Religion, Philosophy and the Heart

क़ुरआन अध्ययन के मूल सिद्धान्त- भाग 1 – अरबी-ए-मुअल्ला

(जावेद अहमद गामिदी की पुस्तक ‘मीज़ान’ का एक अंश)
अनुवाद तथा टीका: मुश्फ़िक़ सुल्तान

क़ुरआन अध्ययन के मूल सिद्धान्त

पहले उन सिद्धांतों को लीजिए जो पवित्र क़ुरआन पर चिंतन-मनन के लिए आवश्यक हैं:

अरबी-ए-मुअल्ला

पहली चीज़ यह है कि क़ुरआन जिस भाषा में उतरा है, वह ‘उम्मुल क़ुरा’ (मक्का) की अरबी-ए-मुअल्ला[1] है जो उस के जाहिली[2] काल में क़ुरैश कबीले की भाषा थी। इसमें संदेह नहीं कि इस भाषा को परमेश्वर ने अपने इस ग्रंथ में सुंदरता और वाग्मिता का एक अद्वितीय अनंत चमत्कार बना दिया है, लेकिन अपने मूल के अनुसार यह वही भाषा है जो परमेश्वर के दूत श्री मुहम्मद (स) बोलते थे और जो उस काल में मक्का वासियों की भाषा थी:

فَإِنَّمَا يَسَّرْنَاهُ بِلِسَانِكَ لِتُبَشِّرَ بِهِ الْمُتَّقِينَ وَتُنذِرَ بِهِ قَوْمًا لُّدًّا

“सो, (हे पैग़ंबर), हम ने इस क़ुरआन को तुम्हारी भाषा में इसी लिए सरल एवं उचित बना दिया है कि तुम उन लोगों को इस के माध्यम से शुभ समाचार दो जो परमेश्वर से डरने वाले हैं और इन हठी लोगों को इस के माध्यम से सचेत कर दो।“ (सूरह मरयम 19:97)

इसलिए इस किताब की समझ अब इस भाषा के उचित ज्ञान और इस में अच्छी रुचि ही पर आधारित है, और इस में चिंतन-मनन और इसकी व्याख्या के लिए यह आवश्यक है कि एक व्यक्ति इस भाषा का योग्य विद्वान और इसकी शैलियों का ऐसा ज्ञाता हो कि क़ुरआन के अभिप्राय तक पहुँचने में कम से कम उसकी भाषा उसके सामने बाधा न बन सके।

यद्यपि इस बात की इससे अधिक व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं, लेकिन इस भाषा के बारे में यह बात इस के प्रत्येक विद्यार्थी को ठीक तरह से समझ लेनी चाहिए कि यह वह अरबी नहीं है जो हरीरी और मुतनब्बी[3] अथवा ज़मख्शरी और राज़ी[4] ने लिखी है या हमारे युग में मिस्र और शाम के समाचारपत्रों में प्रकाशित होती और उन के लेखकों और कवियों की लेखनी से निकलती हैं। यह भी एक प्रकार की अरबी ही हैं, लेकिन वह अरबी जिसमें क़ुरआन उतरा है और जिसे वस्तुतः अरबी-ए-मुअल्ला कहना चाहिए, उस में और इस भाषा के बोल चाल, शैली, शब्दों एवं कहावतों में लगभग वैसा ही अंतर है, जो उदाहरणार्थ, मीर और ग़ालिब, या सादी और ख़याम की भाषा और हमारे ज़माने में भारत और ईरान के समाचारपत्रों की उर्दू एवं फ़ारसी में है। इसलिए यह सच है कि आज कल की अरबी से क़ुरआन की भाषा की गहरी समझ न केवल यह कि पैदा नहीं होती, अपितु उलटा इस से अंजान कर देती है और अगर इसी को ओढ़ना बिछौना बना लिया जाए तो पवित्र क़ुरआन की समझ से आदमी पूर्णतः वंचित हो जाता है।

अतः क़ुरआन की भाषा के लिए सबसे पहले जिस चीज़ की ओर जाना चाहिए, वह स्वयं पवित्र क़ुरआन ही है। इसके बारे में कोई व्यक्ति इस सच्चाई को नकार नहीं सकता कि यह जब मक्का में उतरा तो इसका अपौरुषेय (ईश्वर कृत) होना तो निःसंदेह एक समय तक विवादास्पद रहा, किंतु इसके शुद्ध अरबी में होने पर कोई व्यक्ति कभी आपत्ति नहीं कर सका। क़ुरआन ने कहा कि वह किसी अजमी (ग़ैर अरबी) की कृति नहीं हो सकता और इसका प्रमाण यह दिया कि वह शुद्ध एवं स्पष्ट अरबी में उतरा है। क़ुरआन ने अपने आप को भाषा और साहित्य तथा सुंदरता और वाग्मिता का एक परम चमत्कार घोषित किया और क़ुरैश को चुनौती दी कि वे इस के समतुल्य कोई एक ही सूरह (अध्याय) बना लाएँ। यहाँ तक कि इस ने घोषणा की कि वे सब इसके लिए अपने लेखकों, वक्ताओं, कवियों, ज्योतिषियों और केवल मनुष्यों को ही नहीं, जिनों, शैतानों और अपने देवी-देवताओं में से भी जिनको चाहें बुला लें, परंतु यह एक निश्चित ऐतिहासिक सच्चाई है कि अरब वासियों में से कोई व्यक्ति न इसकी शुद्ध अरबी को नकार सका और न इसकी चुनौती का जवाब देना ही किसी व्यक्ति के लिए कभी संभव हुआ:

وَإِن كُنتُمْ فِي رَيْبٍ مِّمَّا نَزَّلْنَا عَلَى عَبْدِنَا فَأْتُواْ بِسُورَةٍ مِّن مِّثْلِهِ وَادْعُواْ شُهَدَاءكُم مِّن دُونِ اللّهِ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ

“(यही इस ग्रंथ का आह्वान है, इसे स्वीकार करो), और जो कुछ हमने अपने बंदे पर उतारा है, उसके बारे में यदि तुम्हें संदेह है तो (जाओ और) इस के जैसी एक सूरह ही बना लाओ और (इसके लिए) परमेश्वर के सिवा तुम्हारे जो समर्थक हैं, उन्हें भी बुला लो, अगर तुम (अपनी इस कल्पना में) सच्चे हो।“ (सूरह बक़रह 2:23)

قُل لَّئِنِ اجْتَمَعَتِ الإِنسُ وَالْجِنُّ عَلَى أَن يَأْتُواْ بِمِثْلِ هَـذَا الْقُرْآنِ لاَ يَأْتُونَ بِمِثْلِهِ وَلَوْ كَانَ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ ظَهِيرًا

“कह दो कि यदि सारे मनुष्य और सारे जिन एकत्र हो जाएँ कि ऐसा क़ुरआन बना लाएँ तो इस जैसा क़ुरआन नहीं ला सकें गे, यद्यपि वे एक दूसरे के सहायक बन जाएँ।“ (सूरह बनी इस्राईल 17: 88)

केवल यही नहीं, मक्का में वलीद बिन मुगीरा जैसे साहित्य समालोचक ने क़ुरआन को सुना तो अनायास कह उठा:

والله ما منكم رجل أعرف بالأشعار مني ولا أعلم برجزه ولا بقصيده مني ولا بأشعار الجن والله ما يشبه الذي يقول شيئا من هذا والله إن لقوله الذي يقوله حلاوة وإن عليه لطلاوة وإنه لمثمر أعلاه مغدق أسفله وأنه ليعلو ولا يعلى وأنه ليحطم ما تحته

