Religion, Philosophy and the Heart

क़ुरआन अध्ययन के मूल सिद्धान्त- भाग 2 – भाषा की स्पष्टता

(जावेद अहमद गामिदी की पुस्तक ‘मीज़ान’ का एक अंश)
अनुवाद तथा टीका: मुश्फ़िक़ सुल्तान

भाषा की स्पष्टता

दूसरी चीज़ यह है कि क़ुरआन केवल अरबी ही में नहीं, अपितु स्पष्ट अरबी में उतरा है। अर्थात एक ऐसी भाषा में जो अत्यन्त स्पष्ट है, जिसमें कोई अनिश्चितता नहीं है, जिसका प्रत्येक शब्द शुद्ध और जिसकी हर शैली उनके लिए जानी-मानी है जिन्हें वह संबोधित करता है। क़ुरआन ने कहा:

نَزَلَ بِہِ الرُّوۡحُ الۡاَمِیۡنُ ﴿۱۹۳﴾ۙ عَلٰی قَلۡبِکَ لِتَکُوۡنَ مِنَ الۡمُنۡذِرِیۡنَ ﴿۱۹۴﴾ بِلِسَانٍ عَرَبِیٍّ مُّبِیۡنٍ ۱۹۵

“इस (क़ुरआन) को तुम्हारे हृदय पर रूहुल अमीन[1] लेकर उतरा है, इसलिए कि परमेश्वर के अन्य दूतों के जैसे तुम भी सावधान करने वाले बनो, अत्यंत स्पष्ट अरबी भाषा में।“ (सूरह शुअरा 26:193-195)

قُرۡاٰنًا عَرَبِیًّا غَیۡرَ ذِیۡ عِوَجٍ لَّعَلَّہُمۡ یَتَّقُوۡنَ ﴿۲۸

“ऐसे क़ुरआन के रूप में जो अरबी भाषा में है, जिसके भीतर कोई टेढ़ नहीं है, इसलिए कि वे परमेश्वर के दंड से बचें।“ (सूरह जुमर 39:28)

क़ुरआन के बारे में यह एक स्पष्ट बात है। इसे मानिए तो इसके परिणाम स्वरूप यह बात मानना पड़ती है कि क़ुरआन का कोई शब्द और उसकी कोई शैली भी अपने अर्थ अनुसार अज्ञात तथा दुर्लभ नहीं हो सकता। उसने जिन लोगों को संबोधित किया, उनके लिए पूर्ण रूप से प्रचलित तथा जाने पहचाने शब्दों और शैलियों में उतरा है। भाषा के दृष्टिकोण से उसकी कोई चीज़ अपने अंदर किसी प्रकार की कोई गराबत[1] (विलक्षणता) नहीं रखती, अपितु हर ओर से शुद्ध और स्पष्ट है। इसलिए इसके अनुवाद तथा भाष्य में हर जगह उसके शब्दों के प्रचलित तथा प्रसिद्ध अर्थ ही समक्ष रहने चाहिए। इनसे हट कर उनका कोई अर्थ स्वीकार नहीं किया जा सकता। ‘[2]وَالنَّجْمُ وَالشَّجَرُ یَسْجُدٰنِ’ में ‘अन्-नज्म’ का अर्थ केवल तारे ही हो सकते हैं। ‘[3]اِلَّآ اِذَا تَمَنّٰی’ में शब्द ‘तमन्ना’ का अर्थ इच्छा और आकांक्षा है। ‘[4]اَفَلَا یَنْظُرُوْنَ اِلَی الْاِبِلِ’ में ‘अल्-इबिल’ का शब्द ऊंट के लिए आया है। ‘کَاَنَّھُنَّ بَیْضٌ مَّکْنُوْنٌ[5]’ में ‘बैज़’ अंडों के अर्थ में है। ‘فَصَلِّ لِرَبِّکَ وَانْحَرْ[6]’ में ‘इंहर’ का शब्द कुर्बानी के लिए है। उपर्युक्त शब्दों को ‘बूटियों’ और ‘तिलावत’ (पाठ) और ‘बादल’ और ‘अंडों की छिपी हुई झिल्ली’ और ‘सीने पर हाथ बांधने’ के अर्थों में नहीं लिया जा सकता।

शब्दों से आगे यही मामला संज्ञा के विकार और बातों की शैलियों का है। व्याकरण तथा व्याख्यान शास्त्र के विद्वानों ने इन विद्याओं से संबन्धित क़ुरआन की कई बातों को शाज़ (दुर्लभ) अथवा अपवाद घोषित किया है। किन्तु सच यह है कि यह दृष्टिकोण केवल त्रुटिपूर्ण शोध तथा जांच की कमी पर आधारित है। हमारे इस युग में मद्रसा-ए-फ़राही[7] के सर्वोच्च विद्वानों, इमाम हमीदुद्दीन फ़राही और उस्ताज़ इमाम अमीन अहसन इस्लाही, ने जो काम पवित्र क़ुरआन की भाषा पर किया है, उससे यह बात पूर्णतः स्पष्ट हो गयी है कि इन सब मामलों में क़ुरआन की शैली ही अरब की प्रचलित और प्रसिद्ध शैली है। क़ुरआन के जो विद्यार्थी इन विषयों में रुचि रखते हैं, वे इस संबंध में इमाम फ़राही की ‘मुफ़्रदात-उल-क़ुरआन’, ‘असालीब-उल-क़ुरआन’, ‘जम्हरत-उल-बलागह’, ‘मज्मूआ-ए-तफ़ासीर’ तथा उस्ताज़ इमाम अमीन अहसन इस्लाही की ‘तदब्बुर-ए-क़ुरआन’ में अपने लिए बहुत कुछ दिशा-निर्देशन प्राप्त कर सकते हैं। क़ुरआन की व्याख्या में इस नियम का पालन उसकी स्पष्टता के कारण अनिवार्य है, और उसका स्पष्ट होना, जैसा कि ऊपर बताया गया, स्वयं क़ुरआन के प्रमाणित है। इसकी अवहेलना करके क़ुरआन की कोई व्याख्या भी उचित नहीं कही जा सकती।

[1] गराबत: किसी रचना में अप्रचलित शब्दों का प्रयोग।

[2] सूरह अल्-रहमान 55:6

[3] सूरह अल्-हज्ज 22:56

[4] सूरह अल्-गाशियह 88:17

[5] सूरह अल्-साफ़्फ़ात 37:49

[6] सूरह अल्-कौसर 108:2

[7] इमाम हमीदुद्दीन फ़राही से संबन्धित एक मुस्लिम मत (school of thought)। हमीदुद्दीन फ़राही भारत के एक प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान थे जिनका देहांत 1930 में हुआ।


भाग 1 पढ़ने के लिए: https://mushafiqsultan.com/2021/01/08/principles-of-understanding-the-quran-hindi/

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