हें छोड़ो और तुम अच्छे से समझ लो कि) परमेश्वर के मार्ग में अपना धन दान करने वालों का यह कार्य ऐसे दाने जैसा है जिससे सात बालें निकलें, इस प्रकार कि हर बाल में सौ दाने हों। परमेश्वर (अपनी तत्व दर्शिता के अनुसार) जिसके लिए चाहता है, इसी प्रकार बढ़ा देता है। और सत्य यह है कि परमेश्वर बड़ी व्यापकता वाला है, वह हर चीज़ को जानता है। जो लोग परमेश्वर के मार्ग में अपने धन को दान करते हैं, फिर जो कुछ दान किया है, उसके बाद न उपकार जताते हैं, न दिल दुखाते हैं, उनके लिए उनके प्रभु के पास उनका अच्छा फल है और उनके लिए न वहाँ कोई भय है और न वे कभी दुखी होंगे। एक अच्छा बोल और (एक अप्रिय घटना के समय) क्षमा करना उस दान से कहीं अच्छा है जिसके साथ कष्ट लगा हुआ हो। और (तुम्हें जानना चाहिए कि) इस प्रकार के दान की परमेश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है, (इस आचरण पर वह तुम्हें वंचित कर देता, परंतु उसका मामला यह है कि) इसके साथ वह बड़ा सहनशील भी है। हे मानने वालो, उपकार जताकर और (दूसरों का) मन दुखाकर के अपने दान को उन लोगों के समान व्यर्थ मत करो को अपना धन लोगों को दिखाने के लिए देते हैं और वे न परमेश्वर को मानते हैं और न क़यामत के दिन को मानते हैं। अतः उनका उदाहरण ऐसा है कि एक चटान हो जिसपर कुछ मिट्टी हो, फिर उस पर घोर वर्षा पड़े और उसको पूर्णतः चटान की चटान छोड़ जाए। (क़यामत के दिन) उनकी कमाई में से कुछ भी उनके हाथ न आएगा। और सत्य यह है कि इस प्रकार के अकृतज्ञ लोगों का परमेश्वर कभी मार्गदर्शन नहीं करता। 261-264

परमेश्वर की प्रसन्नता को चाहने के लिए और अपने आप को सत्य पर जमाए रखने के उद्देश्य से अपना धन दान करने वाले उस बाग के समान हैं जो ऊंची और समतल भूमि पर स्थित हो। उसपर घोर वर्षा हो जाए तो अपना फल दुगुना लाए और घोर वर्षा ना हो तो हल्की फुहार भी पर्याप्त हो जाए। (यह उदाहरण सामने रखो) और (संतुष्ट रहो कि) जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे देख रहा है। 265

क्या तुममें किसी को यह अच्छा लगेगा कि उसके पास खजूरों और अंगूरों का बाग़ हो जिसके नीचे झरने बहते हों। उसमें उसके लिए सब प्रकार के फल हों और वह बूढ़ा हो जाए और उसके बच्चे अभी निर्बल हों और बाग़ पर एक आग भरा बगूला फिर जाए और वह जल कर राख हो जाए। (उपकार जता कर और दूसरों की भावनाएँ आहत कर के अपना दान बर्बाद कर लेने वालों की स्थिति क़यामत में यही होगी)। परमेश्वर इसी प्रकार अपनी आयतें तुम्हारे लिए स्पष्ट करता है ताकि तुम ध्यान दो। 266

हे मानने वालो, अपनी पवित्र कमाई में से दान करो और उसमें से भी जो हमने तुम्हारे लिए धरती में से निकाला है, और उसमें से कोई बुरी चीज़ (परमेश्वर के मार्ग में) दान करने की तो कल्पना भी न करो। तुम इस प्रकार की चीज़ों में से दान करते हो, परंतु अपनी दशा यह है कि उसका दाम घटा न लो तो उसे लेने के लिए उत्सुक नहीं होते और जान रखो कि (तुम्हारे इस दान से) परमेश्वर निस्पृह है, वह उत्तम गुणों वाला है। 267

