Religion, Philosophy and the Heart

इस्लाम का विस्तृत परिचय-भूमिका 1-मूल सिद्धांत | जावेद अहमद गामिदी

(जावेद अहमद गामिदी की पुस्तक ‘मीज़ान’ का एक अंश)
अनुवाद तथा टीका: मुश्फ़िक़ सुल्तान

धर्म[1] परमेश्वर का वह निर्देश है जो उसने प्रथमतः मानव प्रकृति में प्रेरित किया और उसके बाद उसके आवश्यक विस्तार पूर्वक वर्णन के साथ अपने पैगंबरों के माध्यम से मनुष्य को दिया है। इस दीर्घकालीन श्रृंखला के अंतिम पैगंबर श्री मुहम्मद हैं। इसलिए धर्म का एकमात्र स्रोत इस धरती पर अब उन्हीं का पावन व्यक्तित्व है। यह केवल उन्हीं का व्यक्तित्व है कि जिससे क़यामत (महाप्रलय) तक आदम की संतान को अपने प्रभु का मार्गदर्शन प्राप्त हो सकता है और केवल उन्हीं का उच्च पद है कि अपने क़ौल-ओ-फ़ेअल[2] और तक़रीर-ओ-तस्वीब[3] से वह जिस चीज़ को धर्म कह दें, वही अब रहती दुनिया तक सत्य धर्म कहा जाए गा:

ہُوَ الَّذِیۡ بَعَثَ فِی الۡاُمِّیّٖنَ رَسُوۡلًا مِّنۡہُمۡ یَتۡلُوۡا عَلَیۡہِمۡ اٰیٰتِہٖ وَ یُزَکِّیۡہِمۡ وَ یُعَلِّمُہُمُ الۡکِتٰبَ وَ الۡحِکۡمَۃَ

“उसी (ईश्वर) ने उम्मीओं[4] के अंदर एक रसूल उन्हीं में से उठाया है जो उसकी आयतें उन्हें सुनाता और उनकी शुद्धि करता है, और इसके लिए उन्हें क़ानून और हिकमत का ज्ञान देता है।” (सूरह जुम्अः 62:2)

यही क़ानून और हिकमत[5] वह सत्य धर्म है जिसे “इस्लाम” कहा जाता है। इसके स्रोत की व्याख्या हम इस प्रकार करते हैं कि अल्लाह के रसूल, श्री मोहम्मद (स) से यह धर्म आपके सहाबा (साथियों) के ‘इज्मा’ (सर्वसम्मति) और ‘क़ौली अथवा अमली तवातुर’ (निरंतर पठन अथवा क्रिया) से आगे चला है और दो प्रकार से हम तक पहुंचा है:

  1. पवित्र क़ुरआन
  2. सुन्नत

पवित्र क़ुरआन के बारे में हर मुसलमान इस वास्तविकता को जानता है कि यह वह ग्रंथ है जो ईश्वर ने अपने अंतिम दूत श्री मोहम्मद (स) पर अवतरित किया है, और अपने उतरने के बाद से आज तक मुसलमानों के पास उनकी ओर से सर्वसम्मति के साथ इस स्पष्टता के साथ बाक़ी है कि यही वह ग्रंथ है जो श्री मोहम्मद (स) पर उतरा था और जिसे आपके साथियों ने अपनी सर्वसम्मति (इजमा) और निरंतर मौखिक पठन (कौली तवातुर) के माध्यम से पूरी सुरक्षा के साथ किसी छोटे से छोटे परिवर्तन के बिना दुनिया को सौंप दिया है।

सुन्नत से हमारा आशय ‘दीन-ए-इब्राहिमी’[6] की वह परंपरा है जिसे ईश्वर के नबी, श्री मोहम्मद, (स) ने उसके नवीनीकरण अथवा सुधार के बाद और उसमें कुछ वृद्धि के साथ अपने मानने वालों में धर्म के रूप में जारी कर दिया है। क़ुरआन में आपको ‘मिल्लत-ए-इब्राहिमी’[7] का पालन करने का आदेश दिया गया है। यह परंपरा भी उसी का हिस्सा है। क़ुरआन में आदेश हुआ:

ثُمَّ اَوۡحَیۡنَاۤ اِلَیۡکَ اَنِ اتَّبِعۡ مِلَّۃَ اِبۡرٰہِیۡمَ حَنِیۡفًا ؕ وَ مَا کَانَ مِنَ الۡمُشۡرِکِیۡنَ

“फिर (यही कारण है कि) हमने तुम्हारी ओर प्रेरणा की कि इसी इब्राहिम के मार्ग का अनुसरण करो, जो पूरी तरह से एकाग्र और मुश्रिकों[8] में से नहीं था।” (सूरह नहल 16:123)

इस माध्यम से जो धर्म हमें मिला है, वह यह है:

इबादात (उपासना पद्धति)

  1. नमाज़ – 2. ज़कात और सदका-ए-फ़ित्र[9] – 3. रोज़ा और ऐतिकाफ़[10] – 4. हज और उमरह – 5. कु़र्बानी और तश्रीक़[11] के दिनों की तकबीरें[12]

