क़ुरआन का परिचय- (जावेद अहमद गामिदी के विचारों पर आधारित)

डॉ. शहज़ाद सलीम
अनुवाद: मुश्फ़िक़ सुल्तान

क़ुरआन एक अनोखी पुस्तक है। यह परमेश्वर का मानवता के लिए अंतिम निर्देश है। इससे पहले समय-समय पर उसने बहुत से पैगंबरों का‌ मार्गदर्शन किया। पुराने विधान (Old Testament) और नए विधान (New Testament) के बाद यह परमेश्वर का अंतिम विधान (Last Testament) है जिसको उसने लोगों के मार्गदर्शन हेतु अवतरित किया है। क़ुरआन उसी दीन (धर्म) की शिक्षा देता है जो इससे पहले पूर्व कालीन नबियों और रसूलों ने पेश किया। लेकिन पिछले ईश्वरीय ग्रंथों के विपरीत यह अपनी मूल भाषा और रूप में हमारे पास सुरक्षित है।

इसकी विधा अथवा शैली उन पुस्तकों से बिल्कुल अलग है जिनसे हम परिचित और आकृष्ट हैं। इसलिए इसके पढ़ने वाले हर विद्यार्थी के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वह इसकी शैली की समझ रखता हो। यदि इस समझ के साथ इस पुस्तक की विषय वस्तु और इसके क्रम बंधन की भी जानकारी रखी जाए तो पाठक इस पुस्तक को उचित रूप से समझ सकता है। वह इसको पढ़कर परम आनंदित होगा और यह पुस्तक उसके विवेक को आकर्षित करेगी। वह परमेश्वर के अटल नियमों और कार्यों का साक्षी बन जाएगा और उसे ऐसा अनुभव होगा कि मानो वह परमेश्वर के साथ साक्षात बात कर रहा हो। यद्यपि वह परमेश्वर को नहीं देख सकता परंतु उसका अनुभव कर पाएगा क्योंकि वह ईश्वरीय भाषा शैली और बातचीत के ढंग की समझ रखता होगा।

क़ुरआन की विधा (Genre)

क़ुरआन एक अद्वितीय साहित्यिक कृति है जिसके समान मानव साहित्य में कुछ भी नहीं पाया जाता। इस ग्रंथ की विधा को लेखन और भाषा शैली के वर्तमान मापदंडों पर देखना एक मुश्किल काम है। फिर भी इसकी तुलना सबसे अधिक उपदेशकों की रचना से की जा सकती है। यह ग्रंथ संवाद (डायलॉग्स) पर आधारित है जो वास्तविक पात्रों के बीच हुआ जो सातवीं सदी में अरब के स्टेज पर प्रकट हुए। यह पात्र एक विशेष प्रकरण में आपस में बातें करते दिखाई देते हैं। जैसे किसी नाटक के अंक अथवा दशाएं बदलते रहते हैं, ठीक वैसे ही इस ग्रंथ में यह पहलू हमें जगह-जगह दिखाई देगा। परमेश्वर स्वयं इस संवाद के रचयिता हैं। शब्द ‘قال’ (क़ाल अर्थात कहना) और उसके दूसरे रूपों का क़ुरआन में अनेक स्थानों पर प्रयोग इस संवाद शैली का पता देते हैं। यही मामला संबोधन के विभिन्न रूपों और शैलियों का है। बहुत से स्थानों पर वाचक और संबोधक का निर्धारण बात के अवसर अथवा प्रसंग से किया जाता है, क्योंकि इन स्थानों पर ‘क़ाल’ या उसकी तरह के अन्य शब्द अनुपस्थित होते हैं।

केवल बात समझाने के लिए मानव कृतियों मैं इसकी बहुत ही साधारण समानता ‘अफ़लातून के संवादों’ (डायलॉग्स ऑफ प्लेटो), दांते की ‘डिवाइन कॉमेडी’ और अल्लामा इक़बाल के ‘जावेद नामा’ से की जा सकती है। इन किताबों में भी संवाद की शैली अपनाई गई है।

यह बात यहां स्पष्ट रहे कि क़ुरआन में संवाद अल्लाह (परमेश्वर) और अन्य पात्रों के बीच हुआ है और इन पात्रों में आपस में भी संवाद हुआ है। यह पात्र कुछ इस तरह हैं:

१. जिब्रील (फ़रिश्ता)
२. पैगंबर (परमेश्वर के दूत)
३. शैतान
४. अहल-ए-ईमान (ईमान वाले अर्थात पैगंबरों को मानने वाले)
५. मुनाफ़िक़ीन (कपटी लोग)
६. मुश्रिकीन (अनेक देवी देवताओं की उपासना करने वाले अरबवासी)
७. अहल-ए-किताब (क़ुरआन से पूर्व ईश्वरीय ग्रंथों और पैगंबरों को मानने वाले अर्थात यहूदी और ईसाई)

सातवीं सदी में अरब के इन पात्रों की आपस में एक नियमित बातचीत को क़ुरआन में परमेश्वर के शब्दों में जगह-जगह देखा जा सकता है। कभी कोई एक पात्र बात करता है और किसी एक या एक से अधिक पात्रों को संबोधित करता है। यह पात्र आपस में बातचीत करते हैं और चर्चा एक से दूसरे की ओर पलटती रहती है। अगर बातचीत के इस पलटने को गहराई से समझा जाए तो क़ुरआन की ऊपर से प्रतीत होती असंबद्धता बहुत सार्थक दिखाई देने लगती है, क्योंकि अपने मूल में यह एक संवाद है जिसमें वाचक और उसके संबोधित पात्रों मैं परिवर्तन होता रहता है।
कई बार जिन पात्रों को संबोधित किया जाता है वे एक से अधिक होते हैं। इसी तरह कुछ अवसरों पर किसी विशेष व्यक्ति अथवा समूह को सामने रखकर एक नियमित भाषण देना अभिप्राय होता है। किसी मौक़े पर भाषण सब के लिए होता है और किसी विशेष समूह की ओर इशारा करना उद्देश्य नहीं होता। इसी तरह संबोधन कभी परोक्ष रूप से होता है और कभी ऊपरी तौर पर किसी एक समूह की तरफ, लेकिन बात किसी और से हो रही होती है। कभी मन में रखे किसी विचार को शब्दों में व्यक्त किया जाता है। उत्तम साहित्य के जानकार इन सूक्ष्म बिंदुओं को अच्छी तरह समझ सकते हैं।

संबोधन में परिवर्तन प्रवक्ता की दशा का भी पता देता है। इससे मालूम हो जाता है की बात गुस्से से कही गई है या प्यार से। इसमें प्रेम की मिठास है या कृपा की चाशनी। कई बार बात को किसी निर्णायक परिणाम तक पहुंचाए बिना ही अचानक समाप्त कर दिया जाता है। बात के उन भागों को छोड़ दिया जाता है, जिन का लक्षण स्पष्ट हो। कई बार वाचक का पता बात के आगे बढ़ने पर लग जाता है।

तो क़ुरआन के वचन इस तरह प्रतिभावान हैं कि वह मन और दृष्टि दोनों को उत्साहित करते हैं। पाठक क़ुरआन की आयतों के गहरे तर्कों से मोहित हो जाता है। इन प्रबल तर्कों का प्रभाव उसके जीवन पर भी होता है। उसे बोध हो जाता है कि स्वीकार और तिरस्कार की इस यात्रा में असाधारण परिणाम सामने आ सकते हैं। कहीं-कहीं पर यह तर्क बहुत स्पष्ट होता है और कहीं पर शपथ के रूप में बहुत सूक्ष्मता से सामने रखा जाता है। यदि पाठक साहित्य के विभिन्न अलंकारों का ज्ञान रखता हो तो वचन के वास्तविक अर्थ तक वह बड़ी आसानी से पहुंच जाता है। विशेषतः अगर वह ‘अलिफ़-लाम’ (निश्चयवाचक उपपद) के विभिन्न अर्थ और उसके प्रयोगों को जानता हो, तो उसे मालूम होता है कि कई बार एक बात सामान्य अर्थ न प्रकट कर किसी विशेष अर्थ को प्रकट करती है और कभी-कभी बात में कुछ अंतर्निहित तथ्य होते हैं।

इसलिए यह बात बेझिझक कही जा सकती है कि क़ुरआन की वास्तविक समझ प्राप्त करने के लिए उसके संवाद की शैली और स्वरूप से परिचित होना अत्यंत आवश्यक है।

क़ुरआन के इस विशेष स्वरूप के कुछ परिणाम हैं जो पाठक के सामने रहने चाहिए:

  1. हर सूरह में उस व्यक्ति या वर्ग को निश्चित करना आवश्यक है जिसे प्राथमिक रूप से संबोधित किया गया हो। एक सूरह के अंदर कई बार कोई और व्यक्ति या वर्ग भी संबोधित होता है जिसको निश्चित करना इसी प्रकार अनिवार्य है। यही बदलाव वाचकों में भी हो सकता है।
  2. वाचक और संबोधित व्यक्ति अथवा वर्ग में बदलाव पर ध्यान देना आवश्यक है। कई बार यह बदलाव बहुत सूक्ष्म और कई स्थानों पर बहुत ही स्पष्ट होता है। इसी बदलाव के कारण बातों में जो ऊपर-ऊपर से संबंधहीनता प्रतीत होती है, उसकी सार्थकता को समझा जा सकता है।
  3. वह पात्र जो सातवीं सदी में अरब में मौजूद नहीं थे, उनकी चर्चा क़ुरआन में हो ही नहीं सकती, इस ग्रंथ में उन्हीं पात्रों की बात है जिनके बीच पैगंबर के ज़माने में वार्तालाप हुई या किसी पहलू से उनकी बात छिड़ गई। अतः इसी कारण, उदाहरणार्थ, हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म का कोई वर्णन क़ुरआन में नहीं मिलता।
  4. क्योंकि वे लोग जिन्हें क़ुरआन ने प्रत्यक्ष रूप से संबोधित किया, अपने विशेष विचार, अपना एक विशेष संदर्भ रखते हैं, इसलिए क़ुरआन में बहुत से ऐसे मामले और बहुत सी ऐसी समस्याएं चर्चा का विषय बने जिनका संबंध उन्हीं की मान्यताओं और परंपराओं से है। इस सिलसिले में यह बात पाठकों की रुचि का कारण होगी कि क़ुरआन में अरब के यहूदियों की कुछ मान्यताओं का वर्णन हुआ है जो दूसरे इलाकों के यहूदियों की मान्यताएं नहीं थीं। जैसे उज़ैर को ईश्वर का पुत्र घोषित करना। इसी प्रकार लगभग दो तिहाई क़ुरआन में अल्लाह के रसूल के समय के अरब मुश्रिकीन (बहुदेववादीयों) का विस्तार पूर्वक वर्णन है। इसलिए उदाहरणार्थ, वर्तमान समय की इब्राहीमी धार्मिक परंपरा का अध्ययन करने वालों को, इस विपुल वर्णन की उपयुक्तता को समझने में शायद कठिनाई हो, यदि वह इस प्रसंग से परिचित नहीं हों।
    क़ुरआन के विद्यार्थियों को इस की विधा के साथ-साथ इसकी विषय वस्तु और इसके भीतर के क्रम का भी ज्ञान होना चाहिए ताकि वे परमेश्वर के इस अंतिम संदेश का उचित परिचय प्राप्त कर सकें। नीचे हम इसका विस्तार से वर्णन करते हैं:

क़ुरआन की विषय-वस्तु (Theme)

क़ुरआन की विषय वस्तु जानने के लिए कुछ मूल बातों का जानना आवश्यक है।
धार्मिक दृष्टिकोण से दुनिया के इतिहास को दो युगों में विभाजित किया जा सकता है: पहला युग जो इस इतिहास के बड़े हिस्से पर आधारित है, उसे ‘नबूव्वत का युग’ (Prophetic Era) कहा जा सकता है। इस युग में परमेश्वर ने दुनिया में अपने दूत (पैगंबर) भेजे ताकि वे मनुष्यों का मार्गदर्शन करें। इन व्यक्तियों को नबी (बहू: अंबिया) कहा जाता है। इस युग का प्रारंभ श्री आदम (अ.स.) से हुआ और इस का अंत श्री मुहम्मद (स) पर हुआ। दूसरे युग का प्रारंभ श्री मुहम्मद (स) के बाद हुआ और उसका अंत क़यामत (महाप्रलय) पर होगा। इस युग को ‘नबूव्वत के बाद का युग’ (Post-Prophetic Era) कहा जा सकता है। इस युग में परमेश्वर अपने दूत नहीं भेजता।

नबूव्वत के युग की एक विशेषता है जो नबूव्वत के बाद के युग में नहीं पायी जाती। वह विशेषता यह है परमेश्वर का अपने रसूलों[1] (कुछ विशेष नबी) के बारे में एक अटल और अपरिवर्तनीय नियम है जो उसके उन नबियों से संबंधित है जिनको रिसालत के पद पर स्थापित किया जाता है। क़ुरआन में इस अटल नियम को ‘सुन्नतुल्लाह’ (अल्लाह की अटल कार्यप्रणाली) कहा गया है:

سُنَّةَ مَنْ قَدْ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِنْ رُّسُلِنَا وَلَا تَجِدُ لِسُنَّتِنَا تَحْوِيلًا

“तुमसे पहले अपने जो रसूल भी हमने भेजे हैं, उन के बारे में इस सुन्नत को याद रखो और हमारी इस सुन्नत में तुम कोई परिवर्तन नहीं पाओगे।“ (क़ुरआन; सूरह बनी इस्राइल 17 – आयत 77)

क़ुरआन, जो नबूव्वत के युग में नाज़िल (अवतरित) हुआ, ने इस अटल नियम को विस्तार से हमेशा के लिए सुरक्षित कर लिया है। यह अटल नियम कुछ नहीं, मगर एक ईश्वरीय प्रयोजन है जिसे वह या तो प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से या फिर अपने रसूलों और उनके साथियों के माध्यम से लागू करता है। अतः इसका संबंध शरीयत (दैव्य क़ानून) से नहीं है। यह, जैसा कि पहले बताया गया, एक ईश्वरीय प्रयोजन है। इस नियम को कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है: परमेश्वर प्राकृतिक आपदाओं या अपने रसूलों के माध्यम से उन लोगों को इसी दुनिया में दण्डित करता है, जिन तक एक रसूल परमेश्वर का सत्य[2] संदेश‌ स्वयं पहुंचा देता है और वह उस सत्य को समझने के पश्चात जानबूझकर उसको नकार देते हैं। इसके विपरीत जो लोग रसूल के संदेश को स्वीकार करते हैं, उन्हें दुनिया में ही उसका अच्छा परिणाम मिल जाता है। क़ुरआन दुनिया के इस अच्छे और बुरे परिणाम का उल्लेख इन शब्दों में करता है:

وَلِكُلِّ أُمَّةٍ رَّسُوْلٌ فَإِذَا جَآءَ رَسُوْلُهُمْ قُضِيَ بَيْنَهُمْ بِالْقِسْطِ وَهُمْ لَا يُظْلَمُوْنَ

“हर जनसमूह के लिए एक रसूल है। फिर जब उन का रसूल आ जाता है तो उनके बीच न्यायपूर्वक निर्णय कर दिया जाता है और उन पर कण भर भी अत्याचार नहीं किया जाता।“ (क़ुरआन; सूरह बनी इस्राइल 10 – आयत 47)

