Religion, Philosophy and the Heart

इस्लाम का विस्तृत परिचय-भूमिका 2- सत्य धर्म | जावेद अहमद गामिदी

(जावेद अहमद गामिदी की पुस्तक ‘मीज़ान’ का एक अंश- मूल शीर्षक: “दीन-ए-हक़”)
अनुवाद तथा टीका: मुश्फ़िक़ सुल्तान

ध­र्म का सार यदि एक शब्द में बताया जाए तो क़ुरआन की परिभाषा में वह ईश्वर की “इबादत” है। समस्त लोकों का प्रभु इस दुनिया में अपने दास जनों से मूलतः जो चाहता है, वह यही है। परमेश्वर का वचन है:

وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ

“मैंने जिनों तथा मनुष्यों की रचना केवल इस लिए की है कि वे मेरी इबादत करें।“ (सूरह अज़्-ज़ारियात 51:56)

पवित्र क़ुरआन ने जगह-जगह बड़े विस्तार के साथ कहा है कि परमेश्वर ने अपने पैगंबर (दूत) मानवता को इसी वास्तविकता से अवगत करने के लिए भेजे थे:

وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولًا أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ 

“हमने प्रत्येक समुदाय में एक रसूल इस आह्वान के साथ भेजा था कि परमेश्वर की इबादत करो और तागूत से बचो।“
(सूरह अन्-नहल 16:36)

इस “इबादत” का अर्थ क्या है? यदि विचार करें तो यह सूरह नहल की इसी आयत से स्पष्ट है। परमेश्वर की इबादत के विपरीत यहाँ तागूत से बचने को कहा गया है। ‘अत्-तागूत’ और ‘अश्-शैतान’ क़ुरआन में समानार्थक प्रयुक्त हुए हैं, अर्थात जो परमेश्वर के सामने अवज्ञा, विद्रोह तथा अहंकार दिखाए। इसका विपरीतार्थक, स्पष्ट रूप से विनम्रता और विनय ही है। अतः “इबादत” के अर्थ भाषाविदों ने सामान्यतः इसी प्रकार बताए हैं कि: أصل العبودیۃ الخضوع والتذلل (इबादत वास्तव में विनम्रता तथा विनय है)[1]। यह गुण यदि प्रभु की दया, शक्ति, महानता और प्रज्ञता की उचित समझ के साथ उत्पन्न हो तो अपने आप को अपार प्रेम और असीम भय के साथ उसके समक्ष अत्यंत झुका देने का रूप धारण कर लेता है। खुशूअ, खुज़ूअ, इख्बात, इनाबत, ख़शीय्यत, तज़र्रु, क़ुनूत आदि, यह सारे शब्द क़ुरआन में इसी वास्तविकता के वर्णन के लिए प्रयुक्त हुए हैं। यह वास्तव में भीतर की दशा है जो एक मनुष्य के अंदर उत्पन्न होती और उसके पूरे अस्तित्व को घेर लेती है। ज़िक्र, शुक्र, तक्वा, इख्लास, तवक्कुल, तफ़्वीज़ और तस्लीम-ओ-रज़ा – यह सब परमेश्वर और उसके उपासकों के बीच इस संबंध के भीतरी रूप हैं। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति इस संबंध में अपने प्रभु का स्मरण करने से संतुष्टि प्राप्त करता, उसकी कृपाओं पर उसके लिए आभार के भाव को अपने अंदर एक सैलाब की तरह उमड़ते देखता, उसके क्रोध से डरता, उसी का हो जाता, उसके भरोसे पर जीता, अपना हर काम और अपना पूरा अस्तित्व उसे सौंप देता और उसके हर निर्णय पर संतुष्ट होता है। मनुष्य के बाहरी अस्तित्व में यह संबंध जिन रूपों में प्रकट होता है, उनके बारे में क़ुरआन का वर्णन है:

إِنَّمَا يُؤْمِنُ بِآيَاتِنَا الَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُوا بِهَا خَرُّوا سُجَّدًا وَسَبَّحُوا بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ. تَتَجَافَىٰ جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ خَوْفًا وَطَمَعًا وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ

“हमारी आयतों का तो वही लोग विश्वास करते हैं, (हे संदेशवाहक) कि उन्हें जब इनके माध्यम से याद दिलाया जाता है तो सजदे में गिर पड़ते हैं और अपने प्रभु की स्तुति के साथ उसका गुणगान करते हैं और वे कदापि अहंकार नहीं करते। उनके पहलू बिस्तरों से अलग रहते हैं। वह अपने प्रभु को भय और अभिलाषा के साथ पुकारते हैं और जो कुछ हमने उनको दिया है, उसमें से ख़र्च करते हैं।“ (अस्-सजदह 32:15-16)

यह रुकूअ और सुजूद, तसबीह और तहमीद, दुआ और मुनाजात, और ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए प्राण और धन का बलिदान- यही वास्तविक “इबादत” है। परंतु मनुष्य क्योंकि इस दुनिया में अपना एक व्यावहारिक अस्तित्व भी रखता है, इस कारण अपने इस आविर्भाव से आगे बढ़कर यह इबादत मनुष्य के उस व्यावहारिक अस्तित्व से जुड़ती तथा इस प्रकार उपासना के साथ आज्ञा-पालन को भी अपने अंदर समा लेती है। उस समय यह एक मनुष्य से चाहती है कि उसका अंतर्मन जिस सत्ता के सामने झुका हुआ है, उसका बाहरी रूप भी उसके सामने झुक जाए। उसने अपने आप को आंतरिक तौर पर जिसे सौंप दिया है, उसके बाहर में भी उसका आदेश लागू हो जाए, यहां तक कि उसके जीवन का कोई पहलू इससे अलग न रहे। अन्य शब्दों में यूं कहिए कि हर प्रकार से वह अपने प्रभु का भक्त बन जाए। क़ुरआन का वर्णन है:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا ارْكَعُوا وَاسْجُدُوا وَاعْبُدُوا رَبَّكُمْ وَافْعَلُوا الْخَيْرَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ

“हे मानने वालो, (इनका युग समाप्त हुआ, अब तुम्हारा युग प्रारंभ हो रहा है तो) रुकूअ-ओ-सुजूद करो और अपने प्रभु की भक्ति करो और भलाई के काम करो ताकि तुम सफलता पाओ।“ (सूरह अल्-हज 22:77)