मुआशिरत (सामाजिक नियम)

  1. निकाह और तलाक और उससे संबंधित विषय – 2. हैज़[13] और निफ़ास[14] में पति-पत्नी का शारीरिक संबंधों से दूर रहना

ख़ुर-ओ-नोश (खानपान के नियम)

  1. सूअर, खून, मृत जानवर और परमेश्वर के सिवा किसी अन्य के नाम पर मारे गए जानवर का निषेध – 2. परमेश्वर का नाम लेकर जानवरों का तज़किया (खून बहाना)

रसूम-ओ-आदाब (रीति रिवाज अथवा शिष्टाचार)

  1. ईश्वर का नाम लेकर और दाएं हाथ से खाना पीना – 2. मिलने के समय पर ‘अस्सलामु अलैकुम’[15] और उसका उत्तर – 3. छींक आने पर ‘अल्-हम्दु लिल्लाह’[16] और उसके जवाब में ‘यर्हमुक अल्लाह’[17] – 4. मूंछें छोटी रखना 5. नाभि के नीचे के बाल काटना – 6. बगल के बाल साफ़ करना – 7. बड़े हुए नाखून काटना – 8. लड़कों का खतना करना – 9. नाक, मुंह और दांतों की सफ़ाई – 10. इस्तिन्जा[18] – 11. हैज़-ओ-निफ़ास के बाद ग़ुसल[19]– 12. ग़ुसल-ए-जनाबत[20] – 13. मय्यत का ग़ुसल 14. तज्हीज़-ओ-तक्फ़ीन[21] – 15. तदफ़ीन[22] – 16. ईद-उल-फ़ित्र – 17. ईद-उल-अज़्हा –

सुन्नत यही है और इसके बारे में यह बात बिल्कुल निश्चित है कि प्रमाण के दृष्टिकोण से इसमें और पवित्र क़ुरआन में कोई अंतर नहीं है। वह जिस तरह सहाबा की सर्वसम्मति और निरंतर मौखिक पठन (कौली तवातुर) से मिला है, यह इसी तरह उनकी सर्वसम्मति और निरंतर क्रिया (अमली तवातुर) से मिली है और क़ुरआन ही की तरह हर दौर में मुसलमानों की सर्वसम्मति से प्रमाणित होती है। अतः इसके बारे में अब किसी शंका अथवा वाद विवाद के लिए कोई संभावना नहीं है।

धर्म निसंदेह, इन्हीं दो रूपों में है। इन को छोड़कर कोई चीज़ न धर्म है, न उसे धर्म कहा जा सकता। अल्लाह के रसूल (स) के क़ौल-ओ-फ़ेअल और तक़रीर-ओ-तस्वीब के अख़्बार-ए-आहाद[23] जिन्हें आमतौर से “हदीस” कहा जाता है, इनके बारे में यह तथ्य अखंडनीय है के एन के प्रचार प्रसार और इनकी सुरक्षा के लिए उन्होंने कभी कोई प्रबंध नहीं किया, यद्यपि सुनने और देखने वालों के लिए छोड़ दिया कि चाहें तो इन्हें आगे पहुंचाएं और चाहें तो न पहुंचाएं। इसलिए धर्म में इनसे किसी मान्यता एवं क्रिया की वृद्धि भी नहीं होती। धर्म से संबंधित जो बातें इन में आती हैं, वह वास्तव में क़ुरआन और सुन्नत में सीमाबद्ध इसी धर्म की व्याख्या और इस पर चलने हेतु नबी (स) के उच्च आदर्श का वर्णन है। हदीस का विषय क्षेत्र इस मामले में यही है। इसलिए धर्म के नाते इस क्षेत्र से बाहर की कोई चीज़ न हदीस हो सकती है और न केवल हदीस के आधार पर उसे स्वीकार किया जा सकता है।

परंतु, इस क्षेत्र के अंदर, प्रत्येक व्यक्ति जो इसकी प्रमाणिकता पर आश्वस्त हो जाने के बाद अल्लाह के रसूल (स) के क़ौल-ओ-फ़ेअल और तक़रीर-ओ-तस्वीब की हैसियत से इसे स्वीकार कर लेता है, उस पर इसका पालन करना अनिवार्य हो जाता है। इस से हटना फिर उसके लिए उचित नहीं रहता, किंतु आवश्यक हो जाता है कि नबी (स) के  किसी आदेश या निर्णय का वर्णन अगर इसमें किया गया है तो उसे पूर्ण रूप से स्वीकार करे।

पवित्र क़ुरआन, सुन्नत और हदीस – यह तीनों चिंतन मनन योग्य हैं, इसलिए इनके बारे में सही दृष्टिकोण अपनाने के लिए जो बातें हमारे विचार में, प्रत्येक विद्वान के सामने रहनी चाहिए, उनका वर्णन एक क्रम अनुसार हम यहां करेंगे।