शैतान तुम्हें धन के अभाव से डराता और (ख़र्च के लिए) निर्लज्जता के मार्ग का सुझाव देता है और परमेश्वर अपनी ओर से तुम्हारे साथ क्षमा और उपकार का वचन करता है, और परमेश्वर बड़ा व्यापक और परम ज्ञानी है। वह (अपने नियम अनुसार) जिसको चाहता है, इस वचन की समझ बूझ प्रदान करता है, और जिसे यह समझ बूझ दी गई, उसे तो वास्तव में विपुल सौभाग्य का एक भंडार दे दिया गया। परंतु (इस प्रकार की बातों से) केवल बुद्धिजीवी ही शिक्षा ग्रहण करते हैं। 268-269

(इस बात को समझ लो) और (संतुष्ट रहो कि) जो दान भी तुम करोगे या जो मन्नत भी तुम मानोगे, उसका बदला अवश्य पाओगे, इसलिए कि परमेश्वर उसे जानता है और (परमेश्वर की इस शिक्षा से विमुख हो कर) अपने आप पर अत्याचार करने वालों का (परमेश्वर के पास) कोई सहायक न होगा। 270

तुम अपने दान सब के सामने दो तो यह भी क्या अच्छी बात है और उसे छिपाओ और निर्धन व्यक्तियों को दे दो तो यह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा है। (परमेश्वर तुमको इसका अच्छा बदला देगा) और तुम्हारे बहुत से पाप तुमसे झाड़ देगा और सत्य यह है कि जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे पूर्णतः अवगत है। 271

(इस्राईली नहीं मानते तो हे पैगंबर), इनको सन्मार्ग पर ले आना तुम्हारा दायित्व नहीं है, अपितु परमेश्वर ही जिसका चाहता है, (अपने नियम अनुसार) मार्गदर्शन करता है। (अपितु, हे मानने वालो, तुम समझ लो कि) जो धन भी तुम दान करोगे, उसका लाभ तुम्हें ही मिलना है, और तुम इसी लिए तो धन लुटा रहे हो कि परमेश्वर की प्रसन्नता प्राप्त हो, और (इस उद्देश्य से) जो धन भी तुम दान करोगे, वह (क़यामत में) तुम्हें पूरा कर दिया जाएगा और तुम्हारी कमाई में थोड़ा सा भी घाटा न होगा। 272

यह विशेषतः उन गरीबों के लिए है जो परमेश्वर के मार्ग में घिरे हुए हैं, (अपने व्यापार के लिए) धरती में कोई संघर्ष नहीं कर सकते, उनके आत्मसम्मान के कारण अंजान व्यक्ति उनको धनवान समझता है, उनके चेहरों से तुम उन्हें पहचान सकते हो, वे लोगों से लिपट कर भिक्षा नहीं मांगते। (उनकी सहायता करो) और (समझ लो कि इस उद्देश्य के लिए) जो धन भी तुम दोगे, उसका अच्छा फल तुम्हें अवश्य मिलेगा, इसलिए कि परमेश्वर उसे भली भांति जानता है। जो लोग दिन रात, खुले हुए और चुपके-चुपके अपना धन (परमेश्वर के मार्ग में) देते हैं, उनके लिए उनका अच्छा फल उनके प्रभु के पास है और वहाँ उनके लिए न कोई आशंका है और न वे कभी दुखी होंगे। 273-274

इसके विपरीत जो लोग ब्याज खाते हैं, वे क़यामत में उठेंगे तो ठीक ऐसे व्यक्ति के समान जिसे शैतान ने अपने छूने से पागल बना दिया हो। यह इस कारण कि उन्होंने कहा कि व्यापार भी तो अंततः ब्याज ही के समान है और आश्चर्य है कि परमेश्वर ने व्यापार को वैध और ब्याज को अवैध घोषित किया है। (इसमें कोई संदेह नहीं कि परमेश्वर ने उसे अवैध घोषित किया है), इसलिए जिसे उसके प्रभु की चेतावनी पहुंची और वह सुधर गया तो जो कुछ वह ले चुका, सो ले चुका। (उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं होगी) और उसका मामला परमेश्वर के लिए है। और जो (इस चेतावनी के बाद भी) फिर से ब्याज लेंगे तो वे नरकवासी हैं, वे उसमें सदा रहेंगे। (उस दिन) परमेश्वर ब्याज को मिटाएगा और दान को बढ़ाएगा और सत्य यह है कि परमेश्वर किसी अकृतज्ञ और किसी के अधिकार का हनन करने वाले से प्रेम नहीं करता। हाँ, जो लोग मान गए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और नियमित रूप से नमाज़ पढ़ी और ज़कात का भुगतान किया, उनके लिए उनका अच्छा फल उनके प्रभु के पास है और वहाँ उनके लिए न कोई आशंका होगी और न वे कोई दुख उठाएंगे। 275-277

हे मानने वालो, यदि तुम सच्चे मानने वाले हो तो परमेश्वर से डरो और जितना ब्याज शेष रह गया है, उसे छोड़ दो। परंतु यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो परमेश्वर और उसके रसूल की ओर से युद्ध के लिए सावधान हो जाओ, और यदि प्रायश्चित कर लो तो तुम्हारी मूल धनराशि का तुम्हें अधिकार है। न तुम किसी के साथ अन्याय करोगे, न तुम्हारे साथ अन्याय किया जाएगा। और ऋणी कभी कठिनाई में हो तो समृद्ध होने तक उसे छूट दो और यदि तुम क्षमा करो तो यह तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम समझते हो। और उस दिन से डरो, जिसमें परमेश्वर की ओर लौटाए जाओगे। फिर हर व्यक्ति को उसकी कमाई वहाँ पूरी मिल जाएगी और लोगों से साथ कोई अन्याय नहीं होगा। 278-281

हे मानने वालो, (उधार के मामले तब भी होंगे। इसलिए) तुम किसी निर्धारित अवधि के लिए उधार का लेन देन करो तो उसे लिख लो और चाहिए कि उसको तुम्हारे बीच कोई लिखने वाला न्यायपूर्वक लिखे। और जिसे लिखना आता हो, वह लिखने से मना न करे, अपितु जिस प्रकार परमेश्वर ने उसे सिखाया है, वह भी दूसरों के लिए लिख दे। और यह दस्तावेज़ उसे लिखवाना चाहिए जिस पर उधार को चुकाने का दायित्व होता है। और वह अपने प्रभु परमेश्वर से डरे और उसमें कोई कटौती न करे। फिर यदि वह व्यक्ति जिस पर उधार चुकाने का दायित्व होता है, नासमझ या शक्तिहीन हो या लिखवा न सकता हो तो उसके अभिभावक को चाहिए कि वह न्यायपूर्वक लिखवा दे। और तुम इस पर अपने पुरुषों में से दो व्यक्तियों को गवाही करा लो, परंतु यदि दो पुरुष न हों तो एक पुरुष और दो महिलाएं हों, तुम्हारे अपनी पसंद के गवाहों में से। दो महिलाएं इसलिए कि यदि एक उलझेगी तो दूसरी उसको याद दिला देगी। और यह गवाह जब बुलाए जाएँ तो उन्हें मना नहीं करना चाहिए। और मामला छोटा हो या बड़ा, उसकी समय सीमा तक उसे लिखने में सुस्ती न करो। परमेश्वर की दृष्टि में यह प्रक्रिया अधिक न्यायसंगत है, गवाही को अधिक दोष-रहित रखने वाला है और इससे तुम्हारी शंकाओं में पड़ने की संभावना कम हो जाती है। हाँ, यदि लेन देन आमने सामने हाथों हाथ हो, तब उसके न लिखने में तुम्हारे लिए कोई समस्या नहीं है। और सौदा करते समय भी गवाह बना लिया करो, और (सावधान रहो कि) लिखने वाले या गवाही देने वाले को कोई हानि न पहुंचाई जाए, और यदि तुम ऐसा करोगे तो यह ऐसा पाप है जो तुम्हारे साथ चिपक जाएगा। और परमेश्वर से डरते रहो, और (इस बात को समझो कि) परमेश्वर तुम्हें शिक्षा दे रहा है, और परमेश्वर हर बात से अवगत है। 282

और यदि तुम यात्रा में हो और तुम्हें कोई लिखने वाला न मिले तो ऋण का मामला गिरवी रखने के रूप में भी हो सकता है। फिर यदि एक दूसरे पर भरोसे की स्थिति पैदा हो जाए तो जिसके पास (गिरवी वस्तु) सुरक्षित रखी गई है, वह यह वस्तु वापस कर दे और अपने प्रभु, परमेश्वर से डरता रहे (और इस विषय में गवाही करा ले), और गवाही (जिस रूप में भी हो, उस) को कभी भी न छिपाओ और (याद रखो कि) जो उसे छिपाएगा, उसका मन पापी होगा, और (याद रखो कि) जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उसे जानता है। 283

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धरती और समस्त आकाशों में जो कुछ है, सब परमेश्वर ही का है, (इसलिए, हे इस्राईल पुत्रो , तुम भी एक दिन उसी की ओर लौटाए जाओगे) और जो कुछ तुम्हारे मन में है, उसे तुम व्यक्त करो या छिपाओ, परमेश्वर उसका हिसाब तुमसे लेगा। फिर जिसको चाहेगा, (अपने नियम अनुसार) क्षमा कर देगा और जिसको चाहेगा, दंडित करेगा, और परमेश्वर हर कार्य का सामर्थ्य रखता है। 284

(तुम नहीं मानते तो इसका परिणाम भी तुम्हें ही देखना है)। हमारे पैगंबर ने तो उस बात को मान लिया है जो उसके प्रभु की ओर से उस पर उतारी गई है, और उसके मानने वालों ने भी। इन सब ने परमेश्वर को माना, और उसके फ़रिश्तों और उसके ग्रन्थों और उसके पैगंबरों को माना। (यह स्वीकार करते हैं कि) हम परमेश्वर के पैगंबरों में से किसी के बीच कोई भेद नहीं करते और उन्होंने कह दिया है कि हमने सुना और आज्ञा का पालन किया। प्रभु, हम तेरी क्षमा चाहते हैं, और (जानते हैं कि) हमें लौट कर तेरे ही पास पहुँचना है।  — यह सत्य है कि परमेश्वर किसी पर उसकी शक्ति से अधिक भार नहीं डालता। (उसका नियम है कि) उसी को मिलेगा जो उसने कमाया है और वही भोगेगा जो उसने किया है — प्रभु, हम भूल जाएं या ग़लती कर जाएं तो उस पर हमारी पकड़ न कर। और प्रभु, तू हम पर कोई ऐसा भार न डाल जो तूने हमसे पूर्व लोगों पर डाला था। और प्रभु, कोई ऐसा भार जिसको उठाने की क्षमता हम नहीं रखते, तू हम से न उठवा, और हमारे पापों को अनदेखा कर और हमें क्षमा कर दे और हम पर कृपा कर। तू हमारा स्वामी है, अतः यह नकारने वाले (जो हमारे शत्रु बनकर उठ खड़े हुए हैं), इनके विरुद्ध तू हमारी सहायता कर। 285-286

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[1] फ़िद्या: अर्थात किसी कार्य की पूर्ति में किया जाने वाला दूसरा कार्य जैसे उपवास छोड़ने के बदले यात्रियों तथा रोगग्रस्त व्यक्तियों का उपवास के स्थान पर निर्धन व्यक्तियों को भोजन कराना।

[2] ऐतिकाफ़: रमज़ान के महीने में मस्जिद में कुछ दिनों के लिए एकांत में बैठना।

[3] मस्जिद-ए-हराम: अर्थात प्रतिष्ठित मस्जिद। मक्का में स्थित इस्लाम की केन्द्रीय मस्जिद।

[4] पवित्र स्मारक

[5] प्रतिष्ठित घर, अर्थात मक्का की मस्जिद-ए-हराम।

[6] पवित्र आत्मा अर्थात जिबरील।

Faatiha

1- सूरह फ़ातिहा

आभार परमेश्वर ही के लिए है, समस्त लोकों का प्रभु, सर्वथा दया, जिसकी कृपा शाश्वत है, जो न्याय के दिन का स्वामी है। (1-3)

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