“अल्लाह की क़सम, तुम में से कोई भी मुझसे बढ़ कर न शायरी को जानता है न रज्ज़ और क़सीदे को और न जिनों की प्रेरणा को। अल्लाह की सौगंध, यह वचन जो यह व्यक्ति बोल रहा है, इनमें से किसी के सादृश्य नहीं हैं। अल्लाह की सौगंध, इस व्यक्ति के वचनों में बड़ी मिठास है और इनमें बड़ी शोभा है। इसकी शाखाएँ फलों से लदी हुई हैं, इसकी जड़ें पानी से तृप्त हैं, यह अवश्य विजयी होगा, इसपर कोई विजय न पा सके गा और यह अपने नीचे हर चीज़ को तोड़ डाले गा।“ (अल-सीरह अल-नबविय्यह, इब्नि कसीर 1/499)

‘सबअ मुअल्लकात’[5] के प्रसिद्ध कवियों में लबीद उस समय जीवित था। यह वही शायर हैं जिनके एक शेर[6] पर फ़रज़्दक जैसा शायर झुक गया, परंतु लबीद भी क़ुरआन के सामने इस तरह मूक हुए कि जब श्री उम्र फ़ारूक़ (र) ने शेर सुनाने की प्रार्थना की तो कहा: बक़रह और आल-ए-इमरान को सुनने के बाद अब क्या शेर कहूँ?[7] ‘ما کنت لأقول شعرًا بعد أن علمني اللّٰہ البقرۃ وآل عمران’।

यह केवल एक महान कवि का स्वीकरण नहीं था। इसका अर्थ यह था कि अरब का सारा सर्वोच्च साहित्य और सम्पूर्ण वाग्मिता क़ुरआन के सामने झुक गए हैं। अतः यह भी सत्य है कि भाषा एवं साहित्य का यह अद्भुत चमत्कार किसी छोटे से छोटे परिवर्तन और किसी एक अक्षर के बदलाव के बिना ‘बिल-लफ़्ज़’ (शब्दशः) हम तक पहुंचा है। इसलिए यह बात अब पूर्णतः प्रमाणित एवं सर्वमान्य है कि परमेश्वर की इस धरती पर क़ुरआन केवल धर्म ही का परम-प्रमाण नहीं है, अपितु अपने ज़माने की भाषा के लिए भी एक निर्णायक कसौटी है।

पवित्र क़ुरआन के बाद यह भाषा हदीस और सहाबा की बातों के संग्रह में मिलती है। इसमें संदेह नहीं कि ‘रिवायत बिल-मअना’[8] के कारण इस संग्रह का बहुत थोड़ा हिस्सा ही है जिसे अब भाषा की जांच में प्रमाण की हैसियत से प्रस्तुत किया जा सकता है, परंतु यह जितना कुछ भी है, भाषा रसज्ञों के लिए अमूल्य पूंजी है। यह अरब-ओ-अजम के उच्चतम वक्ता पैगंबर मुहम्मद (स) और भाषा की गहरी समझ रखने वाले उन के साथियों की भाषा है। अपने शब्दों, अपनी कहावतों और अपनी शैली के अनुसार यह भाषा उस भाषा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है जिसमें क़ुरआन उतरा है। क्योंकि नबी (स) की प्रार्थनाओं, उपमाओं एवं अपने साथियों के साथ उनके संवाद का अधिकतर वर्णन ‘बिल-लफ़्ज़’ (शब्दशः) हुआ है, इसलिए इस भाषा के उदाहरण सबसे अधिक इसी संग्रह में मिलते हैं। अतः क़ुरआन की भाषा के विद्यार्थी यदि इस विशाल सागर में तैराकी करें तो अपने लिए अनेक मोती एकत्रित कर सकते हैं और क़ुरआन के शब्दों और अर्थों से संबन्धित कई कठिनाइयों का समाधान करने में इस संग्रह से उनको बहुत सहायता मिल सकती है।

इसके बाद इस भाषा का सबसे बड़ा स्रोत कलाम-ए-अरब (प्राचीन अरब साहित्य) है। यह इमर-उल-क़ैस, ज़ुहैर, अम्र बिन कुलसूम, लबीद, नाबिगा, तरफ़ह, अंतरह, अअशा हारिस बिन हलिज़्ज़ह जैसे शायरों और क़ुस बिन साइदह जैसे वक्ताओं का साहित्य है। विद्वान गण जानते हैं कि इस का बड़ा भाग कवियों के दीवान और ‘अस्मईय्यात’[9], ‘मुफ़ज़्ज़लिय्यात’[10], ‘हमासा’[11], ‘सबअ मुअल्लकात’ एवं जाहिज़ और मुबर्रद और इस तरह के अन्य साहित्यकारों की पुस्तकों में एकत्रित है[12]। हमारे युग में जाहिली शायरों के ऐसे बहुत से दीवान भी प्रकाशित हुए हैं जो इससे पहले हमें प्राप्त नहीं थे। इसमें संदेह नहीं कि अरबी भाषा के अधिकतर शब्दकोश अरबी भाषी लोगों की सर्वसम्मति और निरंतर बोलने से आगे चलें हैं और उनका एक विशाल संग्रह मूल शब्दकोशों: ‘अत-तहज़ीब’[13], ‘अल-मोहकम’[14], ‘अस-सिहाह’[15], ‘अल-जमहरह’[16] और ‘अन-निहायह’[17] आदि में सुरक्षित है, किंतु इसके साथ यह भी सच्च है कि अरबी भाषा का जो हिस्सा इस प्रकार ‘मुतवातिर’ नहीं है, इसको परखने के लिए सबसे अधिक विश्वसनीय स्रोत यही कलाम-ए-अरब है। इसमें यद्यपि कुछ कलाम ऐसा भी है जो बाद में भी रचा गया है, किंतु जिस प्रकार हदीस-समीक्षा के विशेषज्ञ उसकी प्रामाणिक और अप्रामाणिक हदीसों में अंतर कर सकते हैं, उसी प्रकार इस कलाम के समीक्षक भी कुछ विश्वसनीय कसौटियों के आधार पर इसके शुद्ध और अशुद्ध भाग को एक दूसरे से अलग कर सकते हैं। अतः यही कारण है कि भाषा एवं साहित्य के सर्वोच्च विद्वान इस बात पर सदैव सहमत रहे हैं कि क़ुरआन के बाद यही साहित्य है जिसपर विश्वास किया जा सकता है और जो अपने संचार की प्रामाणिकता और शब्दशः वर्णन के आधार पर भाषा की जांच में निर्णायक स्थान रखता है। ‘खज़ानत-उल-अदब’[18] के रचयिता ने लिखा है:

الكلام الذي يستشهد به نوعان: شعر وغيره فقائل الأول العلماء على طبقات أربع: الطبقة الأولى :الشعراء الجاهليون، وهم قبل الإسلام كامرئ القيس والأعشى، والثانية: المخضرمون، وهم الذين أدركوا الجاهلية والإسلام كلبيد وحسان، والثالثة: المتقدمون، ويقال لهم الإسلاميون، وهم الذين كانوا في صدر الإسلام كجرير والفرزدق، والرابعة: المولدون، ويقال لهم المحدثون، وهم من بعدهم إلى زماننا كبشار بن بردن وأبي نواس. فالطبقتان الأوليان يستشهد بشعرهما إجماعاً۔

“जिस साहित्य को भाषा के मामले में प्रमाण माना जाता है, उसके दो रूप हैं: एक जो काव्य के रूप में है और दूसरा जो गद्य के रूप में है। इनमें से काव्य को विद्वानों ने चार वर्गों में विभाजित किया है: पहला वर्ग इस्लाम से पूर्व के जाहिली कवियों का है, जैसे इमर-उल-क़ैस और अअशा। दूसरा वर्ग ‘मुखज़्रमीन’ का है जिन्होंने इस्लाम और जाहिलिय्यत, दोनों का ज़माना पाया, जैसे लबीद और हस्सान। तीसरा वर्ग ‘मुतकद्दिमीन’ का है जिन लोगों को ‘इस्लामिय्यीन’ भी कहा जाता है। ये वे लोग हैं जो इस्लाम के प्रारम्भिक ज़माने में हुए, जैसे जरीर और फ़रज़्दक। चौथा वर्ग ‘मुवल्लिदीन’ का है जिन्हें ‘मुहदसीन’ भी कहते हैं। इनमें वे सब लोग सम्मिलित हैं जो पहले तीन वर्गों के बाद हमारे इस ज़माने तक हुए हैं, जैसे बश्शार बिन बर्द और अबू नुवास। इन वर्गों में से पहले दो के बारे में सर्वसम्मति है कि उनके काव्य से भाषार्थ के लिए प्रमाण दिया जा सकता है।“ (खज़ानत-उल-अदब 1/3)

यही बात श्री उमर-ए-फ़रूक़ (र) ने अपने मंच से मुसलमानों को संबोधित करते हुए कही थी:

عليكم بديوانكم لا تضلوا قالوا وما ديواننا قال شعر الجاهلية فإن قيه تفسير كتابكم ومعاني كلامكم

“लोगो, तुम अपने दीवान, अर्थात जाहिली काव्य की सुरक्षा करते रहो, इसलिए कि उन में तुम्हारी किताब (क़ुरआन) की व्याख्या भी है और तुम्हारी भाषा के अर्थ भी।“ (अल-जामिअ लि-अहकामिल क़ुरआन, अल-कुर्तुबी 10/110)

श्री मुहम्मद (स) के साथियों में धर्म के विख्यात ज्ञाता इब्न-ए-अब्बास (र) ने कहा है:

إذا خفي علیکم شيء من القرآن فابتغوہ في الشعر، فإنہ دیوان العرب

“क़ुरआन की कोई बात तुम्हें समझ में नहीं आ रही हो, तो उसे (जाहिली) काव्य में ढूंढा करो, क्योंकि यही काव्य वास्तव में अरब वालों का  दीवान है।“ (अल-मुसतदरक, अल-हाकिम, हदीस 3845)

यहाँ यह बात भी ध्यान में रहे कि जाहिली काल के लोगों का यह साहित्य केवल भाषा और उसकी शैलियों का स्रोत नहीं है, अपितु इसके साथ अरब की उस सभ्यता एवं संस्कृति की झलक भी दिखाता है जिसकी उचित तस्वीर यदि सामने ना हो तो पवित्र क़ुरआन में किसी प्रसिद्ध अंतर्कथा की ओर संकेत तथा अलंकार के उन रूपों को समझना कठिन हो जाता है जो इस साहित्यिक कृति के बहुमूल्य अंश हैं। अरब वासियों के समाज की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं? वे किन चीजों को मारूफ़[19] और किन चीजों को मुंकर[20] कहते थे? उनके समाज में अच्छाई और बुराई के मापदंड क्या थे? उनके धार्मिक विचार और रीति-रिवाज किस प्रकार के थे? उनकी सभ्यता किन आधारों पर खड़ी थी और उनका समाज किन तत्वों से बना था? उनके राजनीतिक विचार क्या थे और दिन रात वे क्या करते थे और उनकी रुचि किन कार्यों में थी? वे क्या असभ्य लोगों का एक समूह ही थे जिन्हें इस्लाम ने उठाया और विश्वविजेता बनाया या अपनी इस असभ्यता के बावजूद उनमें कुछ ऐसे गुण और ऐसी विशेषताएँ थीं जिनके आधार पर क़ुरआन जैसा ग्रंथ उन्हें दिया गया और परमेश्वर की ओर से वे सम्पूर्ण विश्व के लिए शहादत-ए-हक़[21] के उच्च आसान पर बैठाए गए? इन सभी प्रश्नों के ठीक-ठीक उत्तर इसी साहित्य में मिलते हैं और यही उत्तर हैं जिनको जान कर पवित्र क़ुरआन के संकेत, अलंकार आदि अपनी अद्वितीय साहित्यिक सुंदरता तथा सार्थकता के साथ उसके विद्यार्थियों और गवेषकों के सामने स्पष्ट होते हैं। अतः केवल भाषा ही के मामले में नहीं, इन सभी चीजों के लिए भी क़ुरआन के विद्यार्थियों को इस साहित्य का अध्ययन करना चाहिए।


टिप्पणी

[1] अरबी-ए-मुअल्ला: उत्तम परिष्कृत अरबी भाषा (Classical Arabic)।

[2] जाहिली काल: पैगंबर श्री मुहम्मद (स) के द्वारा इस्लाम के प्रचार से पूर्व का ज़माना।

[3] हरीरी और मुतनब्बी: अब्बासी राजाओं के ज़माने के दो बड़े कवि।

[4] ज़मख्शरी और राज़ी: मुस्लिम इतिहास के मध्यकाल में पैदा हुए क़ुरआन के दो बड़े भाष्यकार।

[5] ‘सबअ मुअल्लकात’: अरबी शायरी के वे सात क़सीदे जो काबा की दीवारों पर लटकाए गए थे।

[6] शेर यह है: وجلا السیول عن الطلول کأنھا     زبر تجد متونھا أقلا مھا

[7] अल-इस्तीआब, इब्नि अब्दुल बर्, बिहामिश अल-इसाबह 3/237।

[8] रिवायत बिल्-मअना का अर्थ होता है कि नबी (स) के वचन शब्द प्रति शब्द संचारित न हुए हों बल्कि उनके अर्थों को नबी (स) से सुनने वाले व्यक्ति ने अपने शब्दों में आगे कहा हो।

[9] अल-अस्मईय्यात, अबू सईद अब्दुल मलिक बिन क़ुरैब अल-अस्मई।

[10] अल- मुफ़ज़्ज़लिय्यात, अल- मुफ़ज़्ज़ल बिन मुहम्मद बिन याला बिन आमिर बिन सालिम अज़-ज़बि।

[11] अल-हमासा, अबू तम्माम हबीब बिन औस अत-ताई।

[12] उदाहरणार्थ जाहिज़ की “अल-बयान व अत-तब्यीन” और मुबर्रद की “अल-कामिल फ़िल-लुगति व अल-अदब” आदि। इनके साथ-साथ अबू ज़ैद की “जमहरतु अश्आर अल-अरब”, इब्न-ए-शजरी की “मुख्तारात शुअरा-इल-अरब”, अबू तम्माम की “अल-फ़ुहूल” और बुःतुरी, इब्न-ए-शजरी और अबू हिलाल अल-अस्करी की “हमासा” और अबू हिलाल की “दीवानिल-मआनी” भी इसी प्रकार की रचनाएँ हैं।

[13] अत-तहज़ीब फ़िल-लुगह, अबू मनसूर मुहम्मद बिन अहमद अल-अज़हरी।

[14] अल-मोहकम व अल-मुहीतिल आज़म, अली बिन सीदह।

[15] ताजुल-लुगह व सिहाह अल-अरबिय्यह, अबू नसर इस्माईल अल-जौहरी।

[16] अल-जमहरतु फ़िल-लुगह, अबू बक्र मुहम्मद बिन दुरैद अल-अज़्दी।

[17] अन-निहायह फ़िल-गरीब अल-हदीस व अल-असर, अबुस-सआदात अल-मुबारक बिन मुहम्मद अल-जज़री, इब्नि असीर।

[18] खज़ानत-उल-अदब व लुब्बु लुबाब लिसान-उल-अरब, अब्दुल क़ादिरबिन उमर अल-बगदादी।

[19] मारूफ़: क़ुरआन की परिभाषा में ऐसी बातें जो मानव प्रकृति में भलाई के तौर पर पहचानी जाती हैं।

[20] मुंकर: क़ुरआन की परिभाषा में ऐसी बातें जिन्हें मानव प्रकृति बुरा समझती है और जिनसे घृणा करती हैं।

[21] शहादत-ए-हक़: सत्य का साक्षी होना।

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