दुनिया के इस अच्छे और बुरे परिणाम का एक विशेष उद्देश्य होता है: मानवता को यह बात याद करवाई जाए कि सब लोगों को एक दिन परमेश्वर के सामने अपने कर्मों का जवाब देना होगा। इस निश्चित सत्य को इंसान प्रायः अनदेखा कर देता है। अतः उसे इस दुनिया ही में इसका पर्यवेक्षण करवा दिया जाता है। परमेश्वर की वह अदालत जो क़यामत मैं स्थापित होगी, उन लोगों के लिए इसी दुनिया में स्थापित कर दी जाती है जिन तक रसूल स्वयं प्रत्यक्ष रूप से ईश्वरीय संदेश पहुंचा देते हैं, ताकि यह क़यामत की न्यायिक प्रक्रिया का एक आंखों देखा सबूत बन जाए। दूसरे शब्दों में उस बड़ी क़यामत से पहले बहुत सी छोटी क़यामतें स्थापित की जाती हैं ताकि वे उस बड़ी क़यामत का प्रत्यक्ष रूप से दर्शन करा दें।

इस पृष्ठभूमि में क़ुरआन की विषय वस्तु को अब समझाया जा सकता है। एक वाक्य में कह सकते हैं कि क़ुरआन की विषय वस्तु है “अल्लाह के नबी के माध्यम से लोगों को क़यामत के बारे में ‘इंज़ार करने’ (सचेत करने) की कथा”। ‘इंज़ार’ क़ुरआन का एक विशेष शब्द है, जिसका अर्थ इस लोक और परलोक, दोनों में सत्य को नकारने के गंभीर परिणामों से अवगत करना है। नबी (स) ने इन परिणामों को इस स्पष्टता के साथ अपने लोगों के सामने रखा कि हठधर्मिता के अलावा उनके पास इनकार की कोई गुंजाइश शेष नहीं रही। इस विषय वस्तु को क़ुरआन से इस प्रकार व्युत्पन्न किया जा सकता है:

क़ुरआन के अनुसार, जहां एक नबी का कार्य लोगों को शुभ समाचार देना और सचेत करना होता है, वही एक रसूल (जो नबीयों में भी एक उच्चतम पद होता है) अपने लोगों को इस स्तर पर, इस स्पष्टता से ईश्वरीय दण्ड के बारे में सचेत करता और ईश्वरीय वरदानों के बारे में शुभ समाचार देता है कि उनके पास हठधर्मिता के अलावा इनकार करने का कोई आधार शेष नहीं रहता। क़ुरआन की परिभाषा में इसे ‘इतमाम-ए-हुज्जत’ कहा जाता है:

رُّسُلاً مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلاَّ يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى اللّهِ حُجَّةٌ بَعْدَ الرُّسُلِ وَكَانَ اللّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا

“यह रसूल जो बशारत (शुभ समाचार) देने वाले और सचेत करने वाले बनाकर भेजे गए ताकि लोगों के लिए इन रसूलों के आने के पश्चात अल्लाह के सामने रखने के लिए कोई बहाना ना रहे। परमेश्वर अत्यंत शक्तिशाली, तत्वदर्शी है।“ (क़ुरआन; सूरह निसा 4 – आयत 165)

लोगों का रसूल को जानबूझकर अस्वीकार करने का वर्णन क़ुरआन इन शब्दों में करता है

فَلَمَّا جَاءهُم مَّا عَرَفُواْ كَفَرُواْ بِهِ فَلَعْنَةُ اللَّه عَلَى الْكَافِرِينَ

“जब उनके पास वह आया जिसे वे पहचानते थे, उन्होंने उसको अस्वीकार कर दिया। तो परमेश्वर का अभिशाप हो इन अस्वीकार करने वालों पर।“ (क़ुरआन; सूरह बक़रह 2 – आयत 89)

‘इत्माम-ए-हुज्जत’ के पश्चात धरती पर परमेश्वर की अदालत लगती है। अहल-ए-ईमान (स्वीकार करने वाले) प्रतिष्ठित होते हैं और अस्वीकार करने वालों को दण्डित किया जाता है। इस प्रकार यह दुनिया उस बड़ी क़यामत (महाप्रलय) से पहले एक छोटी कयामत (साधारण प्रलय) का दृश्य सामने रख देती है। क़ुरआन से प्रतीत होता है कि रसूल के माध्यम से लोगों को सत्य का संदेश पहुंचाने के निर्धारित चरण होते हैं जिनसे गुज़र कर सत्य की ओर रसूल का निमंत्रण परिपूर्ण रूप से लोगों तक पहुंचता है। इन चरणों के लिए ‘इंज़ार’, ‘इंज़ार-ए-आम’, ‘इतमाम-ए-हुज्जत’ और ‘हिजरत-ओ-बराअत’ के शब्दों को प्रयुक्त किया जाता है। अतः हर सूरह के बारे में यह कहा जा सकता है कि वह इनमें से किसी न किसी चरण ही में नाज़िल हुई (उतरी) है, जिसका ज्ञान स्वयं उस सूरह के विषयों को देखकर हो जाता है।

‘इतमाम-हुज्जत’ के चरण तक पहुंचते-पहुंचते नबी के संदेश को स्वीकार करने वाले और अस्वीकार करने वाले दोनों, दो अलग समूहों का रूप धारण कर चुके होते हैं। इस चरण के बाद परमेश्वर की ओर से अंतिम निर्णय की घोषणा कर दी जाती है। रसूलों के इतिहास से विदित होता है कि निर्णय के इस चरण में नास्तिकों पर परमेश्वर का दण्ड दो प्रकार से आता है। परमेश्वर का दण्ड इनमें से कौन सा रूप धारण करेगा इसका निर्णय परिस्थिति के अनुसार होता है। यदि रसूल के साथी अनुयायी संख्या में थोड़े होते हैं और उनके पास किसी अन्य भूभाग की ओर चले जाने का विकल्प नहीं होता जहां वे अपनी सत्ता स्थापित कर सकें, तो रसूल और उसके साथी अपने लोगों से अलग कर दिए जाते हैं। इसके पश्चात रसूल की क़ौम में नास्तिकों को ईश्वरीय प्रकोप अथवा महा विपत्ति के माध्यम से नष्ट कर दिया जाता है। क़ुरआन इस विषय में कहता है:

فَكُلًّا أَخَذْنَا بِذَنبِهِ فَمِنْهُمْ مَّنْ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِ حَاصِبًا وَمِنْهُم مَّنْ أَخَذَتْهُ الصَّيْحَةُ وَمِنْهُمْ مَّنْ خَسَفْنَا بِهِ الْأَرْضَ وَمِنْهُمْ مَّنْ أَغْرَقْنَا

“सो इनमें से हर एक को हमने उसके पाप के कारण पकड़ा। फिर उनमें से कोई था कि उस पर हमने पत्थर बरसाने वाली हवा भेज दी और कोई था कि उसको धमाके ने आ पकड़ा और उनमें से कोई था कि उसे हमने धरती में धंसा दिया और कोई था कि उसको हमने डुबो दिया…” (क़ुरआन; सूरह अंकबूत 29 – आयत 40)

इसी नियम के अनुसार ‘आद’, ‘समूद’, ‘नूह (मनु)’, ‘लूत’, ‘शुएब’ आदि के लोगों का प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से सर्वनाश कर दिया गया, जब उन्होंने अपने अपने रसूलों को जानबूझकर नकार दिया। यह बात क़ुरआन में जगह जगह उल्लिखित है। अपितु क़ुरआन की एक छोटी सी सूरह, सूरह क़मर (54) में इन जनसमूहों पर ईश्वरीय प्रकोप का विस्तार पूर्वक वर्णन हुआ है।

दूसरी परिस्थिति में एक रसूल को पर्याप्त संख्या में साथी अनुयायी मिल जाते हैं और उन्हें ‘हिजरत’ करने की कोई जगह (प्रवास स्थान) भी मिल जाती है जहां वे परमेश्वर की योजना के अंतर्गत राजनीतिक सत्ता भी प्राप्त कर लेते हैं। इस परिस्थिति में रसूल और उनके साथी तलवार अर्थात सैन्य बल से अपने विरोधियों को परास्त कर लेते हैं। वह दण्ड जो पहली परिस्थिति में आसमान से (प्राकृतिक रूप से) आता है, वह इस दूसरे रूप में परमेश्वर के संदेश पर विश्वास करने वालों (आस्तिकों) के हाथों से लागू होता है और साथ ही यह बात भी स्पष्ट कर दी जाती है कि वास्तव में धरती और आकाश का स्वामी यह कार्यवाही करता है:

قَاتِلُوْهُمْ يُعَذِّبْهُمُ اللّهُ بِأَيْدِيْكُمْ وَيُخْزِهِمْ وَيَنْصُرْكُمْ عَلَيْهِمْ

“उन से लड़ो, अल्लाह तुम्हारे हाथों से इनको दण्डित करेगा और उन्हें अपमानित करेगा और अपनी सहायता से तुम्हें विजयी करेगा…” (क़ुरआन; सूरह तौबह 9- आयत 14)

فَلَمْ تَقْتُلُوهُمْ وَلَـكِنَّ اللّهَ قَتَلَهُمْ

“(वस्तुतः इस युद्ध में) तुमने इनकी हत्या नहीं की, अपितु परमेश्वर ने इनकी हत्या की…” (क़ुरआन; सूरह अनफ़ाल 8- आयत 17)

अल्लाह के रसूल, श्री मुहम्मद (स), के मामले में यही दूसरी परिस्थिति पैदा हुई। यह बात भी क़ुरआन से विद्युत होती है के दण्ड भी दो प्रकार का होता है: मुश्रिक (परमेश्वर के साझी संबंधी मानने वाले) लोगों को उनके इस ‘शिर्क’ (किसी अन्य को परमेश्वर के सदृश्य अथवा साझी मानने) पर जानबूझकर डटे रहने के कारण नष्ट कर दिया जाता है। और वे लोग जो मूल रूप से ‘तौहीद’ (परमेश्वर के एकमात्र प्रभु होने) के ध्वज वाहक होते हैं, उन्हें जीवित रहने का अवसर इस शर्त के साथ दिया जाता है कि वे रसूल और उसके साथियों के अधीन रहना स्वीकार करें। दण्ड के पहले रूप का आधार क़ुरआन के इस सिद्धांत पर है कि परमेश्वर जानबूझकर शिर्क करने को कभी क्षमा नहीं करते:

إِنَّ اللّهَ لاَ يَغْفِرُ أَن يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَن يَشَاء وَمَن يُشْرِكْ بِاللّهِ فَقَدِ افْتَرَى إِثْمًا عَظِيمًا

“परमेश्वर इस अपराध को क्षमा नहीं करेगा कि (जानबूझकर किसी को) उसका साझी ठहराया जाए। किंतु इससे नीचे, जिसके लिए जो पाप चाहेगा, (अपने विधान के अनुसार) क्षमा करेगा, और (इसमें तो कोई संदेह ही नहीं कि) जो परमेश्वर का साझी बनाता है, वह एक महापाप का उपाय करता है।“ (क़ुरआन; सूरह निसा 4 – आयत 48)

इसलिए इसी सिद्धांत पर बनी इस्राइल (इस्राइल के वंशज) को सामूहिक रूप से नष्ट नहीं किया गया, क्योंकि वे मूल रूप से एक परमेश्वर के मानने वाले थे। उनको दण्डित इस प्रकार से किया गया कि वे क़यामत तक श्री ईसा मसीह (अ.स.) के मानने वालों के अधीन रहेंगे:

إِذْ قَالَ اللّهُ يَا عِيسَى إِنِّي مُتَوَفِّيكَ وَرَافِعُكَ إِلَيَّ وَمُطَهِّرُكَ مِنَ الَّذِينَ كَفَرُواْ وَجَاعِلُ الَّذِينَ اتَّبَعُوكَ فَوْقَ الَّذِينَ كَفَرُواْ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ

“उस समय, जब परमेश्वर ने कहा: हे ईसा, मैंने निर्णय किया है कि तुझे मृत्यु दूंगा और अपनी ओर उठा लूंगा और (तुझे) अस्वीकार करने वालों से तुझे अलग करूंगा और तेरे अनुयायियों को क़यामत के दिन तक तेरे विरोधियों पर प्रभावी रखूंगा…” (क़ुरआन; सूरह आल-ए-इमरान 3 – आयत 55)

क़ुरआन की इस विषय वस्तु का एक महत्वपूर्ण परिणाम निकलता है जिसको बहुत अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। इसका संबंध उस अटल और अपरिवर्तनीय नियम से है जो अभी विस्तार से हमने समझा है कि केवल परमेश्वर ही इस बात का अधिकार रखता है कि वह लोगों के द्वारा सत्य को जानबूझकर तिरस्कृत करने पर उनको दण्डित करे।

नबूव्वत के युग में सत्य का यह तिरस्कार शिर्क, कुफ़्र (जानबूझकर सत्य को ठुकराना) और इर्तिदाद (धर्म को त्याग देना) के अपराधों के रूप में सामने आया। परमेश्वर ने दोषी लोगों को अपने रसूलों या प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से दण्डित किया। परंतु नबूव्वत के बाद के काल में किसी व्यक्ति या सत्ता या राष्ट्र को यह अधिकार प्राप्त नहीं है के वह इन अपराधों पर लोगों को दण्डित करे। इसका अधिकार केवल परमेश्वर को है। वह अपने इस अधिकार का प्रयोग दोबारा क़यामत (पुनः जीवित होने) के दिन करेगा। इसके अंतर्गत यह बात समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि नबूव्वत के युग के यहूदीयों और ईसाइयों और नबूव्वत के बाद के युग के यहूदियों और ईसाइयों के बीच बहुत अंतर है। पहले वाले यहूदियों और ईसाइयों को उनके द्वारा सत्य को जानबूझकर तिरस्कृत करने पर उसी युग में दण्डित किया गया, लेकिन नबूव्वत के बाद के युग वाले यहूदियों और ईसाइयों को इस प्रकार का कोई दण्ड नहीं दिया जा सकता। जैसा कि अभी हमने देखा कि इस दण्ड का संबंध परमेश्वर के उस अटल और अपरिवर्तनीय विधान से है जो केवल और केवल नबूव्वत के युग में लागू होता है।

दूसरा परिणाम जो क़ुरआन की इस विषय वस्तु का ध्यान रखते हुए समझना चाहिए, वह यह है कि क्योंकि नबूव्वत के युग में परमेश्वर के इस अटल विधान को लागू होना था, जिसके अंतर्गत उन्होंने सत्य का तिरस्कार करने वालों को दण्डित किया, कुछ घटनाएं क़ुरआन (और अन्य ईश्वरीय ग्रंथों) में उल्लिखित हैं जो अब नबूवत के बाद के युग में उस तरह घटित नहीं होतीं, जैसे वह नबूवत के युग में होती थीं। इसके दो प्रमुख उदाहरण दिए जा सकते हैं:

  1. इतमाम-ए-हुज्जत के उद्देश्य से पैगंबरों के माध्यम से प्रकट होने वाले चमत्कार (मोजिज़ात)।
  2. फ़रिश्तों का पैगंबर के अनुयायियों की सहायता इस प्रकार करना जिसका उन्हें अनुभव हुआ।
    यह कहा जा सकता है कि यदि क़ुरआन की उपर्युक्त विषय वस्तु और यह दो परिणाम सामने रखे जाएं तो पाठक क़ुरआन की बातों की गहरी अनुभूति पैदा कर सकता है।

क़ुरआन के भीतर का क्रम (Arrangement)

अपने भीतर के क्रम के बारे में स्वयं क़ुरआन ने कहा है:

وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ سَبْعًا مِّنَ الْمَثَانِیْ وَالْقُرْآنَ الْعَظِيْمَ

“हमने तुमको सात ‘मसानी’, अर्थात महान क़ुरआन प्रदान कर दिया है।“ (क़ुरआन; सूरह हिज्र15 – आयत 87)

इस आयत का अर्थ यह है कि क़ुरआन को परमेश्वर ने सात भागों में विभाजित किया है और इसके हर भाग में सूरतें अपने विषय के अनुसार जोड़ा-जोड़ा हैं। यह जुड़वा सूरतें किसी न किसी पहलू से एक दूसरे की पूर्ति करती हैं। इसलिए, उदाहरण स्वरूप, बहुत थोड़े से चिंतन से सूरह ज़ुहा (93) और सूरह अलम् नश्रह (94) के बीच बहुत गहरी समानता दिखाई देती है। यही मामला सुरा फ़लक़ (113) और सूरह नास (114) का है जिसका अनुभव हर पाठक कर सकता है। अधिक चिंतन से अन्य सूरतों में भी यही समानता किसी न किसी पहलू से दिखाई देती है। कुछ सूरतों का जोड़ा नहीं है और उनका मामला इस सिद्धांत के एक अपवाद का है। जैसे सूरह फ़ातिहा पूरे क़ुरआन की भी भूमिका है और क़ुरआन के पहले भाग की भी।

इन सात भागों का संक्षिप्त विवरण यूं है:

प्रथम भाग
अल्-फ़ातिहा से अल्-माइदा तक (1-5)
मक्की: 1
मदनी: 2-5

द्वितीय भाग
अल्-अनआम से अत्-तौबह तक (6-9)
मक्की: 6-7
मदनी: 8-9

तृतीय भाग
यूनुस से अन्-नूर तक (10-24)
मक्की: 10-23
मदनी: 24

चतुर्थ भाग
अल्-फ़ुरक़ान से अल्-अहज़ाब तक (25-33)
मक्की: 25-32
मदनी: 33

पंचम भाग
सबा से अल्-हुजूरात तक (34-49)
मक्की: 34-46
मदनी: 47-49

षष्ठ भाग
क़ाफ़ से अत्-तहरीम तक (50-66)
मक्की: 50-56
मदनी: 57-66

सप्तम भाग
अल्-मुल्क से अन्-नास तक (67-114)
मक्की: 67-112
मदनी: 113-114

इन भागो की कुछ विशेषताएं भी नीचे लिख देते हैं:

  1. प्रत्येक भाग एक या एक से अधिक मक्की (मदीना हिजरत से पूर्व उतरने वाली) सूरतों से शुरू होता है और उसका अंत एक या एक से अधिक मदनी (मदीना हिजरत के बाद उतारने वाली) सूरतों पर होता है। इन भागों में मक्की सूरतों का मदनी सूरतों से वही संबंध होता है जो किसी पेड़ की जड़ का उसके तने से होता है।
  2. हर भाग में सूरतों का क्रम नुज़ूली होता है अर्थात जिस क्रम से क़ुरआन की सूरतें उतरी हैं।
  3. हर भाग अल्लाह के रसूल, मुहम्मद (स), के जीवन की कथा के किसी चरण के बारे में किसी न किसी पहलू से बात करता है।
  4. हर भाग का एक अपना विषय होता है जिसको केंद्र में रखकर उस भाग की सूरतें घूमती हैं। यह विषय निम्नलिखित हैं:

    प्रथम भाग
    अल्-फ़ातिहा से अल्-माइदा तक (1-5)
    इसका विषय यहूदियों और ईसाइयों पर इतमाम-ए-हुज्जत, उनके स्थान पर श्री इब्राहीम (अ.स) के वंश ही की एक दूसरी शाखा, बनी इस्माईल (इस्माइल की संतान), में से एक मुस्लिम समुदाय की स्थापना, उसका तज़्किया-व-तत्हीर (शुद्धीकरण) और उसके साथ बांधे परमेश्वर के अंतिम वचन का वर्णन है।

    द्वितीय भाग
    अल्-अनआम से अत्-तौबह तक (6-9)
    इसका विषय क़ुरैश पर इतमाम-ए-हुज्जत, मुसलमानों का शुद्धिकरण, अथवा क़ुरैश और अहले किताब (यहूदी व ईसाई), दोनों के लिए परमेश्वर के अंतिम निर्णय की घोषणा का वर्णन है।

    तृतीय भाग
    यूनुस से अन्-नूर तक (10-24)
    इसका विषय क़ुरैश को सचेत करना, नबी और उनके साथी अनुयायियों को अरब की धरती में सत्य की विजय का शुभ समाचार देना, और उनका शुद्धिकरण है, जिसमें सत्य की विजय की भविष्यवाणी का पहलू प्रमुख रूप से सामने आया है।

    चतुर्थ भाग
    अल्-फ़ुरक़ान से अल्-अहज़ाब तक (25-33)
    इसका विषय रिसालत (अर्थात अल्लाह के द्वारा किसी व्यक्ति को रसूल बनाकर भेजने) की अवधारणा को प्रमाणित करना, उस के माध्यम से क़ुरैश को सचेत करना अथवा उन्हें शुभ समाचार देना और मुसलमानों का शुद्धीकरण है। नबी (स) और क़ुरआन का वास्तविक स्थान उसी के अंतर्गत नबी (स) के मानने वालों पर स्पष्ट किया गया है।

    पंचम भाग
    सबा से अल्-हुजूरात तक (34-49)
    इसका विषय तौहिद को प्रमाणित करना, उसके माध्यम से क़ुरैश को सचेत और नबी (स) और उनके अनुयायियों के लिए सत्य की विजय की खुशखबरी और उनका शुद्धीकरण है।

    षष्ठ भाग
    क़ाफ़ से अत्-तहरीम तक (50-66)
    इसका विषय क़यामत (परलोकीय जीवन) को प्रमाणित करना, उस के माध्यम से क़ुरैश को सचेत करना, ख़ुशख़बरी देना और मुसलमानों का शुद्धिकरण है। अल्लाह और रसूल का आज्ञाकारी होने और उनके प्रति समर्पित रहने की अपेक्षा इसी शुद्धिकरण के अंतर्गत और उस समय की परिस्थिति के अनुसार बताई गई हैं।

    सप्तम भाग
    अल्-मुल्क से अन्-नास तक (67-114)
    इसका विषय क़ुरैश के सरदारों को क़यामत के बारे में सावधान करना, उन पर इतमाम-ए-हुज्जत, इसके परिणाम स्वरूप उन्हें दण्ड की धमकी और नबी (स) के लिए अरब की धरती में सत्य की विजय होने की भविष्यवाणी है।
  5. इन भागों के बीच संबंध और उनके क्रम की वास्तविकता इस चित्र से समझी जा सकती है:

यदि पीछे समझाई गई क़ुरआन की विषय वस्तु को दोहराया जाए तो यह कहा गया था कि यह क़ुरआन श्री मुहम्मद (स) का वह वृतांत है जिसमें उनके द्वारा अपने लोगों को परमेश्वर के दण्ड से सचेत किया गया और फिर इसी जीवन में उन लोगों के द्वारा सत्य या असत्य के चुनाव का परिणाम सामने आ गया। यह बात भी स्पष्ट रहे कि दो समूहों को श्री मुहम्मद (स) ने मुख्य रूप से इंज़ार के लिए संबोधित किया: मुश्रिकीन और अहल-ए-किताब जो उस समय अरब में रहते थे। क़ुरआन का दूसरा भाग इन दोनों समूहों पर उस दण्ड का उल्लेख करता है जो उन्हें इस दुनिया में दिया गया। इस तरह से वह सारे भागों के चरम के समान है। यहां यह बात भी स्पष्ट रहे के भाग 7 से भाग 3 तक अरब के मुश्रिकीन को संबोधित किया गया है और भाग 1 में अहल-ए-किताब को। भाग 2 में, जैसा कि कहा गया, इन दोनों ही समूहों को संबोधित किया गया है और इनके परिणाम का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। अतः क़ुरआन के इस भाग की हैसियत एक चोटी के समान है, क्योंकि क़ुरआन के विषय के दृष्टिकोण से इस पर क़ुरआन का समापन हो जाता है।

इन बातों को यदि सामने रखा जाए तो कहा जा सकता है कि क़ुरआन श्री मुहम्मद (स) के द्वारा किए गए इंज़ार की कथा को इस सुंदर क्रम से बयान करता है।

समापन

पीछे लिखी गई बातों में क़ुरआन की विधा, विषय वस्तु और उसके भीतर के क्रम का एक संक्षिप्त सर्वेक्षण सामने रखा गया है। क़ुरआन में ईश्वरीय वचनों को एक विशेष प्रकरण के साथ, एक अर्थगत क्रम से बयान किया गया है। उसके इन पहलुओं का ज्ञान पाठक के सामने इस ग्रंथ का ऐसा परिचय पेश करता है कि उसे अपने प्रभु की और से भेजे गए एक श्रेष्ठतम साहित्य का एक अनोखा अनुभव हो जाता है। वह इस ग्रंथ के माध्यम से इस जगत से परे एक महान अस्तित्व की कुछ अनुभूति कर पाता है। उसका हृदय परमेश्वर की इस अद्भुत रचना से परम आनंदित हो जाता है और वह पुकार उठता है कि यह एक दिव्य ग्रंथ है जो मानवता के मार्गदर्शन हेतु भेजा गया है।


[1] ‘रसूल’ एक विशेष पद है जो कुछ नबियों को परमेश्वर की ओर से मिलता है।

[2] “सत्य” से यहाँ अभिप्राय इस बात का बोध होना है कि एक दिन हर व्यक्ति अपने कर्मों के आधार पर परमेश्वर के सामने उत्तरदायी होगा और उन कर्मों के आधार पर अच्छा या बुरा परिणाम भोगे गा।  

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: