Religion, Philosophy and the Heart

क़ुरआन अध्ययन के मूल सिद्धान्त – भाग 3 – शैली की विशिष्टता

(जावेद अहमद गामिदी की पुस्तक ‘मीज़ान’ का एक अंश)
अनुवाद तथा टीका: मुश्फ़िक़ सुल्तान

शैली की विशिष्टता

तीसरी चीज़ यह है कि क़ुरआन की भाषा शैली अनोखी है। इसमें गद्य (prose) की सरलता और क्रमबद्धता है, अपितु इसे गद्य नहीं कहा जा सकता। यह काव्य की लय, ताल और  संतुलन अपने अंदर लिए हुए है, लेकिन इसे काव्य भी नहीं कह सकते। यह उस प्रकार की कोई पुस्तक भी नहीं है, जिस प्रकार की पुस्तकों से हम परिचित हैं और जिनमें अध्याय तथा भाग बनाकर किसी एक विषय या अनेक विषयों पर चर्चा की जाती है। अरब वासी इसे कभी शायरी कहते और कभी काहिनों[1] के सजअ[2] के समान ठहराते थे, लेकिन उनकी यह अनिश्चितता ही स्पष्ट कर देती है कि वे स्वयं भी अपनी इस बात पर संतुष्ट नहीं थे। वास्तव में अपनी शैली के अनुसार क़ुरआन पूर्णतः एक अनोखी पुस्तक है। इसमें नदियों का प्रवाह है, समुंदरों का बल है, शोभान्वित तर्क की विविधताएँ हैं, अर्थ के संयोग हैं, उदाहरण हैं, कथाएँ हैं, बात अपने केन्द्रीय विषय की ओर बार-बार लौटती है, भय, चेतावनी और प्रकोप की अनेक शैलियाँ हैं, शोक है, आकांक्षा है, विश्वास की तीव्रता है, अरुचि के अनेक रूप हैं और विभिन्न प्रकार के वैराग हैं। इसमें प्रेम और उत्साह के अवसर ओस की तरह प्रिय और उत्साहित दिखाई देते हैं और क्रोध के अवसर ऐसी आँधी की तरह प्रतीत होते हैं जिससे दरियाओं के दिल दहल जाएँ। सम्बोधन के ऐसे अनोखे रूप हैं कि एक व्यक्ति उनमें खो कर रह जाता है। इसकी भाषा शैली की यही विशेषताएँ हैं जिन्हें देखकर क़ुरआन ने कहा:

لَوْ أَنزَلْنَا هَٰذَا الْقُرْآنَ عَلَىٰ جَبَلٍ لَّرَأَيْتَهُ خَاشِعًا مُّتَصَدِّعًا مِّنْ خَشْيَةِ اللَّهِ وَتِلْكَ الْأَمْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُون

“(इनके दिल पत्थरों से भी अधिक कठोर हैं, अन्यथा सत्य यह है कि) यदि इस क़ुरआन को हम किसी पर्वत पर उतार देते तो तुम देखते कि वह परमेश्वर के भय से दब जाता, फट जाता। यह उदाहरण हम लोगों को इसलिए सुनाते हैं कि वे विचार करें।“ (सूरह हश्र 59: आयत 21)

परंतु इसकी विधा (genre) क्या है? इस बारे में जो अधिकतम बात कही जा सकती है, वह यह है कि यह किसी हद तक वक्ताओं के भाषण से कुछ समानता रखता है। इसमें संदेह नहीं कि इस विधा से भी इसकी समानता केवल समानता ही तक सीमित है। इसे पूर्णतः भाषण भी नहीं कहा जा सकता। फिर भी यह उसी के निकटतम है और इसलिए क़ुरआन के एक विद्यार्थी के समक्ष निम्नलिखित बातें अवश्य रहनी चाहिए:

पहली यह कि इसको समझने के लिए इस के परिवेश को समझने का प्रयत्न किया जाए। अर्थात वह प्रसंग, वह परिस्थिति और वह आवश्यकताएँ सुनिश्चित की जाए जिसे सामने रखकर क़ुरआन की कोई सूरह उतरी है। इसके लिए क़ुरआन से बाहर किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं होती। यह सब चीज़ें स्वयं क़ुरआन ही की रोशनी में स्पष्ट हो जाती हैं। एक व्यक्ति जब क़ुरआन पर गंभीर विचार करता है, इसके एक एक शब्द पर डेरा डालता है, शब्दों का उतार चढ़ाव और वाक्यों की बनावट को समझने का प्रयत्न करता है तो पूरे सूरह के घटनास्थल और घटनाक्रम इस सुंदरता के साथ सामने आ जाते हैं और अपने अस्तित्व पर इस प्रकार से प्रमाण बन जाते हैं कि उसके लिए फिर किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती। उस्ताज़ अमीन अहसन इस्लाही लिखते हैं:

“… उचित रास्ता केवल यह है कि आप स्वयं क़ुरआन के भीतर के संकेतों से उसके प्रसंग को समझने का प्रयत्न करें। जब आप यह जान लेंगे कि किसी विशेष स्थान पर क़ुरआन का कथन किन लोगों को संबोधित कर रहा है; प्रत्यक्ष रूप से किन को संबोधित कर रहा है और अप्रत्यक्ष रूप से किन को; इन लोगों को किस परिस्थिति का सामना है और उन परिस्थितियों ने क्या क्या प्रश्न उठा दिए हैं जिनके उत्तर की प्रतीक्षा मित्र गण भी कर रहे हैं और शत्रु भी; शत्रुों का विरोध क्या रूप धारण कर चुका है और मित्र किस स्थिति में है; विरोधी व्यूह में कौन कौन से दल किन रणनीतियों से के साथ आ मिले हैं और सहयोगियों के विभिन्न गुट किस ढंग से सोच रहे हैं तो अपने आप क़ुरआन का सारा स्वरूप आपके सामने बेनक़ाब हो जाए गा। यह सारी बातें स्वयं कथन के अंदर बोल रही होती हैं, इसलिए यदि मेहनत करके इन को निर्धारित कर लिया जाए तो वाक्यों के भीतर का क्रम अथवा समन्वय आप से आप खुलता चला जाता है और क़ुरआन की एक सूरह पढ़ कर हृदय पर वही प्रभाव होता है जो प्रभाव एक महान वक्ता के एक महान व्याख्यान को सुनकर हृदय पर होता है।“ (मबादी-ए-तदब्बुर-ए-क़ुरआन, पृष्ठ 210)

दूसरी यह की प्रत्येक स्थान पर क़ुरआन के संबोधन की दिशा निर्धारित की जाए। क़ुरआन में थोड़े-थोड़े अंतराल से, अपितु कई बार एक ही आयत में संबोधन की दिशा बदल जाती है। अभी मुसलमान संबोधित थे, अभी संबोधन मुश्रिकीन[3] से हो गया। अभी अहल-ए-किताब[4] से बात हो रही थी कि बात की दिशा अचानक मुसलमानों की ओर पलट गई। यही परिवर्तन एकवचन अथवा बहुवचन के रूप में भी होता रहता है। फिर यह मामला केवल संबोधन के चरम अर्थात संबोधित पात्र ही में नहीं होता, उसके उद्गम अर्थात सम्बोधन करता में भी होता है। अभी परमेश्वर की ओर से बात हो रही थी कि अचानक जिबरील-ए-अमीन[5] की ओर से होने लगी। अभी जिबरील-ए-अमीन बात कर रहे थे, अभी अल्लाह के रसूल बात करने लगे। अतः जिस प्रकार एक वक्ता अपने उच्चारण के बदलाव, अपने चेहरे की चाल और बात की शैली के बदलाव से अपने संबोध्य को बदलता रहता है, इसी प्रकार पवित्र क़ुरआन में भी प्रवचन क्षण-प्रतिक्षण बदलता रहता है। इसलिए यह आवश्यक है कि क़ुरआन की व्याख्या में इस बात को पूरा महत्व दिया जाए और प्रत्येक स्थान पर यह निर्धारित किया जाए कि वक्ता परमेश्वर हैं या जिबरील हैं या पैगंबर हैं या लोग। इसी तरह यह भी देखा जाए कि किसे संबोधित किया जा रहा है, अल्लाह को या रसूल को या लोगों को। फिर लोगों में भी देखा जाए कि वे मुसलमान है या मुनाफ़िक़ीन[6] या यहूदी और ईसाई या बनी इस्माईली[7] मुश्रिक या इनमें से दो या तीन या सब। फिर सम्बोधन में कभी-कभी अस्पष्टता के अवसर भी होंगे; श्री मुहम्मद (स) को संबोधित करके वास्तव में मुसलमानों को संबोधित किया जाएगा। इसी प्रकार ऐसा प्रतीत होगा कि सम्बोधन श्री मुहम्मद (स) से है, लेकिन बात का लक्ष्य क़ुरैश के सरदारों या यहूदियों और ईसाइयों की ओर होगा। क़ुरआन में इसके अनेक उदाहरण हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि पूरे चिंतन के साथ इनमें अंतर किया जाए और पूरी तरह निर्धारित करके यह बताया जाए कि सम्बोधन वास्तव में किस से हो रहा है। इसके बिना क़ुरआन का आशय उचित रूप से स्पष्ट नहीं हो सकता।

तीसरी यह कि क़ुरआन के सामान्य अथवा विशेष अर्थों वाले भागों में अंतर किया जाए। क़ुरआन में यह शैली अनेक स्थानों पर प्रयुक्त की गई है कि शब्द सामान्य प्रतीत होते हैं, लेकिन उनका प्रसंग पूरी निश्चितता से स्पष्ट कर देता है कि उनका अभिप्राय सामान्य नहीं है। क़ुरआन ‘النَّاس’ कहता है, लेकिन सारी दुनिया के लोग तो एक ओर, कई बार इससे अभिप्राय अरब के सारे लोग भी नहीं होते। वह ‘عَلَی الدِّیْنِ کُلِّہٖ’ के शब्द प्रयुक्त करता है, लेकिन इससे अभिप्राय दुनिया के सारे धर्म नहीं लेता। वह ‘الْمُشْرِکُوْن’ का शब्द प्रयुक्त करता है, लेकिन इसे सारे शिर्क[8] करने वाले लोगों के अर्थों में प्रयुक्त नहीं करता। वह ‘اِنْ مِّنْ اَہْلِ الْکِتٰبِ’ की शब्दावली लाता है, लेकिन इससे अभिप्राय पूरी दुनिया के यहूदी और ईसाई नहीं होते। वह ‘الْاِنْسَان’ शब्द का प्रयोग करता है, लेकिन इससे सम्पूर्ण मानवता का वर्णन उसका उद्देश्य नहीं होता। यह क़ुरआन की सामान्य भाषा शैली है जिसका ध्यान यदि ना रहे तो क़ुरआन की व्याख्या में वक्ता की बात का तात्पर्य पूर्णतः दूषित हो जाता है और बात कहीं से कहीं पहुँच जाती है। इसलिए यह अनिवार्य है कि इस मामले में क़ुरआन के शब्दों को उसके प्रचलित अर्थों और उसके प्रसंग के अधीन ही रखा जाए।


[1] काहिन: अरब में भविष्यवाणी करने वाले को काहिन कहते थे।

[2] सजअ: छंदोबद्ध पद्य

[3] मुश्रिकीन: मुश्रिक का बहुवचन। परमेश्वर के साथ अनेक देवी-देवताओं की उपासना करने वाले अरब वासी।

[4] अहल-ए-किताब: क़ुरआन से पूर्व ईश्वरीय ग्रंथों और पैगंबरों को मानने वाले अर्थात यहूदी और ईसाई।

[5] जिबरील: परमेश्वर के पास से संदेश लेकर पैगंबर के पास लाने वाला फ़रिश्ता। ‘अमीन’ का अर्थ होता है विश्वासयोग्य।

[6] मुनाफ़िक़ीन: कपटी लोग। मदीना में उस समय पाए जाने वाले ऐसे लोग जो ऊपर से खुद को मुसलमान दिखाते थे लेकिन भीतर से इस्लाम पर विश्वास नहीं रखते थे और मुसलमानों के हितों के विपरीत ही चालें चलते थे।

[7] बनी इस्माईली: श्री इब्राहीम (अ.स) के बड़े पुत्र, श्री इस्माईल (अ.स) के वंशज।

[8] शिर्क: परमेश्वर के साथ अनेक वस्तुओं अथवा देवी-देवताओं की उपासना करना।

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