परमेश्वर और उसके दास जनों के बीच उपास्य तथा उपासक के इस संबंध के लिए यह “इबादत” जब तात्विक और नैतिक आधार नियुक्त करती, विधि-संस्कार स्थापित करती और दुनिया में इस संबंध की आवश्यक बातों को पूरा करने के लिए सीमाएं निर्धारित करती है तो क़ुरआन की भाषा में उसे “दीन” कहा जाता है। इसका जो रूप परमेश्वर ने अपने पैगंबरों के माध्यम से मनुष्य को बताया है, क़ुरआन उसे “अद्-दीन” कहता है और उसके बारे में उन्हें दिशा-निर्देश करता है कि वे उसे ठीक प्रकार से और अपने जीवन में पूरी तरह बनाए रखें और उसमें कोई फूट पैदा न करें। सूरह ‘शूरा’ में है:

شَرَعَ لَكُم مِّنَ الدِّينِ مَا وَصَّىٰ بِهِ نُوحًا وَالَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ وَمَا وَصَّيْنَا بِهِ إِبْرَاهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَىٰ ۖ أَنْ أَقِيمُوا الدِّينَ وَلَا تَتَفَرَّقُوا فِيهِ 

“उसने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया है जिसका निर्देश उसने नूह को किया और जिसकी प्रेरणा, (हे संदेशवाहक), हमने तुम्हें की है और जिसका आदेश हमने इब्राहिम और मूसा और ईसा को दिया कि (अपने जीवन में) इस धर्म को स्थापित रखो[2] और इस में फूट पैदा न करो।“ (सूरह अश्-शूरा 42:13)

इस “इबादत” के लिए जो तात्विक तथा नैतिक आधार परमेश्वर के इस धर्म में बताए गए हैं, उन्हें क़ुरआन ‘अल्-हिक्मह’ और इसकी प्रथाओं तथा मर्यादाओं को ‘अल्-किताब’ अर्थात क़ानून (विधान) का नाम देता है:

وَأَنزَلَ اللَّهُ عَلَيْكَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَعَلَّمَكَ مَا لَمْ تَكُن تَعْلَمُ ۚ وَكَانَ فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكَ عَظِيمًا

“परमेश्वर ने तुम पर अपना विधान और अपनी हिक्मत उतारी है और इस प्रकार तुम्हें वह बात सिखाई है जो तुम नहीं जानते थे और परमेश्वर की तुम पर अत्यंत कृपा है।“ (सूरह अन्-निसा 4:113)

وَاذْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَمَا أَنزَلَ عَلَيْكُم مِّنَ الْكِتَابِ وَالْحِكْمَةِ يَعِظُكُم بِهِ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ

“और अपने ऊपर परमेश्वर की कृपा को याद रखो, और उस विधान और हिक्मत को याद रखो जो उसने तुम पर उतारी है, जिसका वह तुम्हें उपदेश करता है और परमेश्वर से डरते रहो और अच्छे से जान लो कि परमेश्वर हर बात से अवगत है।“ (अल्-बक़रह 2:231)

इस ‘अल्-किताब’ को वह “शरीअत” भी कहता है:

ثُمَّ جَعَلْنَاكَ عَلَىٰ شَرِيعَةٍ مِّنَ الْأَمْرِ فَاتَّبِعْهَا وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ

“इसके बाद, (हे संदेशवाहक), हमने तुमको अपने धर्म की एक स्पष्ट शरीअत पर स्थापित किया है तो अब तुम उसी का पालन करो और उन लोगों की कामनाओं के पीछे न चलो जिनके पास ज्ञान नहीं है।“ (अज्-जासियह 45:18)

‘अल्-हिक्मह” सदा से एक ही है, परंतु “शरीअत” मानव सभ्यता और संस्कृति में विकास तथा परिवर्तन के कारण काफ़ी अलग रही है। क़ुरआन का वर्णन है:

لِكُلٍّ جَعَلْنَا مِنكُمْ شِرْعَةً وَمِنْهَاجًا ۚ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً

“तुममें से हर एक के लिए हमने एक शरीअत, अर्थात एक कार्यनीति निर्धारित की है। परमेश्वर चाहता तो तुम्हें एक ही संप्रदाय बना देता।“ (सूरह अल्-माइदह 5:48)

परमेश्वर के द्वारा प्रेरित साहित्य का अध्ययन करने से विदित होता है कि तौरात में अधिकतर शरीअत और इंजील में हिक्मत का वर्णन हुआ है। ज़बूर इसी हिक्मत की प्रस्तावना में ईश्वर की स्तुति की ऋचाओं का संग्रह है और क़ुरआन इन दोनों (शरीअत और हिक्मत) के लिए एक व्यापक साहित्यिक रचना और इंज़ार-ओ-बशारत के ग्रंथ के रूप में उतरा है। सूरह बक़रह तथा निसा की जो आयतें ऊपर लिखी गई हैं, उनमें क़ुरआन के विषय में यह तथ्य अत्यंत स्पष्ट शब्दों में व्यक्त हुआ है। तौरात और इंजील के बारे में परमेश्वर ने श्री ईसा मसीह (अ.स.) के साथ क़यामत में अपने एक संवाद का उल्लेख करते हुए कहा है:

وَإِذْ عَلَّمْتُكَ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَالتَّوْرَاةَ وَالْإِنجِيلَ 

“और उस समय, जब मैंने तुम्हें क़ानून और हिक्मत सिखाई, अर्थात तौरात और इंजील की शिक्षा दी।“ (सूरह अल्-माइदह 5:110)

‘अल्-हिक्मह’ की परिभाषा जिन विषयों के लिए प्रयुक्त की गई है, वे मूल रूप से दो हैं:

एक मान्यताएँ;

दूसरी नैतिक शिक्षाएँ।

‘अल्-किताब’ के अंतर्गत जिन विषयों का वर्णन हुआ है, वे यह हैं:

  1. क़ानून-ए-इबादत (उपासना पद्धति के नियम) 2. क़ानून-ए-मुआशिरत (सामाजिक नियम) 3. क़ानून-ए-सियासत (राजनीतिक नियम) 4. क़ानून-ए-मईशत (आर्थिक नियम) 5. क़ानून-ए-दावत (धर्म प्रचार के नियम) 6. क़ानून-ए-जिहाद (जिहाद के नियम) 7. हुदूद-ओ-ताज़ीरात (दण्ड विधान) 8. खुर-ओ-नोश (खान-पान के नियम) 9. रुसूम-ओ-आदाब (प्रथाएँ और शिष्टाचार) 10. क़सम और कफ़्फ़ारा-ए-क़सम (शपथ और उसकी पूर्ति के नियम)

धर्म सारा यही है। ईश्वर के जो पैगंबर (संदेशवाहक) इस धर्म को लेकर आए, उन्हें “नबी” कहा जाता है। क़ुरआन से ज्ञात होता है कि उनमें से कुछ “नुबुव्वत” के साथ “रिसालत” के पद पर भी नियुक्त हुए थे।

“नुबुव्वत” यह है कि मनुष्यों में से कोई व्यक्ति परमेश्वर से वह्य (प्रेरणा/संदेश) पाकर लोगों को सत्य बताए और उसके मानने वालों को क़यामत में अच्छे परिणाम की शुभ सूचना दे और न मानने वालों को बुरे परिणाम से सचेत करे। क़ुरआन इसे “इंज़ार” और “बशारत” का नाम देता है:

كَانَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً فَبَعَثَ اللَّهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ

“लोग एक ही समूह थे। फिर (उनमें मतभेद पैदा हुआ तो) ईश्वर ने नबी भेजे, शुभ सूचना देते और सचेत करते हुए।“ (सूरह अल्-बक़रह 2:213)

“रिसालत” यह है कि नुबुव्वत के पद पर नियुक्त कोई व्यक्ति अपने लोगों के लिए इस प्रकार ईश्वर की अदालत बनकर आए कि उसके लोग यदि उसे नकार दें तो उनके विषय में ईश्वर का निर्णय इसी दुनिया में उन पर लागू करके वह सत्य की सत्ता उनपर स्थापित कर दे:

وَلِكُلِّ أُمَّةٍ رَّسُولٌ ۖ فَإِذَا جَاءَ رَسُولُهُمْ قُضِيَ بَيْنَهُم بِالْقِسْطِ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ

“(उसका नियम यही है कि) प्रत्येक जनसमूह के लिए एक रसूल है। फिर जब उनका रसूल आ जाता है तो उनका निर्णय न्यायपूर्वक कर दिया जाता है और उनपर कोई अत्याचार नहीं किया जाता। (सूरह यूनुस 10:47)

إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ أُولَٰئِكَ فِي الْأَذَلِّينَ .كَتَبَ اللَّهُ لَأَغْلِبَنَّ أَنَا وَرُسُلِي ۚ إِنَّ اللَّهَ قَوِيٌّ عَزِيزٌ

“(तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि) जो ईश्वर और उसके रसूल से शत्रुता करेंगे, वही सबसे अधिक अपमानित होने वालों में होंगे। इसलिए कि ईश्वर ने लिख दिया है कि मैं और मेरे रसूल विजयी होकर रहेंगे। सत्य यह है कि ईश्वर परम शक्ति वाला और पराक्रमी है।“ (सूरह अल्-मुजादिलह 58:20-21)

रिसालत का यही नियम है जिसके अनुसार विशेषतः श्री मुहम्मद (स) के बारे में क़ुरआन का वर्णन है:

هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَىٰ وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ

“वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्य धर्म के साथ भेजा है ताकि (इस भूभाग के) सभी धर्मों पर उसको विजयी कर दे, चाहे यह मुश्रिक इसे कितना ही अप्रिय समझें। (सूरह अस्-सफ़्फ़ 61:9)

इसकी प्रक्रिया यह होती है कि परमेश्वर इन रसूलों को अपनी दैनूनत[3] को प्रकट करने के लिए चुन लेता है और फिर क़यामत से पहले एक छोटी क़यामत उनके माध्यम से इसी दुनिया में स्थापित कर देता है। उन्हें बता दिया जाता है कि वे ईश्वर के साथ अपनी प्रतिज्ञा पर जमे रहेंगे तो अच्छा फल और इससे हट जाएंगे तो इसका दंड उन्हें दुनिया ही में मिल जाएगा। इसके परिणाम स्वरूप रसूलों का अस्तित्व लोगों के लिए ईश्वर का एक प्रतीक बन जाता है और वे ईश्वर को जैसे उनके साथ धरती पर चलते फिरते और निर्णय देते हुए देखते हैं। इसके साथ रसूलों को आदेश दिया जाता है कि सत्य के जिन चिह्नों का दर्शन उन्होंने स्वयं कर लिया है, उनके आधार पर सत्य का प्रचार करें और परमेश्वर का मार्गदर्शन यथार्थ रूप से और पूरी निश्चितता के साथ लोगों तक पहुंचा दें। क़ुरआन की परिभाषा में यह “शहादत”[4] है। यह जब स्थापित हो जाती है तो इस लोक तथा परलोक, दोनों में ईश्वर के निर्णय का आधार बन जाती है। अतः ईश्वर इन रसूलों को प्रभुत्व और विजय प्रदान करता है और उनके आह्वान को नकारने वालों पर अपना प्रचंड क्रोध उतार देता है। नबी (स) को पवित्र क़ुरआन में ‘शाहिद’ और ‘शहीद’ इसी आधार पर कहा गया है। क़ुरआन में है:

إِنَّا أَرْسَلْنَا إِلَيْكُمْ رَسُولًا شَاهِدًا عَلَيْكُمْ كَمَا أَرْسَلْنَا إِلَىٰ فِرْعَوْنَ رَسُولًا

“तुम्हारी ओर, (हे मक्का के कुरैश), हमने उसी प्रकार एक रसूल तूम पर साक्षी बनाकर भेजा है, जिस प्रकार हमने फ़िरऔन की ओर एक रसूल भेजा था।“ (सूरह अल्-मुज़म्मिल 73:15)

शहादत का यह पद रसूलों के अतिरिक्त श्री इब्राहीम (अ.स.) के वंशजों को भी प्रदान किया गया। क़ुरआन ने इसी के चलते उन्हें ईश्वर के रसूल और मानव मात्र के बीच एक समूह ‘उम्मतन्-वसतन्”[5] घोषित किया और बताया है कि इस पद के लिए वे उसी प्रकार चुने गए, जिस प्रकार परमेश्वर मनुष्यों में से कुछ परम आदरणीय व्यक्तियों का चयन नुबुव्वत तथा रिसालत के लि­­ए करता है। क़ुरआन का वर्णन है:

وَجَاهِدُوا فِي اللَّهِ حَقَّ جِهَادِهِ ۚ هُوَ اجْتَبَاكُمْ وَمَا جَعَلَ عَلَيْكُمْ فِي الدِّينِ مِنْ حَرَجٍ ۚ مِّلَّةَ أَبِيكُمْ إِبْرَاهِيمَ ۚ هُوَ سَمَّاكُمُ الْمُسْلِمِينَ مِن قَبْلُ وَفِي هَٰذَا لِيَكُونَ الرَّسُولُ شَهِيدًا عَلَيْكُمْ وَتَكُونُوا شُهَدَاءَ عَلَى النَّاسِ 

“और (इससे बढ़कर यह कि अपने पद के दायित्व को पूरा करने के लिए) परमेश्वर के मार्ग में संघर्ष करो, यथार्थ संघर्ष। उसने तुम्हें चुन लिया है और (जो) शरीअत (तुम्हें प्रदान की है, उस) में तुम पर कोई असहजता नहीं रखी है। तुम्हारे पिता —– इब्राहीम —– का धर्म तुम्हारे लिए अनुमोदित किया है। उसी ने तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा था, इससे पहले और इस क़ुरआन में भी (तुम्हारा नाम मुस्लिम है)। इसलिए चुन लिया है कि रसूल तुम पर (इस धर्म का) साक्षी हो, और दुनिया के सब लोगों पर तुम (इसके) साक्षी बनो।“ (सूरह अल्-हज 22:78)

नबियों और रसूलों के साथ परमेश्वर ने सामान्यतः अपने ग्रंथ भी उतारे हैं। उनके उतारने का उद्देश्य पवित्र क़ुरआन में यह बताया गया है कि सत्य-असत्य को जाँचने के लिए मापदंड बन जाएँ ताकि इनके माध्यम से लोग अपने मतभेदों का निपटारा कर सकें और इस प्रकार सत्य के विषय में न्यायसंगत स्थान पर खड़े हो जाएँ। क़ुरआन का वर्णन है:

وَأَنزَلَ مَعَهُمُ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ فِيمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ 

“और उनके साथ निर्णायक बात के रूप में अपना ग्रंथ उतारा ताकि लोगों के बीच वह उनके मतभेदों का निर्णय कर दे।“ (सूरह अल्-बक़रह 2:213)

وَأَنزَلْنَا مَعَهُمُ الْكِتَابَ وَالْمِيزَانَ لِيَقُومَ النَّاسُ بِالْقِسْطِ 

“और उनके साथ अपना ग्रंथ, अर्थात मापदंड उतारा है ताकि लोग (सत्य-असत्य के विषय में) न्यायसंगत स्थान पर खड़े हो जाएँ।“ (सूरह अल्-हदीद 57:25)

नुबुव्वत तथा रिसालत की यह श्रृंखला श्री आदम (अ.स.) से प्रारम्भ होकर श्री मुहम्मद (स) पर समाप्त हुई है। श्री मुहम्मद (स) का दुनिया से प्रस्थान करने के बाद वह्य-ओ-इल्हाम (ईश्वरीय वाणी तथा प्रेरणा) का द्वार सदा के लिए बंद हो गया है और नुबुव्वत समाप्त कर दी गई है[6]। अतः लोगों को धर्म पर जमे रखने के लिए “इंज़ार” का उत्तरदायित्व अब क़यामत तक मुस्लिम समुदाय के विद्वान निभाएँ गे। विद्वानों के इस दायित्व का वर्णन सूरह तौबह में इस प्रकार हुआ है:

وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُونَ لِيَنفِرُوا كَافَّةً ۚ فَلَوْلَا نَفَرَ مِن كُلِّ فِرْقَةٍ مِّنْهُمْ طَائِفَةٌ لِّيَتَفَقَّهُوا فِي الدِّينِ وَلِيُنذِرُوا قَوْمَهُمْ إِذَا رَجَعُوا إِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ

“यह असंभव था कि मुसलमान, सब के सब निकल खड़े होते, परंतु ऐसा क्यों न हुआ कि उनके प्रत्येक समूह में से कुछ लोग निकलते ताकि धर्म का गहरा ज्ञान प्राप्त करते और अपने समूह के लोगों को (उनके इस आचरण पर) सचेत करते, जब उनकी ओर लौटते, ताकि वे परमेश्वर की पकड़ से बचते।“ (सूरह तौबह 9:122)

इस इंज़ार के लिए ईश्वर का निर्देश यह है कि यह क़ुरआन के माध्यम से किया जाए। ‘فَذَكِّرْ بِالْقُرْآنِ مَن يَخَافُ وَعِيدِ’[7] और ‘جَاهِدْهُم بِهِ جِهَادًا كَبِيرًا’[8] के शब्दों में क़ुरआन ने इसी का आदेश दिया है। ईश्वर के संदेशवाहक श्री मुहम्मद (स) इसी आधार पर सम्पूर्ण विश्व के लिए नज़ीर (अर्थात सचेत-करता) हैं और विद्वान गण वस्तुतः उनके इसी इंज़ार को लोगों तक पहुँचते हैं: ‘تَبَارَكَ الَّذِي نَزَّلَ الْفُرْقَانَ عَلَىٰ عَبْدِهِ لِيَكُونَ لِلْعَالَمِينَ نَذِيرًا’[9]। अतः क़ुरआन का वर्णन है:

 وَأُوحِيَ إِلَيَّ هَٰذَا الْقُرْآنُ لِأُنذِرَكُم بِهِ وَمَن بَلَغَ 

“और मेरी ओर इस क़ुरआन की प्रेरणा इसलिए की गई है कि इसके माध्यम से मैं तुम्हें सचेत करूँ और उन्हें भी जिन्हें यह पहुंचे।“ (सूरह अल्-अन्आम 6:19)

इस धर्म का नाम “इस्लाम” है और इसके बारे में परमेश्वर ने अपने ग्रंथ में कहा है मानव मात्र से वह इस धर्म को छोड़ अन्य कोई धर्म कदापि स्वीकार नहीं करेगा:

إِنَّ الدِّينَ عِندَ اللَّهِ الْإِسْلَامُ … وَمَن يَبْتَغِ غَيْرَ الْإِسْلَامِ دِينًا فَلَن يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الْآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ

“परमेश्वर के समक्ष धर्म केवल इस्लाम है … और जो इस्लाम को छोड़ कोई अन्य धर्म अपनाना चाहेगा तो उससे वह कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा और क़यामत में वह दुर्भाग्यशाली व्यक्तियों में से होगा।“ (सूरह आल-ए-इमरान 3:19 और 3:85)

“इस्लाम” का शब्द जिस प्रकार पूरे धर्म के लिए प्रयुक्त होता है, इसी प्रकार धर्म के बाहरी रूप को भी कई बार इसी शब्द “इस्लाम” से व्यक्त किया जाता है। अपने इस बाहरी रूप के अनुसार इस्लाम पाँच चीजों का नाम है:

  1. इस बात का साक्षी रहा जाए कि ईश्वर को छोड़ कोई इलाह, अर्थात उपासना योग्य, नहीं और श्री मुहम्मद (स) उसके रसूल हैं।
  2. नमाज़ की स्थापना की जाए।
  3. ज़कात का भुगतान किया जाए।
  4. रमज़ान के महीने का उपवास रखा जाए।
  5. बैत-उल-हराम, अर्थात मक्का के पवित्र गृह, का हज किया जाए।

पवित्र क़ुरआन ने अनेक स्थानों पर इन चीज़ों पर बल दिया है। श्री मुहम्मद (स) के एक वचन में एक ही स्थान पर इनका वर्णन इस प्रकार हुआ है:

الإسلام أن تشھد أن لا إلٰہ إلا اللّٰہ وأن محمدًا رسول اللّٰہ، وتقیم الصلٰوۃ، وتؤتي الزکٰوۃ، وتصوم رمضان، و تحج البیت.

“इस्लाम यह है कि तुम इस बात के साक्षी रहो कि परमेश्वर के सिवा कोई उपासना योग्य नहीं और श्री मुहम्मद (स) उसके रसूल हैं और नमाज़ स्थापित करो और ज़कात का भुगतान करो और रमज़ान का उपवास रखो और बैत-उल-हराम का हज् करो। “ (मुस्लिम, हदीस 93)

धर्म का मूल तत्त्व ‘ईमान’ है। इसका जो विस्तारपूर्वक वर्णन क़ुरआन में हुआ है, उसके अनुसार यह भी पाँच चीज़ों का नाम है:

  1. परमेश्वर पर ईमान, अर्थात परमेश्वर को मानना।
  2. फ़रिश्तों पर ईमान।
  3. नबियों, अर्थात संदेशवाहकों पर ईमान।
  4. किताबों, अर्थात ईश्वरीय ग्रन्थों पर ईमान।
  5. रोज़-ए-जज़ा, अर्थात प्रतिफल या न्याय के दिन पर ईमान।

सूरह बक़रह में है:

آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِ وَالْمُؤْمِنُونَ ۚ كُلٌّ آمَنَ بِاللَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّن رُّسُلِهِ ۚ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۖ غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ

“हमारे संदेशवाहक ने तो उस चीज़ को मान लिया जो उसके प्रभु की ओर से उसपर उतारी गई है, और उसके मानने वालों ने भी। इन सब ने परमेश्वर को मान लिया और उसके फ़रिश्तों और उसके ग्रन्थों को और उसके संदेशवाहकों को मान लिया। (यह स्वीकार करते हैं कि) हम परमेश्वर के संदेशवाहकों में से किसी के बीच कोई भेद नहीं करते और उन्होंने कह दिया है कि हमने सुना और आज्ञाकारी हो गए। प्रभु, हम तुझसे क्षमा चाहते हैं और (जानते हैं कि) हमें लौटकर तेरी ही क्षरण में पहुँचना है। (सूरह बक़रह 2:285)

श्री मुहम्मद (स) ने परमेश्वर को मानने का एक उपसिद्धांत – तक़दीर (भाग्य) के अच्छे और बुरे – को इनमें डालकर के इनका वर्णन इस प्रकार किया है:

الإیمان أن تؤمن باللّٰہ، وملٰئکتہ، وکتبہ، ورسلہ، والیوم الاٰخر، و تؤمن بالقدر خیرہ وشرہ.

“ईमान यह है कि तुम परमेश्वर को मानो और उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों और उसके संदेशवाहकों को मानो, और आखिरत के दिन को मानो, और अपने प्रभु कि ओर से अच्छे और बुरे भाग्य को भी।“ (मुस्लिम, हदीस 93)

यह ईमान जब अपने यथार्थ रूप से दिल में उतरता और उससे अपनी पुष्टि प्राप्त कर लेता है तो अपने अस्तित्व ही से दो बातों को चाहता है:

एक अमल-ए-सालिह

दूसरे ‘तवासी बिल् हक़’ और ‘तवासी बिस् सब्र’।

क़ुरआन का वर्णन है:

وَالْعَصْرِ. إِنَّ الْإِنسَانَ لَفِي خُسْرٍ. إِلَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَتَوَاصَوْا بِالْحَقِّ وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ

“समय साक्षी है, यह मनुष्य घाटे में पड़कर रहेंगे। हाँ, परंतु वे नहीं जिन्होंने माना और भले कर्म किए, और एक दूसरे को सत्य का उपदेश किया और सत्य पर दृढ़ता पूर्वक जमे रहने का उपदेश किया।“ (सूरह अल्-अस्र 103:1-3)

“अमल-ए-सालिह” से तात्पर्य है हर वह कर्म जो नैतिक शुद्धि के परिणाम स्वरूप पैदा होता है। इसके सारे आधार बुद्धि और मानव प्रकृति में प्रमाणित हैं और परमेश्वर की शरीअत (विधान) इसी कर्म की ओर मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए उतरी है।  

‘तवासी बिल् हक़’ और ‘तवासी बिस् सब्र’ के अर्थ हैं अपने अड़ोस-पड़ोस में एक दूसरे को सत्य तथा सत्य पर दृढ़ता पूर्वक जमे रहने का उपदेश। यह सत्य को मानने का स्वाभाविक परिणाम है जिसे क़ुरआन ने “अम्र बिल् मारूफ़” और “नही अन् अल्-मुंकर” का नाम दिया है, अर्थात वह बातें जो बुद्धि और मानव प्रकृति के अनुसार भली हैं, उनका उपदेश अपने निकटतम माहौल में लोगों को किया जाए और जो बुरी हैं, उनसे लोगों को रोका जाए:

وَالْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ يَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ

“मोमिन पुरुष और मोमिन स्त्रियाँ, वे भी एक दूसरे के सहायक हैं। (इन कपटी लोगों के विपरीत) वे भलाई का उपदेश करते और बुराई से रोकते हैं।“ (सूरह अत्-तौबा 9:71)

ईमान की यह मांग प्रत्येक मुसलमान को मानव मात्र की शुभचिंता और मंगलकामना के भाव से पूरी करनी चाहिए। धर्म के उचित सार के साथ यह दायित्व इस भाव के बिना किसी रूप में पूरा नहीं किया जा सकता।  श्री मुहम्मद (स) का वाक्य है:

الدین النصیحۃ، للّٰہ، ولکتابہ، ولرسولہ، ولأئمۃ المسلمین وعامتھم.

“धर्म सर्वतः मंगलकामना है। परमेश्वर के लिए, उसके ग्रंथ के लिए, उसके रसूल के लिए, मुसलमानों के शासकों के लिए और उनकी आम जनता के लिए।“ (मुस्लिम, हदीस 196)

सामान्य परिस्थिति में ईमान हमसे यही कुछ चाहता है, परंतु मनुष्य को दुनिया में जिन अन्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, उन्हें देखते हुए इनको छोड़ तीन अन्य अपेक्षाएँ भी इससे पैदा होती हैं:

एक हिजरत, अर्थात प्रवास;

दूसरी नुस्रत, अर्थात सहायता;

तीसरी क़ियाम बिल् क़िस्त, अर्थात न्याय के साथ खड़े होना।

एक मोमिन के लिए यदि किसी जगह अपने प्रभु की उपासना पर खड़े रहना जान जोखिम का काम बन जाए, उसे धर्म के कारण सताया जाए, यहाँ तक कि अपने इस्लाम को दिखाना ही उसके लिए संभव न रहे तो उसका यह ईमान उससे चाहता है कि उस जगह को छोड़कर किसी ऐसे स्थान की ओर चला जाए जहां वह उद्घोषित रूप से अपने धर्म का पालन कर सके। क़ुरआन इसे “हिजरत” कहता है। श्री मुहम्मद (स) के समय में जब स्वयं परमेश्वर और उसके रसूल की ओर से हिजरत का आह्वान किया गया तो इससे मुंह मोड़ने वालों को क़ुरआन ने नरक की धमकी सुनाई है। सूरह निसा में है:

إِنَّ الَّذِينَ تَوَفَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ ظَالِمِي أَنفُسِهِمْ قَالُوا فِيمَ كُنتُمْ ۖ قَالُوا كُنَّا مُسْتَضْعَفِينَ فِي الْأَرْضِ ۚ قَالُوا أَلَمْ تَكُنْ أَرْضُ اللَّهِ وَاسِعَةً فَتُهَاجِرُوا فِيهَا ۚ فَأُولَٰئِكَ مَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ ۖ وَسَاءَتْ مَصِيرًا

“(इस अवसर पर भी जो लोग उन बस्तियों से निकलने के लिए तत्पर नहीं हैं, जहां उन्हें धर्म के कारण सताया जा रहा है, उन्हें बताओ, हे संदेशवाहक कि) जिन लोगों के प्राण फ़रिश्ते इस दशा में ग्रहण करेंगे कि (अपने ईमान को खतरे में डालकर) वे अपने आप पर अत्याचार कर रहे थे, उनसे वे पूछेंगे कि तुम किस स्थिति में पड़े रहे? वे उत्तर देंगे कि हम तो इस राज्य में पूर्णतः विवश थे। फ़रिश्ते कहेंगे: क्या परमेश्वर की धरती इतनी फैली हुई नहीं थी कि तुम उसमें हिजरत [प्रस्थान] कर जाते। अतः यही लोग हैं जिनका ठिकाना नरक है और वह क्या ही बुरा ठिकाना है।“ (सूरह अन्-निसा 4:97)

इसी प्रकार धर्म के प्रचार-प्रसार या रक्षा के लिए यदि किसी कार्यवाही की आवश्यकता पड़ जाए तो ईमान की मांग है कि प्राण और संपत्ति से धर्म की सहायता की जाए। क़ुरआन की परिभाषा के अनुसार यह जगत के परमेश्वर की “नुस्रत” है। श्री मुहम्मद (स) को जब मदीने में सत्ता प्राप्त हो जाने के बाद जब इसकी आवश्यकता पड़ी और लोगों से जिहाद और क़िताल की अपेक्षा की गई तो क़ुरआन ने एक समय पर लोगों को  इसका आह्वान इस प्रकार किया:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰ تِجَارَةٍ تُنجِيكُم مِّنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ. تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَتُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ بِأَمْوَالِكُمْ وَأَنفُسِكُمْ ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ. يَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَيُدْخِلْكُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ وَمَسَاكِنَ طَيِّبَةً فِي جَنَّاتِ عَدْنٍ ۚ ذَٰلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ. وَأُخْرَىٰ تُحِبُّونَهَا ۖ نَصْرٌ مِّنَ اللَّهِ وَفَتْحٌ قَرِيبٌ ۗ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِينَ. يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا أَنصَارَ اللَّهِ كَمَا قَالَ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ لِلْحَوَارِيِّينَ مَنْ أَنصَارِي إِلَى اللَّهِ ۖ قَالَ الْحَوَارِيُّونَ نَحْنُ أَنصَارُ اللَّهِ ۖ فَآمَنَت طَّائِفَةٌ مِّن بَنِي إِسْرَائِيلَ وَكَفَرَت طَّائِفَةٌ ۖ فَأَيَّدْنَا الَّذِينَ آمَنُوا عَلَىٰ عَدُوِّهِمْ فَأَصْبَحُوا ظَاهِرِينَ

“ईमान वालो, मैं तुमको वह व्यापार बताऊँ जो तुम्हें कष्टदायक यातना से मुक्ति दे? (यहूदियों ने जो व्यवहार अपनाया है, उसके विपरीत), तुम परमेश्वर और उसके रसूल को मान जाओगे, यथार्थ रूप से मान जाओगे, और अपने प्राण तथा संपत्ति से परमेश्वर के मार्ग में जिहाद करोगे। यह तुम्हारे लिए उचित है, यदि तुम समझो। इसके फलस्वरूप परमेश्वर तुम्हारे पाप क्षमा करेगा और तुम्हें ऐसी वाटिकाओं में प्रविष्ट करेगा जिनके नीचे धाराएँ बह रही होंगी और उत्तम घर प्रदान करेगा जो स्थायी वाटिकाओं में होंगे। यही महान सफलता है। और एक दूसरी चीज़ भी प्रदान करेगा जो तुम चाहते हो, अर्थात परमेश्वर की सहायता और विजय जो शीघ्र ही प्राप्त हो जाएगी। ईमान वालों को यह शुभ सूचना दो, (हे संदेशवाहक)। ईमान वालो, परमेश्वर के सहायक बनो, जिस प्रकार मर्यम के पुत्र ईसा ने हवारियों से कहा था: कौन परमेश्वर के मार्ग में मेरा सहायक बनता है? हवारियों ने उत्तर दिया: हम परमेश्वर के सहायक हैं।“ (सूरह अस्-सफ़्फ़ 61:10-14)

पुराने तथा नए युग में धर्म की रक्षा, उसके जीवित रहने और पुनरुत्थान के जितने भी कार्य हुए हैं, ईमान की इसी मांग की पूर्ति के लिए हुए हैं। मुस्लिम समाज के इतिहास में वाणी या लेखन से, धन से और युद्ध से धर्म के लिए हर संघर्ष का स्रोत यही “नुस्रत” है। क़ुरआन यह चाहता है कि ईमान की यह मांग यदि किसी समय सामने आ जाए तो एक सच्चे मोमिन को दुनिया की कोई वस्तु भी इससे प्रिय नहीं होनी चाहिए। अतः श्री मुहम्मद (स) के प्रचार-प्रसार के कार्य में जब यह चरण आया तो क़ुरआन ने कहा:

قُلْ إِن كَانَ آبَاؤُكُمْ وَأَبْنَاؤُكُمْ وَإِخْوَانُكُمْ وَأَزْوَاجُكُمْ وَعَشِيرَتُكُمْ وَأَمْوَالٌ اقْتَرَفْتُمُوهَا وَتِجَارَةٌ تَخْشَوْنَ كَسَادَهَا وَمَسَاكِنُ تَرْضَوْنَهَا أَحَبَّ إِلَيْكُم مِّنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ وَجِهَادٍ فِي سَبِيلِهِ فَتَرَبَّصُوا حَتَّىٰ يَأْتِيَ اللَّهُ بِأَمْرِهِ ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ

 “इनसे कह दो, (हे संदेशवाहक) कि तुम्हारे पिता और तुम्हारे पुत्र; तुम्हारे भाई, तुम्हारी पत्नियाँ, तुम्हारा परिवार और तुम्हारा वह धन जो तुमने कमाया है और वह व्यापार जिसके मंदा पड़ने से तुम डरते हो और तुम्हारे वह घर जिनसे तुम प्रेम करते हो, यह सब तुम्हें परमेश्वर से, उसके रसूल से और उसके मार्ग में जिहाद से अधिक प्यारे हैं तो प्रतीक्षा करो, यहाँ तक कि परमेश्वर अपना निर्णय घोषित कर दे। और (जान लो कि) इस प्रकार के वचन भंजक लोगों का परमेश्वर मार्गदर्शन नहीं करेगा। (सूरह अत्-तौबह 9: 24)

फिर दुनिया के या धर्म के किसी विषय में यदि मनुष्य की भावनाएँ, उसके पूर्वाग्रह, उसके स्वार्थ और उसकी चाहतें उसे न्याय के मार्ग से हटा देना चाहें तो यही ईमान मांग करता है कि मोमिन न केवल सत्य और न्याय पर खड़ा रहे, अपितु यदि इनकी गवाही देनी पड़ जाए तो जान जोखिम में डालकर यह कार्य पूरा करे। सत्य कहे, और सत्य के सामने झुक जाए। न्याय करे, और न्याय का साक्षी बने और अपनी मान्यता तथा कर्मों में सत्य और न्याय को छोड़ कुछ भी न अपनाएं। यह “कियाम बिल-क़िस्त” है और पवित्र क़ुरआन में इसका आदेश इस प्रकार हुआ है:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ بِالْقِسْطِ شُهَدَاءَ لِلَّهِ وَلَوْ عَلَىٰ أَنفُسِكُمْ أَوِ الْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ ۚ إِن يَكُنْ غَنِيًّا أَوْ فَقِيرًا فَاللَّهُ أَوْلَىٰ بِهِمَا ۖ فَلَا تَتَّبِعُوا الْهَوَىٰ أَن تَعْدِلُوا ۚ وَإِن تَلْوُوا أَوْ تُعْرِضُوا فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا

“इमान वालो, न्याय पर खड़े रहो, परमेश्वर के लिए उसके साक्षी रहते हुए, यद्यपि यह साक्षी रहना स्वयं तुम्हारे अस्तित्व, तुम्हारे माता-पिता और तुम्हारे रिश्तेदारों के विरुद्ध ही हो जाए। धनी हो या निर्धन, परमेश्वर ही दोनों का अधिक अधिकारी है (कि उसके नियम का पालन किया जाए)। इसलिए (परमेश्वर के निर्देश को छोड़कर) तुम इच्छाओं का अनुसरण न करो कि इसके परिणाम स्वरूप सत्य से हट जाओ और (याद रखो कि) यदि (सत्य और न्याय की बात को) बिगाड़ने या (उससे) भागने का प्रयास करोगे तो उसका दंड अवश्य पाओगे, इसलिए कि जो कुछ तुम करते हो, परमेश्वर उससे अच्छी तरह अवगत है।“ (सूरह अन्-निसा 4: 135)

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ ۖ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ

“ईमान वालो, (इस प्रतिज्ञा और वचन की मांग है कि) परमेश्वर के लिए खड़े हो जाओ, न्याय के साक्षी रहते हुए और किसी समाज की शत्रुता भी तुम्हें इसपर न उभारे कि न्याय से फिर जाओ। न्याय करो, यही धर्मपरायणता से अधिक निकट है और परमेश्वर से डरते रहो, इसलिए कि परमेश्वर तुम्हारे प्रत्येक कार्य से अवगत है।“ (सूरह अल्-माइदह 5:8)

इस धर्म के उद्देश्य का जो वर्णन क़ुरआन में हुआ है, वह क़ुरआन की परिभाषा में “तज़्कियह” है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य के व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन को प्रदूषण से शुद्ध करके उसके विचारों तथा कर्मों को उचित दिशा में विकसित किया जाए। पवित्र क़ुरआन में इस बात का वर्णन अनेक स्थानों में हुआ है कि मनुष्य का लक्ष्य सर्वश्रेष्ठ स्वर्ग और ‘रज़ियतम् मर्ज़ीय्यह” का राज्य है और उन्नति तथा सफलता के इस स्थान तक पहुँचना उन्हीं लोगों के लिए सुनिश्चित है जो इस दुनिया में अपना शुद्धिकरण कर लें:

ثُمَّ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ. قَدْ أَفْلَحَ مَن تَزَكَّىٰ. وَذَكَرَ اسْمَ رَبِّهِ فَصَلَّىٰ. بَلْ تُؤْثِرُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا. وَالْآخِرَةُ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ

“अपितु सफलता पा गया वह जिसने शुद्धता को अपनाया और इसके लिए अपने प्रभु के नाम का स्मरण किया, फिर नमाज़ पढ़ी। (लोगो, तुम कोई ठोस प्रमाण नहीं पाते), अपितु दुनिया के इस जीवन को प्राथमिकता देते हो, यद्यपि परलोक उससे अच्छा भी है और स्थायी भी।“  (सूरह अल्-आला 87:13-17)

अतः धर्म में लक्ष्य तथा उद्देश्य का स्थान केवल तज़्कियह को प्राप्त है। परमेश्वर के नबी इसी उद्देश्य के लिए उठाए गए और धर्म सर्वतः इसी उद्देश्य को पाने और इसी लक्ष्य तक पहुँचने में मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए उतरा है। क़ुरआन का वर्णन है:

هُوَ الَّذِي بَعَثَ فِي الْأُمِّيِّينَ رَسُولًا مِّنْهُمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِهِ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَإِن كَانُوا مِن قَبْلُ لَفِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ

“उसी ने उम्मियों, अर्थात इस्माईल-पुत्रों, के अंदर एक रसूल उन्हीं में से उठाया जो उसकी आयतें उन्हें सुनाता और उनका शुद्धिकरण करता है और इसके लिए उन्हें विधान और हिकमत की शिक्षा देता है।“ (सूरह अल्-जुमुअह 62:2)

इस धर्म का पालन करने के लिए जो आचरण इसके मानने वालों को अपनाना चाहिए वह “एहसान” है। एहसान का अर्थ है किसी कार्य को उसके सर्वोत्तम ढंग से करना। धर्म में जब कोई कर्म इस प्रकार किया जाए कि उसका रूप और आत्मा, दोनों पूरे संतुलन के साथ समक्ष हों, उसकी हर भावना सम्पूर्ण रूप से ध्यान में रहे और इस अवस्था में एक व्यक्ति अपने आप को परमेश्वर के सामने उपस्थित समझे तो इसे “एहसान” कहा जाता है। परमेश्वर का वचन है:

وَمَنْ أَحْسَنُ دِينًا مِّمَّنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ وَاتَّبَعَ مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا ۗ

“(ईमान वालों को छोड़ यह कपटी लोग मुश्रिकों को प्राथमिकता देते हैं) और (नहीं समझते कि) उस व्यक्ति से अच्छा किसका धर्म हो सकता है जो अपने आप को परमेश्वर को सौंप दे और अच्छे प्रकार से कर्म करने वाला हो और इब्राहीम के मार्ग का अनुसरण करे जो पूर्णतः एकाग्र था।“ (सूरह अन्-निसा 4: 125)

 श्री मुहम्मद (स) ने अपनी व्यापक शैली में इसकी व्याख्या इस प्रकार की है:

الإحسان أن تعبد اللّٰہ کأنک تراہ ، فإن لم تکن تراہ فإنہ یراک.

“एहसान” यह है कि तुम परमेश्वर की इबादत इस प्रकार करो जैसे उसे देख रहे हो, इसलिए कि यदि तुम उसे नहीं देख रहे तो वह तो तुम्हें देख रहा है।“ (मुस्लिम, हदीस 93)


टिप्पणियाँ

[1]  लिसान-उल्-अरब 9/10

[2] अर्थात किस भी स्थिति में इस पर कायम [जमे] रहो। इक़ामत-ए-दीन का उचित अर्थ यही है। विस्तार के लिए देखिए, हमारी पुस्तक “बुरहान” में लेख: “तावील की ग़लती” [अर्थात व्याख्या का दोष]

इस लेख में श्री जावेद अहमद गामिदी ने मौलाना मौदूदी और अन्य मुस्लिम विचारकों की इस धारणा का खंडन किया है कि ‘इक़ामत-ए-दीन’ का अर्थ सम्पूर्ण इस्लामी व्यवस्था की स्थापना करना, उसे लागू करना है।

[3] दैनूनत: ईश्वर के न्याय और प्रतिफल व्यवस्था का प्रकट होना

[4] शहादत: अर्थात गवाह (साक्षी) रहना या गवाही देना

[5] सूरह बक़रह 2:143

[6] सूरह अल्-अहज़ाब 33:40

[7] सूरह क़ाफ़ 50:45 – “इसलिए कुरआन के माध्यम से उन्हें सचेत करो जो मेरी चेतावनी से डरते हों।“

[8] सूरह अल्-फुर्क़ान 25:52 – “इसी (क़ुरआन) के माध्यम से इनके साथ परम जिहाद [संघर्ष] करते रहो।“ 

[9] सूरह अल्-फुर्क़ान 25:1 – “परम पूज्य, परम उपकारी है वह जिसने अपने दास पर यह मापदंड उतारा है, ताकि वह जगत वासियों के लिए सचेत करने वाला हो।

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