टिप्पणियाँ

[1] लेखक ने असल में अरबी शब्द ‘दीन’ लिखा है। हिन्दी में शब्द ‘धर्म’ उस का पर्याय है।

[2] क़ौल अर्थात कथन,वचन। फ़ेअल अर्थात कार्य।

[3] ‘तक़रीर-ओ-तस्वीब’: इस का अर्थ यह होता है कि नबी (सल्ल॰) के सामने किसी मुसलमान ने कोई कार्य किया और उन्होंने उसको देखा लेकिन उसको नकारा नहीं या उस कार्य की निंदा नहीं की। इस प्रकार उस कार्य को उनकी मौन स्वीकृति प्राप्त हो गई।

[4] उम्मी: यहूदियों के द्वारा अन्य लोगों, विशेष रूप से श्री इब्राहीम के बड़े पुत्र श्री इस्माईल के वंशजों, अर्थात अरबों, को अपमानित करने के लिए दी गई उपाधि। क्योंकि यहूदी (इस्राइली) दूसरे मनुष्यों, विशेषतः इस्माईलियों को ईश्वरीय ग्रंथ और ज्ञान से वंचित लोग समझते थे, जिन के बीच कभी कोई नबी नहीं आया, इसलिए उन्हें ‘उम्मी’ कहते थे। इसका शाब्दिक अर्थ ‘अशिक्षित’ या ‘अनपढ़’ होता है।

[5] लेखक ने क़ुरआन में प्रयुक्त शब्द ‘अल-किताब व अल-हिकमह’ को विशेष अर्थों में समझा है। इसे जानने के लिए इस पुस्तक का पृष्ठ ——– देखिए।

[6] अल्लाह के रसूल, श्री इब्राहीम (अ.स) से जुड़ी धार्मिक परंपरा।

[7] श्री इब्राहीम (अ.स) का मार्ग।

[8] मुश्रिक: शिर्क, अर्थात ईश्वर के साथ दूसरी चीजों को साझी बनाकर उनकी उपासना करने वाले।

[9] इस्लाम में दान/दक्षिणा के मुख्य रूप।

[10] रोज़ा अर्थात उपवास जो विशेषतः रमज़ान के महीने में होता है। इसी महीने के अंतिम दस दिनों में  ऐतिकाफ़ भी होता है। अधिक जानकारी के लिए रोज़े से संबन्धित अध्याय देखिए।

[11] ईद-उल-अज़्हा के बाद के तीन दिन।

[12] तकबीर: विशेष शब्दों से ईश्वर की बड़ाई करना। उदाहरणार्थ ‘अल्लाहु अकबर’ कहना।

[13] हैज़: मासिक रज:स्रवण।

[14] निफ़ास: प्रसूति-रक्तस्राव, वह रक्तस्राव प्रसूतिका के शरीर से बच्चा जनने के कई दिन तक होता रहे।

[15] ‘अस्सलामु अलैकुम’: आप पर परम-शांति हो।

[16] ‘अल्-हम्दु लिल्लाह’: सम्पूर्ण कृतज्ञता परमेश्वर के लिए है।

[17] ‘यर्हमुक अल्लाह’: परमेश्वर तुम पर दया करें।

[18] ‘इस्तिन्जा’: मूत्र अथवा शौच के बाद शुद्धिकरण की प्रक्रिया।

[19] ग़ुस्ल: स्नान

[20] ‘ग़ुस्ल-ए-जनाबत’: पति-पत्नी का शारीरिक सम्बन्धों के बाद स्नान करना।

[21] ‘तज्हीज़-ओ-तक्फ़ीन’: मृतक के शरीर को कफ़न पहनाना और दफ़न करने के लिए तैयार करना।

[22] ‘तदफ़ीन’: दफ़न करना।

[23] ‘अखबार-ए-आहाद’: मुहद्दिसीन (हदीस विशेषज्ञ) हदीस के लिए एक और शब्द ‘खबर’ का प्रयोग करते हैं। ‘खबर’ का बहुवचन ‘अखबार’ होता है। मुहद्दिसीन हदीस या खबर की दो बड़ी किस्में करते हैं:

खबर-ए-मुतवातिर

खबर-ए-वाहिद या अखबार-ए-आहाद

खबर-ए-मुतावातिर : वह खबर जिस का बयान (वर्णन) इतने अधिक व्यक्ति करें कि यह असंभव प्रतीत हो कि इतने अधिक व्यक्ति, एक साथ, बिना किसी मजबूरी के, एक झूठी बात पर सहमत होंगे|

खबर-ए-वाहिद : उसे कहते जिस में ‘खबर-ए-मुतावातिर’ के गुण नहीं हों और उसका वर्णन बहुत कम लोगों ने किया हो। अर्थात रिवायत करने वालों की उतनी संख्या न हो कि विश्वास से यह कहा जा सके कि इस में किसी संदेह की संभावना नहीं है। हदीस का असल ज़ख़ीरा (संग्रह) इनही ‘अखबार-ए-आहाद’ पर आधारित है।

Leave a comment

Your email address will not be published.

%d bloggers like this: